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पीरियड पेन से मुक्ति पाने के लिए प्रभावी तरीके

पीरियड पेन से मुक्ति


लड़कियों के लिए महीने के ‘वो दिन’ सबसे मुश्किल होते। ना तो काम करने की हिम्मत होती ही और ना ही कुछ भी सहने की शक्ति। पीरियड के दिनों में लड़कियां अक्सर दर्द, मूड स्विंग और चिड़चिड़े होने के दौर से गुज़रती है। इस बात से कोई मना नहीं कर सकता कि पीरियड्स में होने वाला दर्द और क्रेम्पस के कारण बहुत ही ज़्यादा पीड़ा और तकलीफ होती है।

पीरियड पेन

तभी हम लाए है पीरियड पेन से मुक्ति के ऐसी तरीके जो बहुत ही प्रभावशाली है और उन दिनों के होने वाली तकलीफ से आपको राहत मिल सकती है।

दादी नानी का नुस्खा

ये सबसे पुराना तरीका है। दादी कहती थी की उन दिनों में गरम पानी की बोतल से सिकाई करनी चाहिए। सिकाई करने से क्रेम्पस ठीक हो जाते है। दिन में कम से कम दो बार 10 से 15 मिनट की सिकाई से ही काफी फर्क पड़ सकता है।

सिकाई करे

बादाम अजवाइन

बादाम और अजवाइन को भून लें और उसमें थोड़ी सी शक्कर/ गुड़ या शहद दाल दे। इससे ना सिर्फ आपको दर्द में आराम मिलेगा पर आपको ताकत भी मिलेगी।

हल्दी दूध

हल्दी वाला दूध हर बीमारी के उपचार के लिए फायदेमंद माना जाता है। पीरियड में हल्दी वाला दूध पीने से दर्द कम होता है और आपके शरीर को शक्ति और ताकत भी मिलती हैं।

पानी

इन दिनों में अक्सर शरीर में पानी की कमी हो जाती है। इसलिए ध्यान रखे की आप ज़्यादा से ज़्यादा पानी पियें। इससे सीधे तरीके से तो नहीं पर अप्रत्यक्ष रूप से दर्द और क्रेम्प में राहत मिलती है। आप अपनी पानी की बोतल में पुदीना या नींबू भी मिला सकते है।
हर्बल चाय
पीरियड्स में ये बेहतर होगा की आप किसी भी प्रकार के कैफ़ीन वाले पदार्थों का सेवन न करे। कॉफ़ी, कोल्ड ड्रिंक या चाय ना पिए। उसकी जगह आप हर्बल चाय पिए। ये आपके मासपेशियों को आराम देता है और क्रेम्पस के कारण होने वाले दर्द को कम करता है।

गर्म शावर

शरीर और दिमाग को शांत करने के लिए आप गर्म शावर ले। इससे आपके शरीर को थोड़ा आराम मिलेगा और आपका दर्द भी कम होगा।

चॉकलेट

वैसे तो चॉकलेट में कैफ़ीन होती है। पर चॉकलेट खाने से आपके में स्ट्रेस हॉर्मोन्स की मात्रा कम होती है। आपके मूड स्विंग ठीक होते है और क्रेम्पस के दर्द में भी बहुत फर्क पड़ता हैं।

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जानिए क्या होते है एक सुस्त व्यक्ति के लक्षण

सुस्त व्यक्ति के लक्षण


सुस्त लोगो की ज़िन्दगी बहुत ही अजीब किस्म की होती है। उनका काम बिखरा हुआ रहता है और उनकी ज़िन्दगी जितनी सुलझी हुई लगती है उयनी असल में होती है। कहते है कि आलस्य सबसे बुरी बला है। अब ये बला कितने लोगो की आदत बन चुकी है इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है। यही नही लोगो की बदलती जीवनशैली शैली के कारण आजकल लोगो में आलस ज़्यादा ही बढ़ गया है। लोग पहले के ज़्यादा सुस्त होने लग गए है। एक सुस्त व्यक्ति की निशानी यही होती है कि वो हर काम को टालता रहता है।

एक सुस्त व्यक्ति को पहचान ने के लिए आप उसको कुछ दो-चार काम बताए, तब आपको पता चलेगा कि वो व्यक्ति सुस्त है या फिर चुस्त है। सुस्त व्यक्ति के लक्षण होते है। अगर आप किसी में या फिर खुद में भी ये लक्षण देखें तो समझ जायेगा की आप भी सुस्त लोगो की श्रेणी में आते है।

