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नए दौर में हर आंदोलन को दबाने का सबसे अच्छा हथियार बन गया है सोशल मीडिया

फेक वीडियो क्लिप और फोटोस के द्वारा बदनाम करने की कोशिश की जा रही है.


नए कृषि कानून को लेकर लगातार किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. आज सुबह एनसीआर के तीन बॉर्डर पर किसानों का जमावड़ा लगा हुआ था. किसान लगातार दिल्ली आने की मांग को लेकर डटे हुए हैं. फिलहाल किसानों को दिल्ली के बुराड़ी में निरंकारी ग्रांउड की अनुमति दी गई है. इसके बाद भी किसान लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं. पिछले कुछ समय से देखा गया है कि एक तबका ऐसा है जो हर आंदोलन को या तो कुचलने या तो बदनाम करने की कोशिश कर रहा है. इसको अंजाम देने के लिए सहारा लिया जाता है सोशल मीडिया का. वही सोशल मीडिया का जिसके द्वारा हम चुटकियों में हर सवाल का जवाब ढूंढ़ लेते हैं. उसी सोशल मीडिया के द्वारा लोगों को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है.

हर बार की तरह इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है. तरह-तरह की क्लिपस और फोटोस के सहारे आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की गई. सबसे पहले तो यह कह गया कि विरोध के दौरान खालिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए गए. इस वीडियो को ज़ी न्यूज में दिखाया गया और साथ ही बीजेपी के आईटी हेट अमित मालवीय ने ट्वीट किया. लेकिन सत्य हिंदी वेबसाइट की खबर के अनुसार जिस वीडियो में व्यक्ति को जिस वक्त खालिस्तान जिंदाबाद नारे का दावा किया जा रहा है उस वक्त वीडियो को ब्लर करने के साथ-साथ उनकी आवाज में भी बदलाव किया गया है.

https://twitter.com/GorAruna/status/1332595472775536641

आखिर क्यों खालिस्तान पर इतना जोर दिया जा रहा है

किसान आंदोलन को लगातार खालिस्तान से जोड़कर पेश किया जा रहा है. एक और वीडियो को सोशल पर खूब वायरल किया जा रहा है. आप भी देखें. जिसमें दावा किया गया है कि मोदी मुर्दाबाद और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए जा रहे हैं. जबकि आल्ट न्यूज ने यह दावा किया है कि यह वीडियो एडिट करके बनाया गया है. इस वीडियो को एएनआई न्यूज की ओर से 6 जुलाई  2019 को यूट्यूब पर अपलोड किया गया था. जिसका टाइटल था ब्रिट्रेन में एक वर्ल्ड कप के दौरान सिखों पर पर खालिस्तान के समर्थन में नारेबाजी करने का आरोप. यही से इस वीडियो क्लिप को लिया गया है. 20 मिनट के इस वीडियो क्लिप को दिल्ली का बताया जा रहा है क्योंकि इसमें जो शख्स दिख रहा है वो सिख है. कनाडा की भी कई ऐसी वीडियो को पोस्ट करके आंदोलन को भड़काने की कोशिश की जा रही है.

शाहीन बाग की बिलकिस बानो के बारे में कंगना का ट्विट

पिछले सप्ताह 26 नवंबर को देशव्यापी हड़ताल के  बाद 27 तारीख को एक बुजुर्ग दादी की फोटो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई. जिसमें यह दावा किया जा रहा था कि वह दादी बिलकिस बानो है जो शाहीन बाग में थी. जिन्हें टाइम्स मैगजीन ने साल 2019 के 100 सबसे प्रतिभाशील व्यक्तियों की सूची में रखा गया था. इस ट्वीट को कंगना रन्नौत ने ट्वीट किया और अपने अंदाज में शेयर किया है. आल्ट न्यूज ने इसकी भी पड़ताल की जिसमें पाया गया है कि बुर्जुग महिला बिलसिक बानो नहीं है.  साथ ही पता चला है कि यह खबर और फोटो महीने पुरानी है. कृषि कानून पारित होने के बाद पंजाब में लगातार प्रदर्शन हो रहा था. ट्बियन की खबर के अनुसार यह तस्वीर पंजाब के संगरुर जिले की है . जहां नए कृषि कानून के खिलाफ महिलाएं पीला स्कॉर्प लेकर विरोध कर रही थी.

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पहले भी ऐसा होता रहा है

ऐसे पहली बार नहीं हो रहा है इससे पहले ही जब भी कोई आंदोलन सरकार की नीतियों के खिलाफ हुआ है वहां लोगों को ऐसे ही बदनाम करने की कोशिश की गई है. पिछले साल सीएए-एनआरसी के वक्त देश के अलग-अलग हिस्से में तरह-तरह की खबरें फैलाई जा रही थी. सबसे ज्यादा टारगेट शाहीन बाग को किया गया था. जहां सबसे पहले एक वीडियो जारी करके बताया जा रहा था कि आंदोलन में बैठने वाली महिलाओं को 500 रुपए दिया जा रहा है. जबकि बीजेपी आईटी सेल इस बात को साबित नहीं कर पाया था. साल 2018 में 2 अप्रैल को  एससी-एसटी कानून में बदलाव को लेकर भारत बंद के दौरान भी ऐसे ही आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश की गई. एक वीडियो वायरल किया गया जिसमें दावा किया गया कि आंदोलनकारियों ने जोधपुर में एक पुलिस वाले को बेरहमों की तरह पीटा. पिटाई के कारण दूसरे दिन अस्पताल मे उसकी मौत हो गई. जबकि दैनिक भास्कर की पड़ताल में पाया गया कि यह फोटो साल 2017 की कानपुर की थी. जहां एक लड़की मौत के बाद पुलिसवालों को घरवालों के गुस्से का सामना करना पड़ा.

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