मनोरंजन

मूवी रिव्यू – सरकारी सिस्टम से लड़ते एक आम आदमी के हौसले की कहानी है- कागज

एक आम आदमी के हौसले की जीत है कागज


कलाकार – पंकज त्रिपाठी, सतीश कौशिक, अमर उपाध्याय, एम मोनल गज्जर, मीता वशिष्ठ, नेहा चौहान, संदीपा धर, बिजेंद्र काला

डायरेक्टर – सतीश कौशिक

टाइप – बॉयोग्राफी

ओटीटी प्लेटफॉर्म – जी5

अवधि – 1 घंटा 56 मिनट

सरकारी कामकाज से तो हम सभी कभी न कभी दो चार हुए ही होंगे. कभी कोई काम एक बार में पूरा हो जाए, ऐसा हो नहीं सकता. यह फिल्म भी ऐसे ही एक सिस्टम पर आधारित है. जहां एक शख्स अपने आप का जिदंगी साबित करने की लड़ाई लड़ रहा है. देश का सड़ा गला सिस्टम उसे गिराने की बहुत कोशिश करता है लेकिन वह सफल नहीं हो पाता. इंसान अपने हौसलों से कैसे जीत हासिल करता है. यह इस फिल्म में दर्शाया है जो आपको हौसला बढ़ा सकती है.  जिसे लोगों को देखना चाहिए.

 

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कहानी

फिल्म की कहानी एक भरत लाल शख्स नाम की  है. जो जिंदा होते हुए भी सरकारी कागज पर मृत है. उसे यह बात तब पता चलती है कि जब वह अपने चाचा से अपने जमीन से हिस्सा मंगाने जाता है. वहां उसे सरकारी लेखपाल से पता चलता है कि वह तो सरकारी कागज पर मृत है. यही से शुरु होती है भरत लाल(पंकज त्रिपाठी) की लड़ाई. एक बैंड वाले से नेता बनने तक ही कहानी. जहां उसे अपने जैसे लोग भी मिलते हैं जो जिंदा तो है लेकिन सरकारी कागजों में मृत हैं. इस लड़ाई में उसकी पत्नी रुक्मणि(एम मोन्नल गज्जर) उसका साथ देती है. लगभग  20 साल से ज्यादा दिनों तो चली इस लड़ाई में एक वकील, पत्रकार की भी अहम भूमिका है. अगर वह न हो तो फिल्म की कहानी अधूरी रह जाती. हर वकील की तरह यहां भी सतीश कौशिश सिर्फ एक क्लाइंट की तलाश में रहता है जिससे उसकी रोजी रोटी चल सकें. फिल्म में पत्रकारिता और राजनीति का भी तड़का है. इसके बिना कहानी में मजा नहीं आता. राजनीति किस तरह से एक आदमी की जिदंगी को खास और बेरंग बना देती और उसमें पत्रकार अपनी सुझबुझ  से उसे प्रसिद्ध कर देती है. यह जानने के लिए फिल्म देंखे.

डायरेक्टर

फिल्म की कहानी 70 के दशक  की है. जिस वक्त लोगों में शिक्षा का प्रसार भी इतना ज्यादा नहीं था. पूरी फिल्म को गांव के परिवेश  में फिल्माया गया है. जिसमें  हर स्थिति को दिखाया गया है. घरों से लेकर खेत खलिहान तक इस फिल्म में दिखाएं गए हैं. लेकिन फिल्म के कॉलइमेक्स शायद आपका थोड़ा निराश कर सकता  है.

एक्टिंग

पंकज त्रिपाठी और सतीश कौशिक हर फिल्म की तरह इस बार भी अपने रोल को बखूबी निभाया है. बैंड बजाने वाले से लेकर नेता बनने तक वह हर जगह अपने रोल में परफेक्ट है. फिल्म में पंकज त्रिपाठी साइकिल चलाते हुए आपका ध्यान जरुर खींच सकता है. सतीश कौशिश वकील के रोल को भी सही निभा रहे हैं. पत्नी की रोल में एन मोनल गजजर ने पूर्वाचंल की महिला के रोल में सही हैं लेकिन भाषा के पकड़ थोड़ी कम हैं.

डॉयलॉग

फिल्म की शुरुआत ही डॉयलॉग से होती है. जहां कागज से महत्व को बताया गया है. इसके साथ ही फिल्म के बीच-बीच में वीओ के साथ-साथ सतीश कौशिश की आवाज मे दिए गए डायलॉग आमलोगों की जिदंगी से संबंधित है.

 

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