Impulse Buying: क्या आपने नोटिस किया? बिलिंग काउंटर पर रखी चॉकलेट ऐसे बढ़ाती है आपका बिल
Impulse Buying, आप जब भी किसी सुपरमार्केट या बड़े रिटेल स्टोर में खरीदारी करने जाते हैं, तो क्या आपने गौर किया है कि बिलिंग काउंटर के पास अक्सर चॉकलेट, टॉफी, च्युइंग गम, छोटे स्नैक्स, बैटरियां, लिप बाम या अन्य छोटी-छोटी चीजें सजी होती हैं?
Impulse Buying : सुपरमार्केट में बिना जरूरत क्यों खरीद लेते हैं चॉकलेट-टॉफी? जानिए इम्पल्स बाइंग की ट्रिक
Impulse Buying, आप जब भी किसी सुपरमार्केट या बड़े रिटेल स्टोर में खरीदारी करने जाते हैं, तो क्या आपने गौर किया है कि बिलिंग काउंटर के पास अक्सर चॉकलेट, टॉफी, च्युइंग गम, छोटे स्नैक्स, बैटरियां, लिप बाम या अन्य छोटी-छोटी चीजें सजी होती हैं? कई बार बिना किसी योजना के लोग इन्हें खरीद लेते हैं। यह संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रिटेल मार्केटिंग रणनीति है, जिसे “इम्पल्स बाइंग (Impulse Buying)” कहा जाता है।यह तकनीक ग्राहकों को बिना पहले से योजना बनाए तुरंत खरीदारी करने के लिए प्रेरित करती है। आइए समझते हैं कि यह कैसे काम करती है और इससे बचने के लिए क्या किया जा सकता है।
क्या होती है इम्पल्स बाइंग?
इम्पल्स बाइंग का मतलब है किसी उत्पाद को बिना पहले से खरीदने की योजना बनाए, अचानक खरीद लेना। आमतौर पर यह फैसला कुछ ही सेकंड में लिया जाता है।उदाहरण के लिए, आप सिर्फ दूध और ब्रेड खरीदने गए थे, लेकिन बिलिंग काउंटर पर पहुंचकर चॉकलेट, कैंडी या चिप्स भी खरीद लेते हैं। यह एक क्लासिक इम्पल्स खरीद है।उपभोक्ता व्यवहार (Consumer Behavior) पर हुए कई अध्ययनों में पाया गया है कि स्टोर की डिजाइन, उत्पादों की जगह और ग्राहकों की मनोवैज्ञानिक स्थिति ऐसी खरीदारी को प्रभावित करती है।
बिलिंग काउंटर पर ही क्यों रखी जाती हैं ये चीजें?
बिलिंग काउंटर वह जगह होती है जहां ग्राहक कुछ मिनट तक अपनी बारी का इंतजार करता है। इस दौरान उसकी नजर सामने रखे उत्पादों पर बार-बार जाती है।
इसी समय छोटी कीमत वाले उत्पाद सामने रखे जाते हैं, क्योंकि—
- इन्हें खरीदने के लिए ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं पड़ती।
- कीमत कम होने से ग्राहक आसानी से खरीदने का फैसला कर लेता है।
- बच्चों की नजर सबसे पहले इन्हीं चीजों पर जाती है।
- इंतजार के दौरान ग्राहक का ध्यान इन उत्पादों की ओर चला जाता है।
मनोविज्ञान कैसे करता है असर?
इम्पल्स बाइंग पूरी तरह उपभोक्ता मनोविज्ञान पर आधारित होती है।
1. कम कीमत का भ्रम
अगर कोई चॉकलेट 20 या 30 रुपये की है, तो ग्राहक सोचता है कि इतनी छोटी रकम से क्या फर्क पड़ेगा। लेकिन अगर हर खरीदारी में ऐसी 2–3 चीजें जुड़ जाएं, तो महीने भर में अतिरिक्त खर्च काफी बढ़ सकता है।
2. निर्णय लेने की थकान (Decision Fatigue)
पूरे स्टोर में घूमते-घूमते ग्राहक पहले ही कई फैसले ले चुका होता है। बिलिंग काउंटर तक पहुंचते-पहुंचते मानसिक थकान बढ़ जाती है और ऐसे में छोटे उत्पादों को खरीदने से मना करना कठिन हो सकता है।
3. बच्चों का प्रभाव
बच्चे अक्सर बिलिंग लाइन में खड़े-खड़े रंग-बिरंगी टॉफियां और चॉकलेट देखकर उन्हें खरीदने की जिद करते हैं। कई माता-पिता बहस से बचने के लिए उन्हें खरीद लेते हैं।
सुपरमार्केट को क्या फायदा होता है?
