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राम मंदिर ट्रस्ट की डील का क्या है पूरा घोटाला?

राम मंदिर ट्रस्ट डील से राजनीतिक रुप से किसे हो रहा सबसे ज्यादा नुकसान


रविवार की शाम अचानक से सारे टीवी चैनल्स पर ये खबरे आऩे लगी की राम मंदिर ट्रस्ट ने जमीन खरीदने में घोटाला किया है।  इस खबर के आने के बाद ही यह आग की तरह फैल गई। जिसमें राजनीति एंगल भी खोजा जाने लगा।  ऐसा कहा जा रहा है कि मात्र 2 मिनट के अंदर 16 करोड़ का घोटाला हुआ है। क्या है पूरा मामला आईये आपको विस्तार से बताते है.

पिछले साल पांच अगस्त को राम जन्मभूमि का शिलान्यास विधि विधान के साथ किया गया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार मोदी सरकार ने फरवरी 2020 में राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट  का गठन किया। जिसमें 15 सदस्यों में से 12 सदस्य मोदी सरकार द्वारा नामित किया गए थे। अब इस जमीन के लेकर विवाद शुरु हो गया है।  जिसके अनुसार कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने सुल्तान अंसारी समेत आठ लोगो को 2 करोड़ में यह जमीन बेची थी। जिसकी कीमत मात्र 15 मिनट में बढ़कर  18 करोड़ हो गई।

सपा नेता पवन पांडेय ने लगाया भ्रष्टाचार का आरोप

इसके तुरंत बाद ही इनसे राजनीति रुप ले लिया। इस मामले में सपा के नेता पवन पांडेय पर भी लैंड लीड को लेकर आरोपों का बाजार हैं। इस बीच उन्होंने स्वयं ही ट्रस्ट पर घोटाले का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि राम जन्मभूमि की जमीन से लगी एक जमीन पुजारी हरीश पाठक और उनकी पत्नी ने 18 मार्च की शाम सुल्तान अंसारी और रवि मोहन को दो करोड़ रुपये में बेची। वही जमीन कुछ मिनट बाद चंपत राय ने राम जन्मभूमि ट्रस्ट की तरफ से 18.5 करोड़ रुपये में खरीद ली । जिस पर मैं भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहा हूं। आपको बता दें कि पवन पांडेय यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव के करीबी माने जाते हैं।

पवन पांडेय ने आरोप लगाया है कि 10 मिनट पहले जमीन का बैनामा(डीनॉमिनेशन) 2 करोड़ में हुआ। उसी दिन सिर्फ 18.5 करोड़ में एंग्रीमेंट हुआ। एंग्रीमेंट और बैनामा दोनों में ही ट्रस्टी अनिल मिश्रा और अयोध्या नगर नियम के मेयर ऋषिकेश उपाध्याय गवाह है।  पवन पांडेय का कहना है कि जिस जमीन को 2 करोड़ में खरीदा गया है उसी जमीन का एंग्रीमेंट 18 करोड़ में कैसे हो गया?  इस घोटाले के लिए वह लगातार सीबीआई जांच की मांग भी कर रहे है। मेयर पर लगते आरोपों के बीच उन्होंने कहा कि मैं तो तमाम मंदिरों के प्रॉपर्टी सेल में गवाह रहा हूं, लेकिन डील तो बायर और सेलर के बीच होती है। उससे गवाह का कोई लेना-देना नहीं।

राजनीतिक रुप से तुल पकड़ने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा कि झूठ पकड़ा गया है  5 करोड़ 80 लाख है।  ये जमीन सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी को 2 करोड़ में मिली तो 5 मिनट बाद ट्रस्ट को 18.5 करोड़ में क्यों मिली?  अब इस मामले को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़ा जा रहा है। पार्टी का कहना है कि उन्हें बदनाम करने के लिए यह सब किया जा रहा है।

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चंपत राय का बयान हम पर तो गांधी की हत्या का भी आरोप है

वहीं दूसरी ओर इस आरोप के बारे में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का कहना है कि सभी प्रकार की कोर्ट फीस और स्टैंप पेपर की खरीददारी ऑनलाइन हो रही है। 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद से अयोध्या में जमीन खरीदने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां आने लगे। जिसके कारण यहां जमीन का दाम बढ़ गया। अब जिस जमीन की चर्चा हो रही है वह रेलवे स्टेशन के पास है।

ट्रस्ट ने जितनी भी जमीन खऱीदी है वह सभी खुले बाजार से काफी कम कीमत पर खरीदी गई है। जमीन खरीदने के लिए वर्तमान विक्रतागणों से वर्षो पूर्व जिस मूल्य पर एंग्रीमेंट हुआ था उस जमीन को उन्होंने 18 मार्च 2021 को बैनामा कराया। इसके बाद ट्रस्ट के साथ एंग्रीमेंट किया। उनका कहना है कि राजनीति रुप से लोगों को गुमराह किया जा रहा है। वह यहीं नहीं रुके उन्होंने कहा कि हम पर तो गांधी की हत्या के भी आरोप लगे हैं। हम आरोपों से नहीं डरते, जो आरोप लगे हैं उसकी जांच करुंगा।

ट्रस्ट ने केंद्र सरकार को भेजी रिपोर्ट

श्री रामजन्म भूमि ट्रस्ट पर लगते आरोप प्रत्यारोप के बीच ट्रस्ट ने केंद्र सरकार और आरएसएस को इसकी रिपोर्ट सौंपी है। रिर्पोट में कई अहम बिंदु को रेखांकित किया गया है। जिसमें कहा गया है कि राजनीतिक कारणों से ट्रस्ट पर आरोप लगाए जा रहे हैं। रिपोर्ट में संबंधित जमीन के आसपास की जमीन की वर्तमान कीमतों की भी जानकारी दी गई है। इतना ही नहीं सौदे की एक-एक जानकारी उपलब्ध करवाई गई है। आपको बता दें सपा और आप द्वारा लगाए आरोपों के बाद केंद्र सरकार ने इसकी रिपोर्ट मांगी थी।