सुस्त व्यक्ति
  1. आप आमतौर पर सुस्त लोग काम करने से बचते है। कोई भी सुस्त व्यक्ति या तो काम को टाल देगा या फिर उस कसम को जल्दी से करने के लिए कोई शॉर्ट कट ढूंढ लेगा। और अगर इनका बस चले तो ये हर काम किसी और व्यक्ति को सौंप दें।
  2. जबभी कोई प्लान कैंसिल होता है तो आपको सबसे ज़्यादा ख़ुशी होती है। आप जब खुद भी बहाना बनाते है तब आप कुछ ज़रूरी काम का बहाना बनाते है और असल में आप पूरा समय घर में ही रहते है।
  3. यहाँ पढ़ें : 6 तरीके जो बना देंगे वृद्धावस्था को खुशहाल

  4. आपको हर काम के बीच में और उसके बाद ब्रेक लेना होता। आपको काम से कोई फर्क ही नही पड़ता। सुस्त लोग अक्सर इस बात की परवाह नही करते की काम कितमे ज़रूरी है। अगर उन्हें आराम करने के लाइट ब्रेक चाहिए तो उन्हें कोई नही रोक सकता।
  5. सुस्त लोग कभी भी, कहीं भी सो सकते है। उन्हें फर्क नही पड़ता की वो किस स्तिथि या अवस्था में है या कहाँ है या फिर वो जगह या अवस्था आरामदायक है या नही। उन्हें आराम से कोई लेना देना नही होता। उन्हें सिर्फ नींद से मतलब होता है।
  6. सुस्त लोग अक्सर इतने निकम्मे होते है कि वो एक ही घर के दूसरे कमरे में बैठे व्यक्ति से कुछ बात करने या कुछ माँगने के ये उन्हें फोन या मैसेज करते है। क्योंकि वह खुद उठकर नही जाते तो इसलिए वो खुद आवाज़ लगाने का कष्ट भी नही उठाते।
  7. सुस्त व्यक्ति कहीं भी सो सकते है
  8. अक्सर किसी भी आम व्यक्ति में बहुत सी चीज़ो पर काबू करने की क्षमता होती है। वो अपने गुस्से पर या अपनी भावनाओं पर काबू पा लेते हैं। पर एक सुस्त व्यक्ति तब तक पेशाब रोकता है जब तक वो रोक सकता है।सुस्त व्यक्ति इस कार्य को तब तक टालता रहता है जब तक वो टाल सकता है, फिर चाहे वो जितना भी समय हो।
  9. सुस्त लोगो की एक ख़ास बात ये होती है कि वो बहुत ही लचीले होते है। दूर गिरी हुई चीज़े वो अपने पैरों से उठाते है, वो भी लेटे लेटे। और अगर वो उस चीज़ तक नही पहुँच पाते तो वो यही समझते है कि उन्हें उसकी ज़रूरत नही है।
  10. खाना जैसा भी हो वो खा लेते है। सुस्त लोग अक्सर खाना गर्म नही करते और उसे ऐसे ही खा लेते है। उन्हें खाने के लिए जो मिल जाए वो खा लेते है। कपड़ो पर गिरे चिप्स या खाने को वो झाड़ के गिराते नही पर उसे खा लेते है।
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स्वादिष्ट पकवान

जानिए क्रिसमस डेसर्ट के लिए क्या बनाए

क्रिसमस डेसर्ट

क्रिसमस अब ज़्यादा दूर नहीं है। कुछ ही दिनों में क्रिसमस और नए साल की उत्सुकता हम सभी को होगी। अब ये समय ऐसा है जब लगभग हर किसी की परीक्षाएं समाप्त हो चुकी है और हर कोई अब पार्टी करने के लिए तैयार है। विदेशों में लोग क्रिसमस के दौरान सब से ज़्यादा उत्साहित, डेसर्ट के लिए होते है। अब जब भारत में भी इसका प्रचलन है तो यहाँ के लोग कैसे पीछे रह सकते है?

क्रिसमस डेसर्ट के लिए हमारे पास आपके लिये कुछ ऐसे सुझाव है जो आप कुछ ही समय में तैयार कर सकते है :-

  • रॉक चॉकलेट्स

अपनी पसंद के चॉकलेट कंपाउंड ले। 1 कप चॉकलेट पिघला कर उसमे ½ कप भुने हुए बादाम, अखरोट आदि अच्छे से घोल ले और चम्मच से एक प्लेट में डालते रहे। अपनी इच्छा अनुसार इसका आकार तय करे। इन नट्स के कारण ही इन्हें पत्थर जैसा रूप मिलेगा। तभी इन्हें रॉक चॉकलेट कहते है।

फ़ज बॉल्स
  • फ़ज बॉल्स

एक पैन में ½ कप कोको पाउडर, 1 कप चीनी,1/4 कप मक्खन और ¼ कप दूध धीमी आंच पर सेकते रहे। इसको अच्छे से चलाए वरना इसके घोल में गांठे बन जाएंगी। जब आप को हल्का गाढ़ा घोल मिल जाए तब गैस बंद करदे और ठंडा होने दे। ठंडा होने के बाद इसके बॉल्स बना ले।

