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साल 2020 की महत्वपूर्ण घटनाएं जो आने वाले कल का इतिहास है

राम मंदिर से लेकर नई शिक्षा नीति तक कई अहम फैसले लिए गए हैं


साल 2020 खत्म होने के कगार पर है. यह साल कई मायनो में बहुत ही महत्वपूर्ण है. ऐसा नहीं है सिर्फ कोरोना और लॉकडाउन ने ही इसे यादगार बनाया है. बल्कि कई ऐसी घटनाएं हैं जो इस साल का इतिहास लिखेगी. इस साल की शुरुआत नागरिकता कानून के विरोध से शुरु होकर किसान आंदोलन पर आकर खत्म हो रहा है. पूरे साल लॉकडाउन हो या जीडीपी का माइन्स में चला जाना हो, ऐसी घटनाएं है जो हर शख्स के जहन में अगले कई सालों तक याद रहने वाली है. तो चलिए ‘काम की बात’ में हम 2020 में राजनीति की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं को बारे में बताएंगे.

 

 

दिल्ली चुनाव और दंगा

साल की शुरुआत में ही नागरिकता संशोधन कानून को लेकर विरोध चल रहा था. इस बीच फरवरी के महीने में देश की राजधानी में साल का पहला विधानसभा चुनाव हुआ. आम आदमी पार्टी ने हैट्रिक लगाते हुए दिल्ली पर अपना कब्जा कर लिया. आम आदमी पार्टी ने 70 में से 62 सीटों पर विजय प्राप्त की बीजेपी की झोली में 8 सीटें आई और कांग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल पाई. चुनाव प्रचार के दौरान आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला भी बड़ा मजेदार था. बात यहां तक आ गई है कि एक चुनावी रैली के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने कहा दिया कि 7 फरवरी को बटन इतना जोर से दबाएं कि करंट शाहीन बाग में लगे. इस बयान के बाद लोगों का गुस्सा भड़कना लाजमी था. प्रत्येक मीडिया में यह बात हेडलाइन के तौर पर चलाई गई. चुनाव जीतने के कुछ दिन बात ही दिल्ली के उत्तरी पश्चिमी इलाके में दंगे हो गए. नागरिकता संशोधन कानून को  लेकर लोग विरोध कर रहे थे. इसी बीच जाफराबाद में कानून के इसके समर्थन में भी कुछ लोग आगे आएं. जिसमें बीजेपी ने नेता कपिल मिश्रा भी शामिल थे. 22 फरवरी को शुरु हुए दंगे में  बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार 40 लोगों की मौत हो गई और 150 से अधिक लोग घायल हुए थे.

 

मध्यप्रदेश में दोबारा बीजेपी की बारी

मध्यप्रदेश में साल 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में करारी हार क बाद बीजेपी सत्ता में दोबारा आना चाहती थी. वहीं दूसरी ओर सत्ता में काबिज कांग्रेस के बीच खटास का सिलसिला भी शुरु हो गया था. ज्योतिरादित्य सिंधिया पार्टी से नाराज चल रहे थे इसी का फायदा बीजेपी को मिला. मार्च के महीने में जब लोगों को कोरोना से बचने की हिदायतें दी जा रही थी. उस वक्त सियासी उठापटक बड़ी तेजी से जारी थी. पार्टी से नाराज चल रहे ज्योतिरादित्या सिंधिया ने अपने 22 विधायकों के साथ कांग्रेस को अलविदा कह दिया और बीजेपी में शामिल हो गए . होली वाले दिन सिधिंया ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था और कुछ दिन बाद बीजेपी के मुख्यालय में बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा की मौजूदगी में बीजेपी की सदस्या ली. वहीं दूसरी ओर बहुमत के अभाव में कांग्रेस की सरकार गिर गई. इसी साल नवंबर में हुए उपचुनाव में बीजेपी की जीत हुई और एक बार फिर शिवराज चौहान मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनें.