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मनोरंजन

बंगाली एक्ट्रेस जिन्होंने एक्टिंग के साथ राजनीति को चुना अपना प्रोफेशन

यंग बंगाली एक्ट्रेस बनी राजनीति का हिस्सा


हाल के दिनों में बंगाली एक्ट्रेस नुसरत जहां का नाम सियासी गलियारों में खूब चर्चा का विषय बना हुआ है। जिसमें नुसरत की शादी और प्रेग्नेंसी की बात हर जबां पर हैं। यह पहली बार नहीं है जब उसका नाम सुर्खियों में आया है। इससे पहले भी वह कई बार सुर्खियों में आई चुकी है। नुसरत बंगाल की जानी एक्ट्रेस हैं, जिन्होंने अपनी एक्टिंग और खूबसूरती का लोहा मनवा लिया है। इसके बाद राजनीति का हिस्सा बना गई। जहां पहले दिन ही संसद में जाकर लोगों के सामने अपनी पहचान बना गई।। पश्चिम बंगाल हमेशा से ही महिलाओं के उत्थान के लिए आगे रहा है। यही वजह है कि यहां टॉलीवुड में काम करने वाली एक्ट्रेस भी आसानी से राजनीति का हिस्सा बना जाती हैं। आज हम ऐसी एक्ट्रेस की बात करेंगे जो राजनीति का हिस्सा बन चुकी है।

मिमी चक्रवती– मिमी चक्रवती एक एक्ट्रेस, सिंगर होने के साथ-साथ राजनीतिक भी है। मिमी ने बंगाली टीवी, सीरियल में काम करने के बाद साल 2019 की लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की प्रत्याशी के तौर पर कोलकाता के जाधवपुर लोकसभा चुनाव लड़ा और विजयी हुई। इस वक्त मिमी जाधवपुर लोकसभा सीट से सांसद हैं। जीत कर पहली बार संसद गई मिमी और नुसरत जहां को वेस्टर्न ड्रेस के लिए ट्रोल होना पड़ा था। इस दौरान ट्रोल्स का मुंह तोड़े जवाब देते हुए मिमी ने कहा कि ‘वह ज्यादा बोलने में नहीं ब्लकि करने में यकीन करती हैं। साथ ही कहा कि लोगों को पास करने के लिए कुछ नहीं है।  इसके अलावा मिमी को टाइम्स द मोस्ट डिजाइअरबल वुमेन कलकता 2016 और 2020 से भी नवाजा गया है।

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सायोनी घोष-  सायनी घोष भी एक्ट्रेस, सिंगर और राजनीतिज्ञ है। सायनी में अपने करियर में बंगला फिल्मों, टीवी सीरियल और वेब सीरीज में काम किया है। सायनी का नाम साल 2021 में सबसे ज्यादा लाइमलाइट में आई, जब उन्होंने शिवरात्रि के दिन एक कंर्टोवर्सियल फोटो पोस्ट की। इसके बाद धार्मिक भावनाओं को आहत करने के मामले में तथागत राय ने उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। इसके बाद तो राजनीति में जैसे सायनी की एंट्री हो गई। साल 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में आसनसोल दक्षिण विधानसभा सीट से तृणमूल की उम्मीदवार बनाई गई। लेकिन वह चुनाव नहीं जीत पाई। फिलहाल सायनी तृणमूल कांग्रेस की युथ विंग की अध्यक्ष है।

रुपा गांगुली– रुपा गांगुली को भला कौन नहीं जानता है। इंडियन टेलीविजन में रुपा ने कई टीवी सीरियल में काम किया है। लेकिन वह फेमस महाभारत में द्रौपदी का किरदार निभाने के बाद हुई थी। इसके अलावा वह बंगला और हिंदी फिल्मों में काम कर चुकी  हैं।  राजनीति में रुपा की एंट्री साल 2015 में हुई। साल 2016 के विधानसभा चुनाव में हावड़ा नॉर्थ से भाजपा की प्रत्याशी बनी। लेकिन वह चुनाव जीत नहीं पाई। उसी साल भाजपा की तरफ से वह राज्यसभा की सांसद बनी। रुपा राजनीति रुप से बहुत एक्टिव है। पिछले साल एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद वह लगातार महाराष्ट्र सरकार और बॉलीवुड इंडस्ट्री पर सवाल उठाती रही हैं।

शताब्दी राय– शताब्दी राय बंगाली एक्ट्रेस होने  के साथ डायरेक्टर भी हैं। इन्होंने अपने फिल्म करियर की शुरुआत 1980 में की थी। लगभग 10 साल बंगला फिल्म जगत में काम करने के बाद डायरेक्टर बन गई। अब अंत में राजनीति का हिस्सा बन गई। साल 2009 में वीरभूम सीट से तृणमूल की प्रत्याशी के तौर पर इन्होंने पहली बार चुनाव लड़ा और विजय प्राप्त की। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बीच भी यह वीरभूम सीट से टीएमसी की सांसद बनी। साल 2021 में विधानसभा चुनाव से पहले शताब्दी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट डालकर चौंक दिया। सभी यह कयास लगाने लगे कि वह टीएमसी को छोड़ देंगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

नुसरत जहां– नुसरत जहां भी बंगला फिल्म की एक्ट्रेस हैं। बतौर एक्ट्रेस नुसरत ने कई बंगला फिल्मों में काम किया है। जिसके बाद साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बशीरहाट सीट से तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार बनी। जहां से जीत हासिल कर वह संसद में पहुंची। संसद के पहले दिन ही कपड़ों को लेकर लोगों ने उन्हें ट्रोल किया था। और आजकल अपनी पर्सनल लाइफ के कारण सुर्खियों का हिस्सा बनी हुई है।

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सेहत

क्या आप जामुन के ऐसे अनोखे फायदों के बारे में जानते हैं..