  • चॉकलेट स्ट्रॉबेरी

इसे बनाना बहुत ही आसान है। कुछ ताज़ी स्ट्रॉबेरी ले और उन्हें अच्छे से धो ले। चॉकलेट को पिघला कर स्ट्रॉबेरी उसमे डुबो दे और फिर एक प्लेट में ठंडा होने के लिए रख दे।10 से 15 मिनट बाद आप इसे खा सकते है।

  • मार्शमैलौ कुकी

मार्शमैलौ और नकली मक्खन को धीमी आंच पर पिघला ले। उसे तब तक चलाए जब तक आपको एक चिकना घोल ना मिल जाए। इसमें अब आप अपने पसंद की चीज़ें डाल दे जैसे की अखरोट, सीरियल या चॉकलेट भी दाल सकते है। हाथों को चिकना कर के इसको आकार दे।

  • चॉकलेट ब्राउनी

¼ कप मैदा में ¼ कप चीनी को 2 चम्मच कोको पाउडर के साथ घोल ले। जब सब कुछ मिल जाए तब उसमें 2 चम्मच मक्खन और ¼ कप दूध दाल कर घोल बना ले और उसे अच्छे से चलाए ताकि उसमे गांठे ना बने। इसे 1 से 1.30 मिनट के लिए माइक्रोवेव में पकने दे। चॉकलेट या आइस क्रीम के साथ पेश करे।

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आप क्या बना रहे है: बेहतर सीवी या बेहतर इंसान

बेहतर सीवी या बेहतर इंसान


कहते है कि अगर एक अच्छी और आरामदायक ज़िन्दगी जीनी है तो उसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। सारी ज़िंदगी निकल जाती है पर वो संतुष्टि नहीं मिल पाती जिसकी हम उम्मीद करते है। बचपन में स्कूल में मेहनत करते है, फिर कॉलेज में और भी दफ्तर में। और ये सारी मेहनत हम अनुभव और कामयाबी के लिए करते जिसका प्रयोग हम अपने सीवी को बेहतर बनाने के लिए करते है।पर इस भागदौड़ में हम ये भूल जाते है कि हम आखिर चाहते क्या है? हमे चुनाव करना होता है बेहतर सीवी या बेहतर इंसान बनने में।

बेहतर इंसान बनने से मेरा मतलब है कि खुद को इस काबिल बना लो की आपकी काबिलियत आपका जूनून बन जाए। ऐसा जूनून जो हमे अपनी मंज़िल तक पहुंचाए। हम खुद अपने पैरों पर खड़े हो सके। आपको खुद का मूल्य तय करना है। आपको अपने सीवी का नहीं ओर अपनी काबिलियत और अपने व्यक्तित्व का मूल्य बढ़ाना। खुद को ऐसा बनाना है कि आपका परिचय आपका सीवी नहीं पर आपका व्यक्तित्व और आपका हुनर दे।

सीवी ज़रूरी या काबिलियत?

यहां पढ़ें : चीज़े जो आप खुद के साथ कभी ना करे

अब अगर बात करे की क्यों आपका अपने मूल्य को बढ़ाना ज़रूरी है तो आपको एक उदाहरण देते है। एक 500₹ का नोट आपको दिया जाए तो आप खुशी खुशी वो ले लेंगे। अगर उसी नोट को मोड़ दिया जाए तो भी आप उसको स्वीकार कर लेंगे। और अब कर उसको मोड़तोड़ कर कुचल दिया जाए तो भी आप उसे लेना चाहेंगे। क्योंकि चाहे कुछ भी हो जाए उस नोट की कीमत और मूल्य कभी नहीं बदलेगी।

उसी प्रकार चाहे ज़िन्दगी आपको मोड़े, तोड़े या कुचले आपका अस्तित्व और आपकी कीमत कभी नहीं बदलेगी। अपने आप को और अपनी काबिलियत को इतना ज्यादा निखार लो की ज़िन्दगी चाहे कुछ भी कर ले, ज़िन्दगी के किसी भी पड़ाव में आप कमज़ोर ना पड़े और आपका मूल्य कभी कम न हो। आप चाहे कोई भी काम करते हो, पर उस काम को इतनी शिद्दत से करे की आप उस में सबसे बेस्ट हो जाए।

माना कि खुद को कुछ बनाने का सफर इतना आसान नहीं होता। पर अगर इस सफर में आप हर मान जाओ तो भी नुक्सान आप ही का है। ज़िन्दगी जीनी ही है तो एक जज़्बे के साथ जियो ताकि जब मारो तब दिमाग में सिर्फ सुन्दर यादे हो, अधूरे सपने नहीं। आपका व्यक्तित्व और हुनर ही लोगो को याद रहेगा। आपका सीवी चाहे जितना ही बढ़िया क्यों ना हो, अगर आप अच्छे इंसान नहीं है आपके उस सीवी का कोई फायदा नहीं है।