 

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राजस्थान में संकट

कोरोना के दौरान आंशिक लॉकडाउन खुलने के बाद ही राजस्थान की राजनीति में हलचल मच गई. जुलाई के महीने में राजस्थान की राजनीति में तूफान आ गया. सत्ताधारी पार्टी  दो धड़ों  में बंट गई. एक तरफ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत थे तो दूसरी तरफ उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट. इस दौरान पूरे कयास लगाए जा रहे थे कि ज्योतिरादित्य सिधिंया की तरह सचिन पायलट भी बीजेपी में शामिल हो जाएंगे. पार्टी से नराज चल रहे पायलट और उनके 18 विधायकों ने राजस्थान सरकार के खिलाफ विद्रोह किया था. जिसके बाद सचिन पायलट को उपमुख्यमंत्री पद और प्रदेश अध्यक्ष से बर्खास्त कर दिया गया. इल्जाम ऐसे भी लग रहे थे कि कांग्रेस पार्टी में युवाजोश को आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है जिसके कारण पार्टी में इतनी सारी परेशानियां हैं. लेकिन सचिन पायलट ने सारे आरोपों पर विराम लगाते हुए राहुल गांधी से मुलाकात कर अपनी सारी समस्याएं रखी. इससे पहले सचिन पायलट के सोशल मीडिया प्रोफाइल से उनके राजनीतिक पद को हट दिया गया था.

 

नई शिक्षा नीति का विरोध

जुलाई महीने के अंत में बीजेपी सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाने के लिए नई शिक्षा नीति को लॉन्च किया गया. जो साल 2021 के शैक्षणिक सत्र से लागू होगी. शिक्षा में इतना बड़ा परिवर्तन 34 साल किया गया है. लेकिन नई शिक्षा नीति ने कई लोगों को निराश किया है. जिसका जमकर विरोध किया जा रहा है. सबसे पहला विरोध तो निजीकरण को लेकर है. स्टूडेंट्स, शिक्षाविद् और जानकार लोगों का कहना है इस तरह का ढांचा शिक्षा को और महंगा कर रहा है. गरीब लोग पहले से ही शिक्षा से दूर है और इस  तरह की नीति से वह और ज्यादा शिक्षा से दूर हो जाएंगे. दूसरा विरोध मातृभाषा की अनिवार्यता पर है. इस पर  ज्यादातर लोगों का कहना है कि जब नौकरी अंग्रेजी से आसानी से मिलती है तो इसकी स्वीकृरिता को खत्म क्यों किया जा रहा है. जबकि पढ़ाई का मतलब ही नौकरी पेशा करना है.

 

राम मंदिर का निर्माण

दशकों से चली आ रही राम मंदिर की मांग पर इस साल विराम लग गया है. बीजेपी ने अपने दूसरे कार्यकाल में अपने वायदे के पूरा करते हुए राम मंदिर का शिलान्यास कर दिया है. 5 अगस्त 2020 को दोपहर 12.40 मिनट पर प्रधानमंत्री मोदी ने राम मंदिर की नींव रखी. इसके बाद ही राममंदिर का काम शुरु हो चुका है. साल 2022 को इसे पूरा करने का प्रयास है. लंबे समय से लंबित यह काम साल 2020 के इतिहास में दर्ज में हो चुका है.

 

बिहार चुनाव

पूरे साल कोरोना का कहर चलता रहा. लेकिन इसका जरा से भी असर चुनाव में देखने को नहीं मिला. अक्टूबर-नवंबर में  बिहार में हुए विधानसभा चुनाव ने राजनीति में युवा जोश  को प्रदर्शित किया. त्रिकोणीय मुकाबले के बीच युवा चेहरों को  बिहार में और ज्यादा पहचान मिली. आरजेडी के तेजस्वी यादव ने एकदिन में सबसे ज्यादा 19 रैलियां की. वहीं दूसरी ओर लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद उनके सुपुत्र चिराग पासवान ने बिहार चुनाव में पार्टी की कमान संभाली. एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ा. सीट भले ही न लाई पाई हो लेकिन चिराग ने युवाओं के बीच अपनी एक छाप छोड़ी है. पहली बार बिहार की राजनीति में कदम रखने वाली पुष्पम प्रिया चौधरी भले ही चुनाव में कुछ अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई हो. लेकिन बिहार की राजनीति में उनकी एंट्री हो चुकी है. इस चुनाव के दौरान वह खुलकर सरकार की नीतियों का विरोध करते हुई दिखाई दी है. बिहार में 125 सीटों के साथ विजय प्राप्त करने वाली एनडीए की सरकार है. नीतीश कुमार सातवीं बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं. 85 सीटों के साथ आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी और 84 सीटों के बाद बीजेपी ने बिहार ने अपने पांव मजबूत कर लिए हैं. वहीं 19 सीटों में विजय के साथ लेफ्ट ने एकबार फिर बिहार में वापसी की है.