दांत दर्द से भी देता है निजात


गर्मी के दिन आते ही हम सबके दिमाग में फलों के नाम पर सबसे पहले आम और जामुन ही आता है। यह दोनों ही ऐसे फल हैं जो गर्मी में मिलते हैं। यात्रा के दौरान भी आपने ट्रेन में कई बार देखा होगा कि जामुन बिक्री होने के लिए आते हैं। कई लोग इसे चाव से लेते हैं। काले रंग का यह छोटा फल जितना खाने में टेस्टी होता है उतना ही फायदेमंद भी है। अगर आप भी अभी तक जामुन को पसंद नहीं करते हैं तो आज ही खाना शुरु कर दें इसके कई फायदे हैं जो आपको डॉक्टर के पास जाने से बचा सकते हैं। तो चलिए जानते हैं जामुन के कुछ फायदों के बारे में….

पथरी को गलाता है

कई लोगो को किडनी में स्टोन हो जाता है। जिसके कारण उन्हें असहनीय दर्द भी होता है। लेकिन क्या आपको पता है जामुन इस स्टोन को गला सकता है। इसके लिए आपको रोज इसका जूस बनाकर पीना होगा। इसका  बनाना भी बहुत आसान है। छोटे साइज की पथरी गलाने के लिए 10 मिली जामुन के रस में 250मिग्रा सेंधा नमक मिलाकर दिन में 2 से 3 बार पीएं। इससे आसानी से पेशाब के रास्ते पथरी बाहर निकल जाएगी।

पीलिया में मददगार’

पीलिया के दौरान अक्सर लोगों को खाने की इच्छा नहीं होती है। ऐसे समय में अगर आप जामुन के 10-15 मिली रस में 2 चम्मच शहद मिलाकर पीते है। तो पीलिया का असर तो कम होता ही है साथ ही बल्ड की कमी भी दूर हो जाती है।

डायबिटीज के मरीजों के फायदेमंद

डायिबिटीज के मरीजों को अक्सर कई तरह की परेशानी होती है। अगर आप इस परेशानी से राहत पाना चाहते हैं तो जामुन नहीं बल्कि जामुन के पेड़ की जड़ आपके लिए बहुत फायदेमंद हैं। इसके लिए आपको जामुन के 100ग्राम जड़ को साफ करके उसे 250 मिली पानी के साथ मिलाकर पीस लेना है। अब इसमें 20 ग्राम मिश्री डालकर सुबह-शाम खाने पीना होगा। इससे आपको शुगर में फायदा मिलेगा।

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त्वचा और आंखे के लिए फायदेमंद

कोई फल खाने में भी स्वादिष्ट हो और साथ ही उससे खूबसूरती भी मिले तो सोने पे सुहागा जैसी बात हो जाती है। जामुन के पत्ते और छाल को पीसकर लगाने से त्वचा में कई तरह के फायदे मिलते हैं। जामुन का रस फेस पर लगाने से पिम्पल्स नहीं होते हैं। इतना ही नहीं यह जूस आंखों की बीमारी से भी निजात दिलाता है।

दांत दर्द से निजात

दांत की दर्द इतनी असहनीय होते हैं कि उस वक्त लोगों को लगता है कि कुछ भी मिल जाए जिससे वह दर्द से राहत पा सके। ऐसी  ही दर्द के लिए जामुन के पत्ते बहुत ही फायदेमंद हैं। इसके लिए आपको जामुन के पत्ते का राख बनाकर दांत और मसूड़े पर मसलना होगा। इससे मसूड़े भी मजबूत होते हैं। इतना ही नहीं जामुन के रस से कुल्ला करना से पाइरिया भी ठीक हो जाता है।

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वीमेन टॉक

फुटबॉल से ईट के भट्ठे तक का सफर : अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉलर संगीता नहीं चाहती उनका ‘सपना’ रह जाए अधूरा

सरकार की लापरवाही के कारण अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉलर संगीता ईट भट्ठे पर काम करने को मजबूर…


पिछले एक महीने में झारखंड का नाम दूसरी बार खबरों की सुर्खियों में आ गया है। दोनों में एक ही समानता है वह है फुटबॉल। पिछले महीने रांची से मात्र 28 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव की लड़की ने हार्वर्ड यूनिर्वसिटी की परीक्षा पास कर ग्रेजुएशन में एडमिशन पाया। गांव की छोटी गलियों से हार्वर्ड यूनिर्वसिटी की बड़ी-बड़ी बिल्डिंग तक पहुंचने में उसका साथ दिया फुटबॉल ने। लेकिन यही फुटबॉल धनबाद की टुंडी विधानसभा क्षेत्र की संगीता कुमारी सोरेन के लिए इतना लकी साबित नहीं हो पाया। घर की आर्थिक तंगी और सरकारी की बेरुखी के कारण संगीता आज ईंट भट्ठे पर काम करने को मजबूर है। दो वक्त की रोटी के लिए अब फुटबॉल से ज्यादा किसी और चीज पर ध्यान देना पड़ा है। संगीता का स्थिति के बारे में हमने उनसे फोन पर बात की है।  आप भी पढ़े संगीता का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू।

प्रश्न- ऐसा देखा जाता है कि फुटबॉल ज्यादातर लड़के खेलते हैं ऐसे में आपने इसमें करियर बनाने का बारे में कैसे सोचा?

उत्तर– देखिए, मैंने खेलने की शुरुआत ही लड़को को देखकर की है। पढ़ाई के दौरान मैंने देखा कि गांव के ही कुछ भैय्या लोग मैदान में फुटबॉल खेला करते थे। इन्हें देखकर मुझे भी खेलने की इच्छा हुई। मैंने खेलना शुरु किया उस वक्त तक मुझे बस किक मारना ही अच्छा लगता था, बाकी इसके बारे में मुझे कुछ नहीं पता था। धीरे-धीरे गांव के ही दो भैय्या लोग ने फुटबॉल गर्ल्स टीम बना दी, यह टीम ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाई। टीम टूटने के साथ ही एक बार फिर मेरे लिए खेलने की समस्या पैदा हो गई। मैंने अपने मन में ठान लिया था कि मैं फुटबॉल खेलूंगी इसलिए धीरे-धीरे करके आगे बढ़ती गई।

प्रश्न- खेल के दौरान जब गांव में प्रैक्टिस बंद हो गई तो आपने क्या किया?