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जानिए क्या होती है घर के बुजुर्गों की उम्मीदें

घर के बुजुर्गों की उम्मीदें


कहते है हम जीवन की शुरुआत और जीवन का अंत अकेले करते है। हम ना तो किसी से के साथ आते है और ना ही किसी के साथ जाते है। पर माना जाता है कि जब हम जन्म लेते है तब दुनिया के किसी कोने में कोई व्यक्ति जन्म लेता है और उसी प्रकार जब हम मरते है तब भी दुनिया के किसी कोने में कोई आखरी साँसे ले रहा होता है। शायद तभी हमें एक परिवार मिलता है जो इस अकेलेपन को दूर करने में मदद कर सके। और शायद यही कारण होता है कि हमारे घर के बुजुर्गों की उम्मीदें अपने परिवार से ज़्यादा होती है।

बुढ़ापा एक ऐसा दौर है जहाँ लोग बहुत ही लाचार हो जाते है। उनके पास ना ही कुछ करने की क्षमता होती है और ना हिम्मत। बिमारी, कमज़ोरी और उम्र के जाल में फंसे ये सभी लोग चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते। उनकी खुशियाँ उनके परिवार के साथ होती है। उनका पूरा दिन हमारी इंतज़ार में निकल जाता है। अपने परिवार से ही घर के बुजुर्गों की उम्मीदें होती है।

बुज़ुर्गो की होती है उम्मीदें

जानते है कि उनकी उम्मीदे क्या होती है:

  • समय

हम समय की कमी के लिए परेशान होते है और वो हमारे थोड़े से समय की उम्मीद होती है। समय ऐसी चीज़ होती है जो उनके पास बहुत ज़याद होता है और उनके परिवार के पास बिलकुल नहीं होता। वो बस इसी चीज़ की उम्मीद करते है कि उनका परिवार उनके साथ कुछ समय बिताए। उनके साथ बैठ कर कुछ बाते करे।

यहाँ पढ़ें : क्यों माँ के बिना ज़िन्दगी होती हैं मुश्किल

  • पालन

अक्सर ऐसा होता है कि हम जाने अनजाने में घर के बड़े बुजुर्गों की बातों को सुन के अनसुना कर देते है। वो कोई काम हमे बोलते रह जाते है पर हम वो अपनी ज़रूरत और ऊनी सुविधा अनुसार करते है। हम ये सोचते ही नहीं की उन्हें उस चीज़ की ज़रूरत हो सकती है। हम उनके आदेशों का पालन ही नहीं कर पाते।

प्यार और इज़्ज़त की करते है उम्मीद
  • ज़रूरत

हर व्यक्ति की तरह, बुज़ुर्गो की भी कुछ ज़रूरते होती हैं। अपनी व्यस्त दिनचर्या में हम ये देख और समझ ही नही पाते की हम उनकी ज़रूरतों और इच्छाओं को नज़रअंदाज़ कर रहे है। वो कुछ ज़्यादा नही चाहते, वो बस यही चाहते हैं कि हम उनको उनकी ज़रूरत की चीजो की कमी ना होने दें।

  • इज़्ज़त

घर के बुज़ुर्गो ने ही सब को इस काबिल बनाया है कि वो अपने पैरों पर खड़ा हो कर, इज़्ज़त और शौहरत कमा सके। पर हम इज़्ज़त कमाने में इतना व्यस्त हो जाते है कि हम भूल ही जाते है कि अपने परिवार के बुज़ुर्गो की इज़्ज़त करना भूल जाते है। हम ये भूल जाते है कि इज़्ज़त और प्यार का महत्व हमे इन्होंने ही सिखाया था।

लोगो की उम्मीदों पर खरा उतरने की इस दौड़ में हम अपने नींव से इतनी आगे निकल आये है कि अब पीछे मुड़ कर देखने का हम सोचते भी नहीं है। अपने परिवार की इज़्ज़त करना सीखें, उन्हें वही समय और प्यार दे जो उन्होंने आपको दिया है। उनकी जीवन हर समय आप ही के आस पास रही है। खुद को उनसे दूर ना करे।

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क्यों मिलना चाहिए दलितों का हक़ और आवाज

