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जाने पाँच दोस्तों ने कैसे कैसे मिल कर शुरू किया मसालों का बिजनेस, जिससे आज आदिवासी परिवारों को मिल रही है नई उम्मीद

जाने पाँच दोस्तों की गाँव के हर घर को रोज़गार देने की कोशिश


कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन ने बहुत सारे लोगों की ज़िन्दगी बदल कर रख दी है. कोरोना वायरस के कारण बहुत सारे लोगों ने साल 2020 में काफी कुछ खो दिया है. बीता हुआ पिछले साल किसी के लिए भी कुछ खास नहीं रहा.  लॉकडाउन के दौरान अपने घरों को लौट रहे प्रवासी मज़दूरों के दर्द को पूरे देश ने महसूस किया था.  कोरोना वायरस लॉकडाउन के कारण अपने घरों को लौट रहे सड़क पर भूख-प्यास के कारण कई प्रवासी मज़दूरों ने अपनी जानें भी गंवाई है. कोरोना वायरस लॉकडाउन वास्तव में एक ऐसा मार्मिक दृश्य था, जिसे कोई चाहकर भी नहीं भूल सकता. लेकिन आज हम आपको बीते हुए बुरे दिन याद नहीं दिला रहे है बल्कि आपको पाँच ऐसे दोस्तों की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी सोच और प्रयासों द्वारा एक ऐसी पहल की, जिसे सभी लोगों को उस मुसीबत के समय पर भी नई किरण दिखाई देती थी.

 

 

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जाने पाँच दोस्तों की कहानी

 

आज हम आपको उन पाँच दोस्तों की कहानी बनाते जा रहे है जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान बुरे समय में भी लोगों के लिए  एक नई किरण का काम किया. दरअसल यह कहानी मूल रूप से बिहार के छपरा में रहने वाले अरुण और उनके मध्य प्रदेश  में  रहने वाले अन्य चार साथियों की है. जिन्होंने कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान घर लौट रहे प्रवासी मज़दूरों तथा उनके परिवार का दर्द समझा और उनकी मदद के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया. अरुण को एक आईडिया आया जिसे उन्होंने अपने दोस्तों नवदीप सक्सेना, अभिषेक विश्वकर्मा, राहुल साहू, और अभिषेक भारद्वाज के साथ शेयर किया. अरुण के सभी दोस्त  उनके इस आईडिया में उनके साथ थे.  इससे उन लोगों को अच्छी कमाई का मौका मिलने के
साथ ही साथ प्रवासी मज़दूरों के परिवारों को भी लाभ मिले.

 

जाने मसालों का बिजनेस ही क्यों?

नवदीप सक्सेना भोपाल स्थित आदर्श हॉस्पिटल में आर.एम.ओ. के रूप में काम कर चुके. नवदीप बताते हैं कि मध्य प्रदेश को मसालों का गढ़ माना जाता है. फिर चाहे वह निमाड़ की मिर्च हो या कुंभराज का धनिया. यहाँ पूरे देश के मुताबिक सबसे ज्यादा मसालों का उत्पादन किया जाता है.  मध्य प्रदेश से मसालों की सफ्लाई पूरे देश में की जाती है. नवदीप सक्सेना कहते है कि हम लोग कुछ ऐसा करना चाहते है जिससे किसानों की भी थोड़ी मदद हो सके. फिर वो कहते है कि हम कच्चे मसालों को मंडी से खरीदते हैं फिर उनको साफ़ करवा कर पिसाई के लिए दे देते है. जिसके बाद इनकी पैकेजिंग हमारे यूनिट में की जाती है.  अरुण बताते है कि शुरुआती दिनों में हमारे साथ पाँच महिलाएं काम करती थीं. लेकिन, आज हमारे साथ 30 महिलाएं काम करते हैं.

 

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