उत्तर– गांव में जैसे ही गर्ल्स टीम टूट गई। मैं पास के गांव में संजय नामक एक सर के पास गई, जो वहां गर्ल्स टीम को फुटबॉल प्रैक्टिस करवाते थे, मैंने उनसे बात की और वहां प्रैक्टिस के लिए जाने लग गई। यहीं से मुझे साल 2016 में क्लब ज्वांइन करवाया गया। इसी दौरान मेरी मुलाकात अभिजीत गांगुली सर से हुई और वही मेरे कोच भी बनें। मैंने भले ही क्लब ज्वांइन कर लिया था, लेकिन आर्थिक स्थिति अभी में मेरे अच्छी नहीं थी। प्रैक्टिस करने के लिए मुझे 8 से 9 किलोमीटर दूर बिरसा मुंडा स्टेडियम जाना होता था। इस दौरान कभी-कभी मेरे पास ऑटो का भाड़ा भी नहीं होता था तो मैं पैदल ही प्रैक्टिस के लिए निकल जाती थी। कई  बार मेरे कोच ने भी मेरे आर्थिक सहायता की है।

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प्रश्न- आप काम तो कोई और भी कर सकती थी, ईट भट्ठे को ही क्यों चुना?

उत्तर– देखिए काम तो बहुत सारे हैं लेकिन सारे काम मैं नहीं कर सकती हूं। दूसरा कारण यह भी है कि लॉकडाउन के कारण बहुत सारे कामधंधे बंद हैं। मैंने ईट भट्ठे पर काम करना इसलिए चुना क्योंकि यहां काम करते हुए मैं फुटबॉल के साथ भी जुड़ी रह सकती हूं। ईट भट्ठे पर काम करने लिए मैं दोपहर  में आती हूं। यहां आने से पहले सुबह मैं फुटबॉल की प्रैक्टिस कर लेती हूं। इस तरह मेरे दोनों काम हो जाते हैं। अगर मैं कहीं और काम करुंगी तो मुझे सारा दिन वहां काम करना होगा। इस तरह मैं फुटबॉल की प्रैक्टिस नहीं कर पाउंगी। इसलिए मेरे लिए जरुरी है कि मैं फुटबॉल का न छोडूं।

प्रश्न- ईट भट्ठे पर आपको कितनी दिहाड़ी दी जाती है?

उत्तर- ईट भट्ठे में दिहाड़ी की हिसाब से पैसे नहीं मिलते, यहां तो आप जितने ईट ढो लेते हैं उसी हिसाब से पैसे मिल जाते हैं। मैं अपनी जरुरत के हिसाब से काम कर लेती हूं। फिर भी एकदिन में 150 रुपए मिल जाते हैं। इससे मैं परिवार की मदद भी कर देती हूं और फुटबॉल की प्रैक्टिस भी कर लेती हूं।

प्रश्न- सरकार द्वारा मदद की बात कही जा रही है, पिछली बार भी संज्ञान लिया गया था इस बार आपको क्या उम्मीद है सरकार से?

उत्तर– हां मदद की बात तो कही जा रही है, हमारे यहां के बीडीओ मेरे घर में आएं थे, एक महीने का राशन और 10 हजार रुपए देकर गए हैं। बाकी अब कुछ नहीं जा सकता कोई मदद मिलेगी या नहीं। पिछली बार भी मेरे स्थिति पर संज्ञान लिया था। मुझे राज्य सरकार ने नौकरी देने की बात कही गई थी। मैं भी उनके आश्वासन के बाद निश्चित हो गई थी। इसलिए मैंने इस बारे में कुछ ज्यादा इक्वायरी नहीं की। उसके बाद लॉकडाउन हो गया। उसके बाद क्या स्थिति हैं आप स्वयं ही दिखिए। इस बार भी मुझे कुछ खास उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है।  

प्रश्न- आपके माता पिता क्या करते हैं?

उत्तर-मेरे माता पिता दोनों ही मजदूरी करते हैं। अब मेरे पापा की आंखे खराब हो गई हैं। हमलोग उनको काम करने से मना करते हैं। लेकिन क्या करें कमाएंगे नहीं तो खाएंगे क्या? घर की आर्थिक स्थिति ठीक रहे इसलिए मैं भी काम कर रही हूं ताकि दाल रोटी चल सके।

प्रश्न- आखिरी सवाल, खबरों के अनुसार आप थाईलैंड और भूटान में मैच खेलने के लिए गई हैं, पहले राष्ट्रीय मैच आपने कब खेला?

उत्तर– मैंने अपना पहला राष्ट्रीय मैच साल 2017 में ओडिशा में खेला था। इसके बाद मैंने कभी पीछे मुढ़कर नहीं देखा। इसके बाद मैं अंडर 18 में भूटान खेलनी गई जिसके लिए मैंने कड़ी मेहनत की, चंडीगंड में मेरा सलेक्शन 40 से 20 लड़कियों के बीच हुआ था। साल 2019 में मैंने सिंगल नेशनल गेम खेला था।

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देश में यलो फंगस का अटैक, जानें क्या है इसके लक्षण

जाने क्या है ये यलो फंगस, कैसे है और से ज्यादा खतरनाक


जैसा की हम अभी लोग जानते हैं कि पिछले साल से ही पूरी दुनिया कोरोना वायरस महामारी को झेल रही है इस महामारी के कारण लाखों लोगों की जान तक चली गई। अभी दुनिया इस कोरोना वायरस महामारी से उभर नहीं पायी थी कि ब्‍लैक फंगस और व्‍हाइट फंगस शुरू हो गया। इतना ही नहीं ब्‍लैक फंगस और व्‍हाइट फंगस के बाद तो अभी हमारे देख में यलो फंगस भी अटैक कर चुका है। यलो फंगस का पहला मामला गाजियाबाद में देखने को मिला था। खबरों की माने तो यलो फंगस को ब्‍लैक और व्‍हाइट फंगस से ज्‍यादा खतरनाक बताया जा रहा है। गाजियाबाद के जिस मरीज में यलो फंगस पाया गया है उनकी उम्र महज 34 साल है और वो पहले कोरोना से भी संक्रमित हो चुका था साथ ही साथ वो मरीज डाइबिटीज से भी पीड़ित है।