दलितों का हक़ और आवाज़


21वी सदी में जीते हुए भी हम भेदभाव करना नहीं भूले। लोगों को उनके नाम/उपनाम के आधार पर उनका काम बताने वाले हम लोग, आज भी सदियों पुरानी मान्यताओं के आधार पर जिए जा रहे है। वैसे तो हम मॉडर्न ज़माने के है और वक़्त के साथ आगे बढ़ रहे है। पर जनाब, सिर्फ आप बढ़ रहे है, आपकी सोच आज भी ग्रंथो में अटकी हुई है। अपने हक़ का तो आपको पता है, पर आपकी ज़िम्मेदारियों का क्या? एक अच्छा और मॉडर्न इंसान होने के नाते ये आपका फ़र्ज़ बनता है कि आप किसी भी प्रकार के भेदभाव को बढ़ावा न दे। दलितों का हक़ उन्हें दिलाए और अपने स्तर पर ही भेदभाव रोकने की शुरुआत करे।

दलितों की श्रेणी आज के समय में भी इतनी पिछड़ी हुई है कि उन्हें अपने अधिकार एयर हक़ का कोई अता पता ही नहीं है। हैरानी की बात तो ये है कि बड़ी बड़ी बातें करने वाले लोगो को उनके अस्तित्व आउट जीवनशैली का कोई अंदाज़ा भी नहीं। उनकी पीड़ा और उनके दुखो का हम शायद अनुमान भी नहीं लगा सकते। हम भाग्यशाली है कि हमे एक बहुत ही सुखद जीवन मिला है। हमारे दर्द और परेशानियां हमारे किसी जात में पैदा होने के कारण नहीं है।

दलित समाज

पंजाब, तमिल नाडु और गुजरात जैसे राष्ट्रों में आज भी दलितों के प्रति ऐसी मान्यताएं है, जो आपको किसी भी तरह से आधुनिक युग का नहीं बतलाता। दलित जात वर्षो से अत्याचार सहता आ रहा है। कभी उनको दास या गुलाम बना के रखा जाता था तो कभी उनको उनकी औकात बता कर उनसे गंदे काम करवाए जाते। दलित औरतों को मारा पीटा जाता और उनका बलात्कार भी किया जाता। और ये कोई ऐसी बात नहीं है जो आप नहीं जानते।

हर किसी को सच मालुम है फिर भी सब चुपी लगाए हर चीज़ का मज़ा लिए जा रहे है। आखिर किसी को क्या फर्क पड़ता है। अब किसी भी व्यक्ति का किसी भी जात में पैदा होना महज़ हादसा था। किसी ने पहले चुनाव या निर्णय थोड़ी न लिया था। अगर किसी के पास भी ये हक़ या ये शक्ति होती तो शायद वही सबसे ताकतवर और सबसे ज़्यादा पूज्य व्यक्ति होता। ज़िन्दगी हमें वरणाधिकार देती तो शायद हम वही चुनते जो हमे सही लगता। पर ज़िन्दगज तो आने हिसाब से चलती है।

बदलाव की ज़रूरत

किसी भी व्यक्ति का दलित होना इस बात कर फैसला नहीं करता की वो किस काम के लायक है। अगर याज के समय में भी दलितों का हक़ उन्हें नही मिला तो शायद हम से ज़्यादा नाइंसाफी करने वाला कोई नहीं होगा। शुरआत खुद से करे। दलितों को बुलाए जाने वाले नामो से किसी को अपमानित ना करे। उदाहरण के लिए किसी को छुड़ा या चमार गाली या अपशब्द के रूप में ना कहे। सोच बदलने की कोशिश करे। देश अपने आप बेहतर हो जाएगा।

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क्या होता है जब माँ का अंधविश्वासों पर भरोसा ज़्यादा होता है।

माँ का अंधविश्वासों पर भरोसा


हमारी माँ सबसे प्यारी होती है। माँ हर किरदार निभाती है। उसका हर ये किरदार हमे बहुत अच्छा लगता है। पर जब हमारी माँ का अंधविश्वासों पर भरोसा बढ़ जाता है तब वही अच्छी और प्यारी माँ हमारी परेशानी का कारण बन जाती है। उसका अंधविश्वास हम सभी के लिए परेशानी पैदा कर देता है। और फिर उसे जितना भी समझा लो की उसका मान्यता विश्वास नहीं पर महज़ एक मिथ्या है।

शुभ दिन पर ये काम नहीं।

जब माँ का अंधविश्वासी पर भरोसा ज़्यादा हो जाता है तब अक्सर हमे इन सभी चीज़ो से गुज़रना पड़ता है:-

शुभ दिन का झंझट

हर मंगलवार, गुरुवार और शनिवार बहुत ही शुभ दिन हो जाते है। इन दिनों पर नाख़ून काटना, बाल कटवाना और कपडे धोना बिलकुल मना है। यही नहीं इन दिनों पर माँसाहार खाना मतलब कुछ अशुभ करना है।