 

दोस्ती में दरार

नए कृषि कानूनों को लेकर पूरे देश में विरोध प्रदर्शन लगातार जारी है. दिल्ली को सभी बॉर्डर को किसानों ने घेर रखा है. किसान लगातार इस कानून को वापस लेने  की मांग कर रहे हैं. किसानों का विरोध प्रदर्शन  सितंबर महीने से ही शुरु हो गया था. पंजाब, हरियाणा में लगातार किसान अपने-अपने क्षेत्र में इसको लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. इस बीच जब उनकी बात को नहीं माना गया तो किसानों ने नवंबर 26 को दिल्ली के लिए कूच कर लिया. इस पहले बीजेपी की सहयोगी पार्टी ने नए कृषि कानून के खिलाफ पार्टी से अलग हो गई. बीजेपी और अकाली दल की 22 साल की दोस्ती में दरार आ गई. बढ़ते विरोध के बीच सितंबर के महीने में केंद्रीय मंत्री हरसिमरन कौर बादल ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था.

 

 

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जानें इस साल की 5 तारीख में ऐसा क्या है खास, जो हमें हमेशा याद रहेगा

यूनिर्वसिटी में लड़ाई से लेकर, बेराजगार युवाओं की पुकार


साल 2020 अन्य सालों के मुकाबले एकदम अलग रहा है. पूरा साल खत्म होने का समय का आ चुका है. इस साल में कुछ लोगों ने नया जीवन पाया है तो कई लोगों ने कोरोना के दौरान अपने प्रियजनों को खो दिया है. यह पूरा साल कई मायनों में अलग और खास दोनों है. पूरे साल में कई तरह की घटनाएं हुई जिसने लोगों की जिदंगी को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है. कहीं किसी की नौकरी चली गई तो कहीं किसी की सारा जमापूंजी खत्म हो गई. इन सबके अलावा भी कुछ ऐसी चीजों हुई है जिसे आप कभी नहीं भूला पाएंगे. इस साल की सबसे खास तारीख है पांच. साल के कुछ महीनों में पांच तारीख में कुछ ऐसा हुआ है जिसे आप चाहकर भी नहीं भूला सकते हैं. तो चलिए आज आपको उनके बारे में बताते हैं. 