जाने क्या है ये यलो फंगस

आपको बता दे कि यलो फंगस, ब्‍लैक और व्‍हाइट फंगस से ज्यादा खतरनाक है। यलो फंगस को घातक बीमारियों में से एक माना जा रहा है। यलो फंगस पहले मरीज को अंदर से कमजोर करता है उसके बाद मरीज को सुस्‍ती आना, कम भूख लगना या फिर बिल्‍कुल भूख खत्‍म होने की शिकायत आने लगती है। इतना ही नहीं यलो फंगस जब जिस व्यक्ति को होता है तो उसका वजन लगातार कम होने लगता है। और धीरे धीरे ये काफी ज्यादा घातक हो जाता है। अगर किसी मरीज को पहले से कही पर भी कोई चोट लगी हो या कटा हो तो उस जगह से मवाद का रिसाव होने लगता है। उसके बाद मरीज का घाव काफी धीमी गति से ठीक होता है। इस दौरान मरीज की आंखें अंदर की तरफ धंस जाती हैं और शरीर के कई अंग काम करना बंद कर देते है।

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जाने यलो फंगस होने पर क्या करें

अगर किसी व्यक्ति को काफी समय से काफी ज्यादा सुस्‍ती आ रही हो या बहुत कम भूख लग रही हो तो या फिर उसका खाने का बिलकुल भी मन न करता हो तो उससे आपको बिलकुल भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जितना जल्दी हो सकें आपको व्यक्ति को डॉक्टर के पास लेकर जाना चाहिए। यलो फंगस का इलाज amphoteracin b इंजेक्शन है। जो कि एक ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटीफ़ंगल है।

जाने क्यों फैलता है यलो फंगस

आपको बता दें कि अभी तक की जानकारी के अनुसार लोगों में यलो फंगस गंदगी के कारण फैलता है। इसलिए आपको अपने घर के आस पास सफाई रखनी चाहिए। और जितना हो सके अपना और अपने घर वालों का ध्यान रखना चाहिए। अपने घर और अपने आस पास सफाई रख कर आप फंगस से छुटकारा पा सकते है। पुराने खाद्य पदार्थों को अपने घर से जल्द से जल्द हटाने से भी आप इस खतरनाक फंगस से बचा सकते है।

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लाइफस्टाइल

जानें ब्रेस्टफीडिंग और प्रेगनेंसी के दौरान कैसे बदलती है महिलाओं के खाने की जरूरतें

जाने प्रेगनेंसी के दौरान और बच्चे को जन्म देने के बाद महिलाओं को किस तरह के पोषण की ज़रूरत होती है


माँ बनना हर महिला के लिए एक बहुत ही खूबसूरत और खास पड़ाव होता है। ये पड़ाव महिलाओं के लिए जितना खास होता है उतना ही मुश्किल भी होता है। क्योकि ये वो बदलाव होता है जिसके बाद किसी भी महिला की ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाती है। प्रेगनेंसी और बच्चे को जन्म देना किसी भी महिला को शारीरिक और मानसिक दोनों तरीको से काफी ज्यादा थका देता है। इसलिए कहा जाता है कि जितना ध्यान आपको अपने पेट में पल रहे बच्चे को देना जरूरी होता है, उतनी ही जरूरत आपको अपनी खुद की सेहत का भी रखना चाहिए है। प्रेगनेंसी और ब्रेस्टफीडिंग ये दोनों फेज़ किसी भी महिला के लिए काफी ज्यादा डिमांडिंग फेज़ होते है। अगर इस समय पर महिलाओं को सही से पोषण ना मिले तो उन्हें स्वास्थ्य-संबंधी परेशानियां हो सकती है इतना ही नहीं यहाँ तक की आपका बच्चा कुपोषण का शिकार भी हो सकता है। तो चलिए आज हम आपको बतायेगे प्रेगनेंसी के दौरान और बच्चे को जन्म देने के बाद महिलाओं को किस तरह के पोषण की ज़रूरत होती है।

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ब्रेस्टफीडिंग के दौरान: क्या आपको पता है जब एक बच्चे का जन्म हो जाता है और उसके लिए जब उनकी माँ के स्तन में दूध बनने की शुरुआत होती है तो ऐसे में महिलाओं को प्रेगनेंसी के मुकाबले कहीं ज़्यादा पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। शायद आपने देखा भी होगा कि बच्चे के जन्म के बाद पहले 5, 6 महीनों में महिलाओं का वजन दुगुना हो जाता है। और बच्चे को सारा पोषण माँ के दूध से ही मिलता है। इसीलिए ब्रेस्टफीडिंग कराते समय महिलाओं को काफी ज्यादा एनर्जी की जरूरत पड़ती है।

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प्रेगनेंसी के दौरान: क्या आपको पता है प्रेगनेंसी के दौरान माँ और बच्चे के बेहतर मेटाबॉलिज़्म के लिए पोषक तत्वों की आवश्यकताएं बढ़ जाती हैं। महिलाओं में प्लेसेंटा और भ्रूण की ग्रोथ, एमनियोटिक फ्लुइड की मात्रा बढ़ाने के लिए और मैटर्नल टिशूज़ की अच्छी ग्रोथ के लिए बहुत ज्यादा पोषक तत्वों की ज़रूरत होती है।  आपने देखा होगा कि प्रेगनेंसी के दौरान महिलाओं का 10, 12 किलो वजन बढ़ जाता है। अगर महिलाओं का ये वजन न बढ़ें तो बच्चे को भरपूर मात्रा में पोषक तत्वों नहीं मिल पाएगा जिसके कारण वो कुपोषण का शिकार हो जाएगा।