बिल्ली का रास्ता काटना

अंधविश्वासों को मानने वाली माँ के लिए अगर किसी भी काम से पहले अगर बिल्ली रास्ता काट जाए या फिर कोई छींक दे तो वो काम नही करना चाहिए। अशुभ होता है। और वही काम अगर करना ज़रूरी है तो उसे कुछ समय बाद किया जाए।

‘नज़र लग गई हैं’

घर परिवार में आयी कोई भी परेशानी या बीमारियों का कारण माँ यही देती है कि घर को किसी की बुरी नज़र लग गयी है। बच्चो की बीमारी किसी और कारण से नहीं पर पड़ोसियों और रिश्तेदारों की बुरी नज़र लगने की वजह से हुई है।

पीछे से टोकना

घर से बाहर निकलते हुए अगर कोई पीछे से टोक दे तो उनको नहीं सुनना चाहिए। पीछे से टोकना बहुत बुरी बात है। अगर आप अपनी माँ को भी पीछे से टोक दे तो वो आपको बहुत डाँटती है।

बाबा जी का फंडे

अंधविश्वासों में मानने वाली माँओ में कुछ ऐसी होती है जो बाबाओं के लफड़े में फँस जाती है। परिवार का हर काम उनके अनुसार ही चलता है। उनके द्वारा दी गई आभूषण और तरीको पर ही काम किये जाए तो ही अच्छा होता है।

जानवर को खिलाओ

माँ का अक्सर ये मानना होता है कि अगर जानवरो को खाना डाला जाए तो वो हमारे लिए शुभ होता है, हमारे सारे काम बनने लग जाएंगे। ऐसा करने से हमारी सभी दुआएँ कबूल हो जाती है।

माँ की मान्यता है।

कभी वो हमारी दोस्त बन जाती है, तो कभी बच्ची बन कर हमारे साथ हर शरारत में हमारा साथ निभाती है। मम्मी की यही छोटी बड़ी बातें कभी हमे परेशान करती है तो कभी हँसने का कारण बन जाती है। माँ जैसी कोई नही होती। और माँ जैसी भी हो, उनकी मान्यताएँ चाहे जो भी हो वो हमारे भले के लिए ही होती है।

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चीज़े जो आप खुद के साथ कभी ना करे

जानिए खुद के साथ कभी ना करे


ऐसी चीज़ें करना जिनके लिए हम तैयार ना हो या जो हमे पसंद ना हो, उसके लिए हमारी ज़िन्दगी बहुत छोटी है। हम ना जाने जितनी ही कोशिश क्यों ना कर ले लोगो को हम से कुछ न कुछ शिकायत रहती है। अब शिकायते अगर सुननी ही है तो क्यों न कुछ ऐसा कर के सुने जिससे हम खुद छोटा न महसूस करे। दुसरो के लिए और उनके हिसाब से जीना उतना बेमतलब है जितना दीवारों से बात करना। एक डसुखी ज़िन्दगी जीने के लिए आपको समाज से अलग चलना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि वो रास्ता बहुत आसान है। पर अगर आप उनके साथ चलेंगे तो वो आपको कुचल के आगे बढ़ते रहेंगे। खुद को थोड़ा सम्मान दे और खुद के साथ कभी कुछ ऐसा न करे जिससे आपका अस्तित्व ही ना रहे।

स्वतंत्र बने

हमेशा याद रखे और खुद के साथ कभी ना करें

खुद को दोषी मानना

गलतियां इंसान से ही होती है। अगर आप खुद को हर गलती के लिए दोषी मानते रहेंगे तो ये एहसास आपको अंदर ही अंदर खा जाएगा। आगे बढ़ना तो छोडो आप पीछे भी नहीं आ पाएँगे।

ज़्यादा सोचना

ज्यादा सोचने पर आप खुद को और अपने दिमाग को बस परेशान करते हैं। हम एक ही स्थिति में अटके रह जाते हैं। उससे आगे बढ़ना या निकलना हमारे लिए बहुत मुश्किल हो जाता है और किसी भी परिस्थिति के बारे में ज्यादा सोचने से सिर्फ हानि होती है और कुछ नहीं।

नए अवसरों से ना डरे

सभी नए अवसर और सभी नई चुनौतियां आपको एक बेहतर इंसान बनाते है। इनसे डर कर इन्हें नज़रअंदाज़ करना सबसे ख़राब बात होती है। अच्छे अवसर हर किसी को नहीं मिलते। खुद को भाग्यशाली समझे और इनका प्रयोग सही ढंग से करे।