5 जनवरी

सर्द हवाओं में सिरहन पैदा करने वाली ठंड के बीच 5 जनवरी का वह दिन सालों तक लोगों के जहन से निकलने वाला नहीं है. दिसंबर से सीएए-एनआरसी के खिलाफ पूरे देश में शुरु हुए प्रोटेस्ट में लोगों ने ठंडा की बिना परवाह किए. इस कानून का जमकर विरोध किया. इसी दौरान देश की नंबर यूनिर्वसिटी में कुछ अलग ही मामला चल रहा था. जेएनयू में फीस वृद्धि को लेकर कुछ दिनों से छुटपुर प्रदर्शन जारी थे. लेकिन 5 जनवरी के दिन अचानक शाम को यूनिर्वसिटी की माहौल रणक्षेत्र के रुप में बदल गया. जहां छात्रों के साथ मारपीट की गई. पूरी लड़ाई लेफ्ट स्टूडेंट्स विंग और एबीवीपी के  बीच थी. शाम तीन बजे से शुरु हुआ मामला रात के अंधेरे के साथ और गहराता गया. जहां स्टूडेंट्स एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने के साथ-साथ खून के प्यासे बने थे. यूनिर्वसिटी में कुछ नकाबपोश लोगों ने गुंडो की तरह परिसर में हंगामा पहुंचाया. रात होते-होते इस बात की खबर पूरे देश को लग गई. हर कोई इस घटना के बारे में अपना-अपना फैसला सुना रहा कोई इन्हें गरियाता तो कोई अपनी सहानुभूति प्रकट करता. जेएनयू के गेट को बंद कर दिया अब जो अंदर था वह वहीं रह गया और जो बाहर था उसे वही रोक लिया गया. गेट के बाहर लोगों को एक हुजूम जमा हो गया. जेएनयू के कुछ पुराने छात्र भी वहां इकट्ठा हो गए. कोई जेएनयू को बंद कराने का नारा लगता तो कोई लेफ्ट विंग के छात्रों को गिरियाता. कोई एबीवीपी को इसके पीछे का दोषी बताता तो कोई इनके समर्थन में आता. इस तरह यह देश की पहली घटना बनी जिसे भूला नहीं जा सकता है. 

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5 अगस्त

लंबे समय से लटके बाबरी मस्जिद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 5 अगस्त को कोरोना के दौरान अयोध्या में भूमिपूजन किया गया. इस दौरान पीएम मोदी के अलावा यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ,  राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और कई संत महंत मौजूद थे. यह भी एक ऐतिहासिक दिन था. जब पूरा देश कोरोना और आर्थिक मंदी से गुजर रहा था तो हमारे देश में मंदिर का शिलान्यस किया जा रहा था. पीएम मोदी ने भूमि पूजन की सारी विधि को शुभ मुहूर्त के साथ दोपहर 12.40 मिनट पर पूरी की. इस बात को लेकर कहीं खुशी थी तो कहीं नाराजगी. लेकिन अंत में लंबे समय से लंबित पड़े फैसले पर विराम लग गया. 

5 सितंबर 

वैसे तो 5 सितंबर को हर साल सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर टीचर्स डे मनाया जाता है. लेकिन इस साल का टीचर्स डे दो बातों के कारण विशेष था. पहला कोरोना के कारण सभी स्कूल और कॉलेज बंद थे तो सोशल मीडिया के जरिए ही सबने अपने टीचर्स को शिक्षक दिवस की बधाई दी, तो दूसरी ओर कुछ स्टूडेंट्स ने इसी दिन को विरोध के तौर पर चुना. 5 सितंबर के दिन लंबे समय से सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं का गुस्सा फूट गया. कोरोना की बिना परवाह किए युवा सडकों पर आ गए. युवाओं को विरोध का कारण था लगातार होता निजीकरण, सरकारी परीक्षाओं में होती देरी और परीक्षा पास करने के बाद ज्वांइनिंग न मिलना. युवाओं ने सरकार को सरकार की ही भाषा में समझाने का तरीका अपनाया. कोरोना योद्धाओं के लिए पीएम मोदी के कहने पर लोगों ने जैसे  थाली और ताली बजाई थी. ठीक वैसे ही बेरोजगार युवाओं ने किया. सड़कों पर बाहर निकले युवाओं ने थाली ताली के साथ सरकार को आंख दिखाई. इसका नतीज यह हुआ कि विरोध के बाद तुरंत ही रेलवे की तरफ से लंबे समय से रुकी परीक्षाओं की तारीखों का ऐलान कर दिया गया. इसके बाद इसी साल पीएम मोदी के जन्मदिन पर 17 सितंबर को युवाओं ने बेरोजगारी दिवस के तौर पर मनाया. इस तरह पूरे साल की 5 तारीख आने वाले दिनों में हमारे लिए इतिहास का विषय बन गई है.