ब्रेस्टफीडिंग और प्रेगनेंसी के दौरान महिलाओं की जरूरतें

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ये बात तो शायद हमें आपको बताने की जरुरत नहीं है कि प्रेगनेंसी के दौरान और ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली महिलाओं को कामकाजी महिलाओं के मुकाबले कहीं गुना ज़्यादा पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। बच्चा होने के बाद जब महिला उससे 6 महीने तक फीड करती है तो उस दौरान महिलाओं को एनर्जी और पोषण की दोगुनी ज़रूरत होती है। ब्रेस्टफीडिंग और प्रेगनेंसी के दौरान महिलाओं को संतुलित आहार, नियमित रूप से विटामिन और मिनरल सप्लिमेंट्स और नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करनी चाहिए ये उनके और बच्चे दोनों के लिए बेहद जरूरी है।

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लाइफस्टाइल

जाने क्या ब्रेस्ट फीडिंग कराने वाली और गर्भवती महिलाओं को लेनी चाहिए कोरोना वैक्सीन

जाने ब्रेस्ट फीडिंग कराने वाली और गर्भवती महिलाओं की लिए वैक्सीन कितनी सुरक्षित है


अभी हमारे देश में कोरोना की दूसरी लहर घातक रूप ले चुकी है। ऐसे में इस घातक और जानलेवा बीमारी से बचने का एकमात्र उपाय सिर्फ वैक्‍सीन ही है। अभी इस कोरोना वायरस से बचने के लिए इसके खिलाफ दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है। इस 1 मई से हमारे देश में 18 साल से अधिक आयु के लोगों को भी कोरोना का टीका लगाया जा रहा है। लेकिन इन सबके बीच एक अहम सवाल यह भी पैदा होता है कि जो भी महिलाएं बच्चों को दूध पिला रही हैं, क्या वे वैक्सीन ले सकती हैं या नहीं? तो चलिए इसके बारे में विस्तार से जानते है कि इससे लेकर आईसीएमआर की एईएफआई और नैगवैक कमेटी की सलाहकार डॉ एनके अरोड़ा क्या कहते हैं?

क्या ब्रश फीडिंग कराने वाली और गर्भवती महिलाएं लगवा सकती कोरोना का टीका

कोरोना जैसे घातक और जानलेवा बीमारी से लड़ने के लिए अभी पूरी दुनिया में टीकाकरण अभियान चलाया जा रहा है। जैसा की हम सभी लोग जानते है कि 16 जनवरी को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा कोरोना वैक्सीन की शुरुआत की गयी थी इस टीकाकरण अभियान के पहले चरण में ब्रेस्ट फीडिंग कराने वाली और गर्भवती महिलाओं को कोरोना की वैक्सीन न लगाने की सलाह दी गई थी। लेकिन अभी हाल ही में नेशनल एक्सपर्ट ग्रुप ऑन वैक्सीनेशन एडमिनिस्ट्रेशन कमेटी ने ब्रश फीडिंग कराने वाली महिलाओं को टीकाकरण पात्रता में शामिल करने की सिफारिश की है। इस सिफारिश में यह कहा गया था कि जिन महिलाओं के बच्चे 42 दिन से अधिक के है वो सभी महिलाएं कोरोना की वैक्सीन लगवा सकती है। जबकि गर्भवती महिलाओं के लिए नियम पहले वाले ही रहेंगे।

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अगर ब्रश फीडिंग कराने वाली और गर्भवती महिलाएं कोरोना वैक्सीन लगवाती है तो उनको इसका क्या प्रभाव पड़ेगा

जैसा की हम सभी लोग जानते हैं कि अभी हमारे देश में जितनी भी कोरोना वैक्सीन को प्रयोग की आपातकालीन अनुमति दी गई है, उन सभी को सुरक्षा और प्रभावकारिता के सभी मानकों पर जांचा गया है। लेकिन गर्भवती और ब्रश फीडिंग कराने वाली महिलाओं को कोरोना वैक्सीन के परीक्षण में शामिल नहीं किया गया था, इसलिए उन पर वैक्सीन का क्या असर होगा, इसका अभी को भी पुख्ता प्रमाण नहीं है। अगर अभी नेशनल एक्सपर्ट ग्रुप ऑन वैक्सीनेशन एडमिनिस्ट्रेशन कमेटी की नई सिफारिश के बाद यदि ब्रश फीडिंग कराने वाली महिलाओं को वैक्सीन दी जाती है तो उनको मामूली बुखार, वैक्सीन वाली जगह पर लाल निशान और बॉडी में हल्का दर्द आदि फील होगा। जिसे किसी को भी घबराने की जरूरत नहीं है।

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जानें कोरोना और लॉकडाउन के बीच प्रैक्टिकल क्लासेज कैसे कर रही स्टूडेंट्स के भविष्य को प्रभावित….

ऑनलाइन प्रैक्टिकल की क्लासेज में उतना समझ में नहीं आता- स्टूडेंट


पिछले साल अचानक हुई तालाबंदी ने लोगों घरों पर रहने के लिए मजबूर कर दिया था। ज्यादातर काम घरों से ही होने लेगे। इसमें पढ़ाई भी शामिल है। गरीब हो या अमीर हर कोई अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा को देने के लिए ऑनलाइन क्लासेज का सहारा लेने लगा। नर्सरी से लेकर पीएचडी के कोर्स वर्क तक सभी चीजें ऑनलाइन होने लगी। पढ़ाई के लिए अब कोई दूसरा विकल्प भी नहीं बचा था। अब ऑनलाइन क्लासेज का सिलसिला शुरु हुए एक साल हो गया है।

इस बीच पिछले साल के सत्र के स्टूडेंट्स और इस साल भी नए सत्र के छात्रों का सीधा पाला ऑनलाइन क्लासेज से पड़ा है। ऑनलाइन क्लासेज के सहारे स्टूडेंट्स थियोरी की क्लास को तो कर ले रहे हैं लेकिन प्रैक्टिकल की क्लासेज करने लिए स्टूडेंट्स को बहुत परेशानी हो रही है। जिसके कारण वह प्रैक्टिकल नॉलेज से नदारदर रह जा रहे हैं। जो उनके भविष्य के लिए कहीं न कहीं नुकसानदायक है।