रिटेल उद्योग के अनुसार, छोटी-छोटी इम्पल्स खरीदारी से स्टोर की कुल बिक्री में उल्लेखनीय योगदान मिलता है।कम कीमत वाले इन उत्पादों पर कई बार अच्छा मार्जिन भी होता है। इसलिए इन्हें ऐसी जगह रखा जाता है जहां लगभग हर ग्राहक की नजर उन पर पड़े।
सिर्फ चॉकलेट ही नहीं
आजकल बिलिंग काउंटर पर केवल टॉफियां ही नहीं, बल्कि—
- एनर्जी बार
- च्युइंग गम
- मिनी ड्रिंक्स
- बैटरियां
- मोबाइल एक्सेसरीज़
- हैंड सैनिटाइज़र
- लिप बाम
- ट्रैवल साइज कॉस्मेटिक्स
जैसी चीजें भी रखी जाती हैं।
क्या यह गलत है?
नहीं। इम्पल्स बाइंग एक वैध और व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली मार्केटिंग तकनीक है।जब तक ग्राहक पर कोई दबाव नहीं डाला जा रहा और उत्पाद की सही जानकारी दी जा रही है, तब तक यह सामान्य रिटेल रणनीति मानी जाती है।हालांकि, उपभोक्ताओं के लिए यह समझना जरूरी है कि उनकी खरीदारी का फैसला कब वास्तविक जरूरत पर आधारित है और कब केवल क्षणिक आकर्षण पर।
इससे कैसे बचें?
अगर आप अनावश्यक खर्च कम करना चाहते हैं, तो ये उपाय मदद कर सकते हैं—
- खरीदारी से पहले सूची (Shopping List) बनाएं।
- उसी सूची के अनुसार सामान खरीदें।
- बिलिंग काउंटर पर रखी हर चीज को उठाकर देखने से बचें।
- बच्चों के साथ खरीदारी करते समय पहले से नियम तय करें।
- बिल बनने से पहले एक बार अपनी ट्रॉली जरूर जांच लें।
- अगर भूख लगी हो, तो पहले कुछ खाकर खरीदारी करने जाएं। शोध बताते हैं कि भूख की स्थिति में लोग अधिक इम्पल्स खरीदारी कर सकते हैं।
ऑनलाइन शॉपिंग में भी होता है यही खेल
इम्पल्स बाइंग केवल सुपरमार्केट तक सीमित नहीं है।ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर दिखने वाले “Customers Also Bought”, “Frequently Bought Together”, “Add for ₹99 More” और “Limited Time Deal” जैसे विकल्प भी इसी रणनीति का हिस्सा होते हैं। इनका उद्देश्य ग्राहकों को अतिरिक्त खरीदारी के लिए प्रेरित करना होता है।
क्या हर इम्पल्स खरीदारी गलत होती है?
जरूरी नहीं। कभी-कभी अचानक खरीदी गई कोई चीज वास्तव में उपयोगी भी साबित हो सकती है।समस्या तब होती है जब बिना जरूरत बार-बार छोटी-छोटी खरीदारी की जाए और उसका असर मासिक बजट पर पड़ने लगे।बिलिंग काउंटर पर रखी चॉकलेट, टॉफी और अन्य छोटी वस्तुएं सिर्फ सुविधा के लिए नहीं रखी जातीं। इनके पीछे इम्पल्स बाइंग की एक सोची-समझी मार्केटिंग रणनीति काम करती है, जो ग्राहकों को बिना योजना के खरीदारी करने के लिए प्रेरित करती है। यदि आप इस रणनीति को समझते हैं और अपनी खरीदारी पहले से तय करके करते हैं, तो अनावश्यक खर्च से बच सकते हैं और अपने बजट पर बेहतर नियंत्रण रख सकते हैं।
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