दुसरो के लिए जीना

ये जिंदगी आपकी है। इसको दूसरे के हाथ में ना दे। अगर जीना ही है तो अपने लिए जिए और अपने लिए कुछ हासिल करे। खुद के अस्तित्व और ख़ुशी के लिए जिए।
खुद के सपनो को त्यागना
ये हमारे साथ अक्सर होता है। परिवार की नामंजूरी के कारण ही हमे हमारे सपनो को त्यागना पड़ता है। हमे उनकी मर्ज़ी के अनुसार चलना पड़ता है। इसमें हम खुद को नज़रअंदाज़ करते है और अपने इच्छा और सपनो को दूसरों के लिए त्याग देते है।

अपनी शर्तों पर ज़िन्दगी जिए।

जवाबदेही आपने हमेशा खुद को देनी है। दूसरे तो सिर्फ हमारे पर ऊँगली उठाने के लिए होते है। इसलिए ये चीज़े खुद के साथ कभी ना करे। खुश रहे और ज़िन्दगी अपनी शर्तों और ज़रूरतों के अनुसार जिए।

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क्यों माँ के बिना ज़िन्दगी होती हैं मुश्किल

माँ के बिना ज़िन्दगी मुश्किल


माँ के बिना ज़िन्दगी के बारे में सोचने से भी डर लगता है। माँ हमारी हर ज़रूरत को समझती है। उनको पता होता है की हमारी व्यस्त दिनचर्या में भी कैसे हमें हमारी ज़रूरते पूरी करनी है। माँ के बिना ज़िन्दगी सोचना भी मुश्किल है। माँ हमे हर चीज़ के लिए सपोर्ट करती है। मुश्किल के समय में हमे सही फैसले लेने के लिए प्रेरित करती है। पर जब हम स्वतंत्र जीवन जीते है तब हमें एहसास होता है कि के हमारी माँ ने हमारे लिए कितने कष्ट उठाए हमें। हमे अपने पैरों पर खड़े होना तो सिखाया पर उनकी ऊँगली छोड़े बिना कैसे चले वो तो हम कभी सीख ही नहीं पाए। चले तो जा रहे है पर वो ख़ुशी और वो पूर्णता कही गायब सी हो गई है।

माँ का प्यार

आखिर क्यों माँ के बिना ज़िन्दगी मुश्किल हो जाती है?

  • खाना

माँ को हमारी पसंद और नापसंद का ज्ञान सबसे बेहतार होता है। जब वो होती है तब खाने का ध्यान वही रखती है। और हमे उस बात की चिंता बिलकुल नहीं लेनी पड़ती। फ्रिज में अच्छा खाना होता है और नाश्ते से लेकर डिनर तक हमे उसकी बिलकुल टेंशन नहीं लेनी पड़ती।

  • कपड़े

हमारी माँ हमारे कपडे जितने संभाल के रखती थी हम उतने ही बिखेर के रखते है। माँ के होते हुए हमारी अलमारी और हमारे कपड़े एकदम आयोजित रहती है पर जब माँ नहीं होती तब हमे किसी चीज़ की होश ही नहीं होता।

माँ सब संभाल लेती है
  • बीमारी

बीमारी में माँ हमारा सबसे अच्छे से ध्यान रखती है। जब वो नहीं होती तो हम बस इसी उम्मीद में रहते है कि किसी तरह ठीक हो जाए। दवाइयों के सहारे बस चलते रहते है। माँ होती है तो वो हमारा पूरा ध्यान रखती है।

  • परेशानी

परेशानी छोटी हो या बड़ी माँ हमेशा हमारी मदद करती है। हमें सही बात समझाती है और हमारी हर बात सुनती है। माँ हमे सही राय भी देती है। हम सभी परेशानियां किसी और के साथ बाँटे या ना बाँटे माँ के साथ हर बात बाँट सकते है।

माँ के सहारे के बिना हमारे लिए चलना उतना ही मुश्किल है जितना बिना पानी के आग बुझाना। चल तो सकते है पर वो आत्मशक्ति नहीं मिल पाती।

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क्यों महिला सुरक्षा अभी भी एक विचारणीय विषय है?

महिला सुरक्षा


महिला सुरक्षा” एक ऐसा संवेदनशील विषय है जिस पर जितनी चर्चा की जाए कम है। महिला यानि स्त्री जो काली, दुर्गा के रूप में पूजी जाती है और सभी की रक्षा करते हुए दुष्टों का संहार करती है – आज उसी की सुरक्षा की आवश्यकता क्यों पड़ी? ये विचारणीय प्रश्न है।

हम स्त्रियोचित, धर्म, संस्कार निभाने की बात स्त्रियों को कह तो सकतें है कि वो इसका पालन करें और अपने दायरे में ही रहें परंतु छोटी-छोटी अबोध बालिकाओं जिन्होने अभी बोलना, सुनना और समझना ही नहीं सीखा, वे पुरुषों की घृणित मानसिकता का शिकार होती है, तो उन संसकारों का क्या करेंगे? इन दिनों महिलाओं के साथ बलात्कार की बढ़ती घटनाओं ने सभी को झकझोर कर रख दिया है।