जबतक टूल्स के साथ प्रैक्टिकल नहीं करेंगे तब तक क्लास का कोई मतलब नहीं…

दिल्ली विश्वविद्यालय के भारती कॉलेज में सॉइकोलजी ऑनर्स में बीए सेकेंड ईयर की स्टूडेंट्स पंखुडी शर्मा का कहना है कि स्टूडेंट्स और उनके पेरेंन्ट्स की सेहत को ध्यान में रखते हुए कॉलेज को बंद रखना का निर्णय तो सही है। ऑनलाइन क्लासेज में पढ़ाया भी सबकुछ जाता है। सभी चीजें समझ में आती हैं लेकिन प्रैक्टिकल की क्लासेज में थोड़ी परेशानी तो है। ऑनलाइन क्लासेज में प्रैक्टिकल भी कराया जाता है। लेकिन  जितना समझ आप सामने रहकर समझ सकते हैं उतना नहीं हो पाता है। पंखुडी का कहना है कि प्रैक्टिल क्लासेज में जो टूल इस्तेमाल होते हैं। उनको जबतक आप सामने से नहीं देखते हैं या उनके साथ काम नहीं करते हैं तब तक प्रैक्टिल क्लासेज का न तो मजा आता है और न ही चीजें पूरी तरह से समझ में आती है। हमें प्रैक्टिकल की क्लासेज दी जा रही है। लेकिन ऑनलाइन में  बहुत सारी समस्या है। ल महामारी के इस दौर में हमारे पास दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है।

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प्रैक्टिकल के कारण एक और साल हो सकता है बर्बाद

ऑनलाइन और प्रैक्टिल क्लासेज की परेशानी लगभग हर प्रोफेशनल कोर्सस में हो रही है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस यूनिर्वसिटी जमशेदुर(झारखंड) के बीडीएस के एक छात्र ने नाम ना बताने की शर्त पर कहा कि सेकेंड ईयर और थर्ड ईयर की प्रैक्टिकल क्लासेस कोरोना के कारण नहीं हो पाई है। पिछले साल लॉकडाउन के बाद से प्रैक्टिकल की क्लासेस बंद थी। दिसंबर के अंतिम सप्ताह में यूनिर्वसिटी को खोला गया था। लेकिन स्टूडेंट्स डर के कारण नहीं आएं। कुछ दिन क्लासेस हुई थी कि दोबारा से कोरोना को कहर शुरु हो गया है। मेरा पूरा कोर्स प्रैक्टिकल के बेस पर है। लेकिन अब जब स्थिति इतनी गंभीर है तो क्या किया जाए। यूनिर्वसिटी की तरफ कहा गया है कि सबकु नॉर्मल होने पर प्रैक्टिल की क्लासेस करवाई जाएगी। लेकिन परेशानी तो स्टूडेंट्स को है उनका एक और साल इसके लिए खराब हो सकता है।

सिर्फ थियोरी से नहीं चलेगा

पिछले साल से शुरु हुआ लॉकडाउन का सिलसिला स्टूडेंट्स की पढ़ाई पर पूरी तरह से असर डाल रहा है। कभी स्टूडेंट्स के पास इंटरनेट की परेशानी है तो कहीं बिजली की, इन सबके बीच प्रैक्टिल की क्लासेज न होना स्टूडेंट्स के लिए भविष्य की चिंता बढ़ा रही है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय(वर्धा) में एमएसडब्ल्यू की छात्रा पायल रामटेके का कहना है कि एमएसडबल्यू की क्लासेज जब से शुरु हुई थी। उस वक्त लॉकडाउन ही लगा हुआ था। कोरोना कम हुआ भी तो यूनिर्वसिटी में ऑनलाइन क्लासेज ही करवाई गई है। मेरा कोर्स ऐसा है सिर्फ थियोरी से नहीं चलेगा। जब तक बाहर जाकर प्रैक्टिल नॉलेज न लें, तब तक कोर्स का कोई मतलब नहीं है। बीए के दौरान हम ज्यादातर फील्ड मे जाते थे। कई एनजीओ में भी गए थे। लेकिन इस बार तो कुछ भी नहीं हो पा रहा है। सिर्फ ऑनलाइन क्लासेज ही हो रही है।

लगातार बढ़ते कोरोना केस और ऑनलाइन क्लासेज के बीच हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए प्रैक्टिकल नॉलेज की कमी होना तय है।

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महामारी के इस दौर में इजरायल और फिलीस्तीनी की लड़ाई विश्व को किस दिशा में ले जा रही है…

रविवार तड़के ही गाजा पर हमले में 23 लोगों की मौत


लंबे समय से चल आ रहा इजरायल और फिलीस्तीन विवाद एक बार फिर कुछ दिनों से खबरों का हिस्सा बना हुआ है। रमजान के अलविदा नमाज के बाद शुरु हुई हिंसा अभी तक थमी नहीं है। इसको लेकर अब विश्व की कई शक्तियां भी दो हिस्सों में बंट गई है। रविवार को गाजा पट्टी पर इजरायल ने तड़के बमबारी कर दी। इस हमले में 23 लोग घायल हो गए और 50 से अधिक लोग घायल हो गए हैं। इतना ही नहीं कई रिहाईशी बिल्डिंग भी क्षतिग्रस्त हो चुकी है। हवाई और जमीनी दोनों स्तर पर लडी जा रही इस लड़ाई के बारे में  इजरायल आर्मी के एक अधिकारी ने अपने बयान में कहा  है कि आसमान पर इजरायली प्लेन और जमीन पर गाजा पट्टी पर सेना हमले को अंजाम दे रही है।

इस्लामिक देश हुए एकजुट

लगातार बढ़ती हिंस के बीच हमास नेता इस्माइल हनीयेह इस लड़ाई से पीछे नहीं हटना चाहते हैं। वहीं दूसरी हिंसक झड़प के बीच इस्लामिक देश एकजुट हो गए हैं। 57 सदस्यीय इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कॉपरेशन ने फिलीस्तीनियों के खिलाफ इजरायल की कारवाई की निंदा करते हुए एक संयुक्त बयान जारी कर दिया है। इसमें पाकिस्तान ने अपने प्रस्ताव में इजरायली कारवाई को लेकर संयुक्त रुप से बयान जारी करने की मांग की थी।