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Ram Mandir Construction – आसमान को छूने वाले राम मंदिर का निर्माण – चार महीने में किया जाएगा

Ram Mandir Construction: राम मंदिर का निर्माण – चार महीने में किया जाएगा


Ram Mandir Construction

हाल ही में झारखंड के पाकुड़ में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पहुंचे हुए थे। यहाँ पर आकर इन्होने अयोध्या में भगवान राम के भव्य मंदिर के निर्माण के बारें में बात की। अमित शाह ने पाकुड़ और गोड्डा जिलों में अलग-अलग रैलियों को संबोधित करते हुए राम मंदिर के चार महीनों के अंदर बनने के बारें में घोषणा कर दी।

पाकुड़ और गोड्डा जिलों में अलग-अलग रैलियों को संबोधित

अमित शाह ने रैली के सामने कहा,”अभी-अभी सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के लिए फैसला दिया। सौ वर्षों से दुनियाभर के भारतीयों की मांग थी कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनना चाहिए। अब भव्य राम मंदिर अयोध्या में बनने जा रहा है। यह कांग्रेस पार्टी न तो विकास कर सकती है, न देश को सुरक्षित कर सकती है, न देश को सुरक्षित कर सकती है, न देशी की जनता की जनभावनाओं को सम्मान कर सकती है।”

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अमित शाह ने कांग्रेस पर साधा निशाना

अमित शाह ने रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा।  उन्होंने कहा की,”वर्षों तक झारखंड के युवा लड़ते रहे लेकिन कांग्रेस के शासन में झारखंड की रचना नहीं हो पाई। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की बीजेपी सरकार आने के बाद झारखंड का निर्माण हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी ने झारखंड का निर्माण किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने ने झारखंड को संवारने और विकास का काम किया है।”

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अयोध्या वर्डिक्ट: 70 साल बाद आया सबसे बड़ा फैसला

अयोध्या हुई श्री राम की, 5 एकड़ जमीन मिली मुसलमानो को


देश के सबसे बड़े और मह्त्वपूर्ण फैसले का आज अंत हो गया है। सुप्रीम कोर्ट में लगातार 40 दिन से चल रही सुनवाई के बाद 5 जजों की बेंच ने इस मामले पर आज यानि शनिवार सुबह 10:30 बजे अपना फैसला सुना दिया है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ , जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल ने इस मामले पर फैसला सुनाया है।

अगर वर्डिक्ट की बात की जाये तो अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि विवादित ढांचे की जमीन हिन्दुओं को दी जाएगी। वहीं मस्जिद के लिए दूसरी जगह सरकार उपयुक्त जमीन देगी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मंदिर के लिए ट्रस्ट बनाने को कहा है। साथ ही मुसलमानों को अयोध्या में उपयुक्त स्थान पर पांच एकड़ का प्लॉट देने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बोला है की सरकार मुस्लिमों को अयोध्या में 5 एकड़ जमीन उपयुक्त स्थान पर देगी। आदेश में यह भी कहा गया है की मुस्लिम को मस्जिद के लिए वैकल्पिक स्थान पर प्लॉट दिया जायेगा।

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क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान

अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सबूत के अनुसार बाहरी स्थान पर हिन्दुओं का कब्जा था, इस पर मुस्लिम का कब्जा नहीं था। लेकिन मुस्लिम अंदरूनी भाग में नमाज़ भी करते थे। बाबर ने मस्जिद बनाई थी लेकिन वे कोई सबूत नहीं दे सके कि इस पर उनका कब्जा था और नमाज़ की जाती थी। जबकि यात्रियों से पता चलता है कि हिन्दू यहां पूजा करते थे। 1857 में रेलिंग लगने के बाद सुन्नी बोर्ड यह नहीं बता सका कि ये मस्जिद बनी हुई थी। यहाँ 16 दिसंबर 1949 को आखिरी नमाज की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा की बटवारे की जो ज़मीं है उसे हाई कोर्ट ने गलत ठहराया है। वहाँ पर दोनों पक्षों का कब्ज़ा नहीं था। मुस्लिम ये नहीं बता सके कि अंदरुनी भाग में उनका एक्सक्लूसिव कब्जा था। न्यायालय ने कहा कि पुरातात्विक साक्ष्यों को महज राय बताना एएसआई के प्रति बहुत अन्याय होगा।

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