“निर्भया” हो या “गुड़िया”, ऐसा लगता है मानो सभी हमारे ही बीच वीरान आँखों से पुकारती हमसे इंसाफ की भीख मांगती दम तोड़ रही है और हम रैलियाँ निकालते, मोमबत्तियाँ जलाते, हाय-हाय करते अपने आप को माफ करते जा रहें है कि हमने इंसाफ के लड़ाई तो की। पर निष्कर्ष? कुछ नहीं। हम जितना ज्यादा प्रगतिवादी होते जा रहें हैं उतनी ही ज्यादा हमारी मानसिकता कुंठित और संकुचित होती जा रही है। शहर हो या गाँव, कहीं भी महिलाओं को अपने सुरक्षित होने का अहसास नहीं होता। यदि गहराई से सोचा जाये तो कौन इन सब बातों का जिम्मेदार है? जिम्मेदार केवल हम सब  ही हैं।

महिला सुरक्षा

एक ओर तो हम स्त्रियों की पूजा करतें हैं तो दूसरी ओर उन्ही से पुत्र प्राप्ति की कामना करतें हैं। पुत्र होने पर उन्ही को तिरस्कृत कर पुत्र की सेवा में लगे रहते हैं। इसीलिए पुत्र यानि पुरुष के मन में शुरू से ही स्त्रियों के प्रति श्रद्धा व आदर का भाव आ ही नहीं पाता है। यही मानसिकता लिए वे बड़े होते हैं व पीढ़ी दर पीढ़ी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हैं।

आज जरूरत है इस सोच को बदलने की। सर्वप्रथम घर से ही स्त्रियों के प्रति आदर व सम्मान की भावना की शुरुआत होनी चाहिए। महिलाओं की सुरक्षा तो सब जगह है और कहीं भी नहीं है। सिर्फ हमारी सोच और व्यवहार ही उसे बनाता और बिगाड़ देता है। आज हम जितना भी महिलाओं को अधिकार दे दे पर यदि हम मन से स्त्रियों का सम्मान नहीं करतें हैं तो उन अधिकारों का कोई औचित्य ही नहीं है।

फिर भी महिलाएँ अपने आप से सुरक्षा के कुछ ऐसे इंतजाम सकतीं हैं जिससे वे स्वयं सुरक्षित हो सकें, जैसे अपने आसपास के वातावरण पर नज़र रखें, संदिग्ध व्यक्तियों पर पैनी दृष्टि रखेँ और उनको अपने घर के आसपास फटकने न दे और छोटी बच्चियों को घर में व घर के आस पास अकेला न छोड़े। लड़कियों को चाहिए कि वो अपने पास कुछ ऐसी सामग्री हमेशा साथ रखें जैसे, पेपर स्प्रे , छोटा चाकू, पिन इत्यादि। माता पिता का दायित्व है कि वो अपने बच्चों को अच्छा ज्ञान दें, संस्कार दें जिससे उनमें स्त्रियॉं के प्रति अच्छे विचार रहें और उनकी रक्षा करने का भाव रहे। सरकार की ओर से भी सख्त कानून बनने चाहिए जिसमें बचाव का सीधा रास्ता न हो।

लड़कियो को शिक्षित करे और उन्हें सिखाये

जगह-जगह पुलिस बीट बॉक्स लगने चाहिये व उनमें 24 घंटे पुलिस कर्मी तैनात रहने चाहिए। पीसीआर वैन को लगातार गश्त लगाते रहना चाहिए, सुनसान इलाकों में बिजली की व्यवस्था अच्छी होनी चाहिए। खंडहर, वीरान पड़ी इमारतों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होने चाहिए। किसी भी प्रकार की शिकायत पर तुरंत कार्यवाही होनी चाहिये। लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा से ही अपनी सुरक्षा के उपाय सिखाये जाने चाहिए, उन्हे जूडो-कराटे, टाइक्वांडो आदि की ट्रेनिंग मिलनी चाहिए।

सबसे बड़ी बात, घर के बड़े बुजुर्ग उनको मानसिक रूप से शक्तिशाली बनाए जिससे उनमें आत्म विश्वास जागे। महिला सुरक्षा के लिए सम्मेलन आयोजित करने से ज्यादा उनका ध्यान रखने की आवश्यकता है। ये जरूरी नहीं कि स्त्रियाँ घर के अंदर ही सुरक्षित हैं। उन्हे तो केवल इस आश्वासन की जरूरत हैं कि वो जहां कहीं भी जाएँ वहाँ किसी की गिद्ध दृष्टि उन पर न पड़े। केवल अपने आत्मविश्वास के साथ वो हर दिशा में कदम बढ़ा सकें।

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