ओआईसी में पाकिस्तान के इस प्रस्ताव का एक ध्वनि से समर्थन दिया गया। जिसके बाद यह मुद्दे संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाया गया। इस बीच सभी इस्लामिक देशों ने अपनी-अपनी तरह से फिलीस्तीन का समर्थन किया। ट्विटर पर #westandwithpalestine भी ट्रेंड किया गया। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसके समर्थन में आ सकें। रविवार को इस बार फिर हुए हमले के बीच अमेरिका का राष्ट्रपति जो बाइडेन ने शांति बनाई रखने की अपील की है। वहीं दूसरी ओर गाजा शहर में हुए हमले में एसोसिएटेड प्रेस और अन्य मीडिया हाउस भी उस बिल्डिंग में हैं जहां आज हमला हुआ। इस हमले के बाद जो बाइडेन ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर बातचीत कर नागरिकों और पत्रकारों की सुरक्षा को सुनिश्चित किया।

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क्या है पूरा मामला

10 मई को रमजान की अलविदा नमाज के दिन यरुशलम स्थित अल-अक्सा मस्जिद में फिलिस्तीनियों और इजरायली सुरक्षा बलों के बीच झड़प हो गई थी। इस झड़प में दर्जनों फिलीस्तीनी घायल हो गए और यही शुरु हुआ इजरायल और फिलीस्तीन के बीच लड़ाई जो पिछले छह दिनों से चल रही है। हिंसक झड़प की जवाबी कारवाई करते हुए फिलीस्तीन के चरणपंथी गुट ने रॉकेट दाग दिए। जिसके जवाबी एक्शन में इजरायल ने हमास को भारी नुकसान पहुंचाया है। अब तक हुई हिंसा में गाजा में कम से कम 145 फिलिस्तीनियों की मौत हो गई है। जिसमें 41 बच्चे और 24 महिलाएं । वहीं दूसरी और आठ इजरायली मारे गए हैं।

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कानपुर के दो भाईयों ने शुरु की फ्री मेडिकल सेवा, कोरोना में लोगों की ऐसे कर रहे हैं मदद

बिना किसी वैरिफिकेशन के लोगों को दी जाती हैं, मेडिकल सुविधा


भारत अनेकता में एकता वाला देश हैं। जहां कई धर्म जाति के लोग एक साथ रहते हैं। यहां के भाईचारे की पूरी दुनिया में मिसाल है। ऐसी ही मिसाल कोरोना के इस दौर में भी देखने के मिल रही है। मुसीबत की इस घड़ी में हर कोई एक-दूसरे की मदद करके लोगों को बचाना चाह रहा है। कोई किसी को दो टाइम की रोटी देकर तो कोई किसी को मेडिकल की सुविधा देकर। ऐसी ही एक मदद कानपुर के दो भाई कर रहे हैं। जिन्होंने गुरुनानक मेडिकल सेवा एनजीओ की मदद से लोगों तक दवाईयों की सुविधा पहुंचाने का बीड़ा उठाया है। इतना ही नहीं कोरोना के इस दौर में लोगों तक ऑक्सीजन की मदद पहुंच रहे हैं। तो चलिए आज जानते हैं गुरुनानक मेडिकल सेवा के बारे में…

तीन साल पहले शुरु की सेवा

कानपुर निवासी दविंदर सिंह और उनके भाई गुरप्रीत सिंह लोगों को मेडिकल की सेवा दे रहे हैं। दविंदर सिंह का कहना है कि उन्होंने यह सेवा तीन साल पहले शुरु की थी। इसको शुरु करने के पीछे मुख्य मकसद था कि दवाई के अभाव किसी को अपनी जान न गंवानी पड़े। दविंदर सिंह और उनके भाई मुख्य रुप से बिजनेसमैन हैं। यह एनजीओ उन्होंने लोगों को सेवा के लिए खोला है। ताकि किसी गरीब की जान बचाई जा सकें।

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कानपुर में लोगों को पोटेब्ल ऑक्सीजन बांटा जा रहा है

कोरोना के इस दौर में जब लोग अपनी-अपनी जान बचाने के लिए परेशान हैं तो इस मुश्किल दौर में भी इन दोनों भाईयों ने लोगों की जान बचाने के बारे में सोचा है। दविंदर सिंह से जब हमने बात करके कोरोना के इस दौर में उनके द्वारा दी जा रही मेडिकल सुविधा के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि फिलहाल वह लोगों को पोटेब्ल ऑक्सीजन कन्टेंर दे रहे हैं। ताकि किसी व्यक्ति को बहुत इमरजेंसी हो तो वह छह से सात घंटे के लिए इसे इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन अब हम ऑक्सीजन सिलेंडर फील करने का भी काम शुरु करेंगे। कोई भी व्यक्ति इस सुविधा का लाभ ले सकता है।

कानपुर के दो भाईयों ने शुरु की फ्री मेडिकल सेवा, कोरोना में लोगों की ऐसे कर रहे हैं मदद

अमीर-गरीब कोई भी इस सुविधा का लाभ ले सकता है…

दविंदर बताते हैं कि उन्होंने मेडिकल की इस सुविधा के लिए किसी खास तबके के लोगों को ही नहीं चुना है। बल्कि इसकी सुविधा अमीर गरीब कोई भी ले सकता है। इसके लिए हम कोई वैरिफिकेशन भी नहीं करते हैं। इस बारे में उनका कहना है कि एक तरफ लोग बीमारी से परेशान है दूसरी तरफ वैरिफिकेशन के नाम पर लोगों को परेशान करना सही नहीं है। इसलिए हमारे यहां जो भी आता है। हम उसके लिए हर संभाव मदद करते हैं। मेडिकल सुविधा के साथ-साथ ब्लड की अगर किसी को जरुरत होती है तो उनकी मदद की जाती है।

अगर आप भी कानपुर में रहते है और अगर किसी मेडिकल इमरजेंसी में फंस जाते हैं तो गुरुनानक मेडिकल सेवा से संपर्क कर सकते हैं। इसके लिए आप गुरुनानक मेडिकल सेवा  नाम के फेसबुक पेज पर जाकर इनसे संपर्क कर सकते हैं।

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