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Tamil Nadu CM Vijay: अरब सागर में प्लास्टिक के छर्रों से मचा हड़कंप, थलपति विजय और CM सतीशन की बढ़ी चिंता

Tamil Nadu CM Vijay, भारत के दक्षिणी तटीय इलाकों में समुद्री प्रदूषण की एक गंभीर समस्या ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है।

Tamil Nadu CM Vijay : समुद्र में फैले ‘छोटे-छोटे छर्रे’ बने बड़ी मुसीबत, थलपति विजय से लेकर केरल सरकार तक चिंतित

Tamil Nadu CM Vijay, भारत के दक्षिणी तटीय इलाकों में समुद्री प्रदूषण की एक गंभीर समस्या ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। अरब सागर में फैले छोटे-छोटे प्लास्टिक के दाने यानी प्लास्टिक पेलेट्स या नर्डल्स अब केरल और तमिलनाडु के तटों तक पहुंच रहे हैं। ये देखने में मामूली लगने वाले छर्रे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र, मछली पालन और तटीय समुदायों के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। इसी मुद्दे को लेकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलपति विजय और केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन की चिंता बढ़ी है।

क्या हैं ये प्लास्टिक के ‘छर्रे’?

दरअसल, प्लास्टिक पेलेट्स को नर्डल्स भी कहा जाता है। ये बेहद छोटे औद्योगिक प्लास्टिक दाने होते हैं, जिनका इस्तेमाल आगे प्लास्टिक उत्पाद बनाने के लिए कच्चे माल के तौर पर किया जाता है। आकार में छोटे होने के कारण ये आसानी से पानी, रेत और समुद्री धाराओं के साथ दूर-दूर तक फैल सकते हैं।इनकी सबसे बड़ी समस्या यही है कि एक बार समुद्र में पहुंच जाने के बाद इन्हें पूरी तरह वापस निकालना बेहद मुश्किल हो जाता है। लहरें और ज्वार इन्हें समुद्र तटों तक पहुंचाते हैं, जबकि कुछ दाने रेत में दब जाते हैं और लंबे समय तक वहीं बने रह सकते हैं।

MSC Elsa 3 जहाज डूबने के बाद बढ़ी समस्या

मौजूदा संकट का संबंध पिछले साल डूबे कंटेनर जहाज MSC Elsa 3 से बताया जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 24 मई 2025 को यह जहाज कोच्चि से करीब 38 नॉटिकल मील दूर अरब सागर में डूब गया था। जहाज पर कंटेनरों के अलावा ईंधन और औद्योगिक प्लास्टिक पेलेट्स भी मौजूद थे।जहाज के डूबने के बाद समुद्र में बड़ी मात्रा में सामग्री फैल गई। इसके बाद मौसम, समुद्री धाराओं और मानसून की लहरों के साथ प्लास्टिक पेलेट्स लगातार तट की ओर आने लगे। एक साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद इनके तटों पर पहुंचने का सिलसिला चिंता का कारण बना हुआ है।

केरल और तमिलनाडु के तटों पर असर

इस प्रदूषण का असर खास तौर पर केरल और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है। स्थानीय मछुआरों के अनुसार, कई बार ये छोटे प्लास्टिक दाने मछली पकड़ने वाले जाल में फंस जाते हैं। इससे जाल प्रभावित होने के साथ-साथ समुद्री जीवन और मछली पकड़ने की गतिविधियों पर भी असर पड़ने की आशंका है। समुद्र में मौजूद प्लास्टिक के ये छोटे दाने समुद्री जीवों के लिए भी खतरनाक हैं। कई जीव इन्हें भोजन समझकर निगल सकते हैं। इससे उनके स्वास्थ्य और समुद्री खाद्य श्रृंखला पर लंबे समय तक प्रभाव पड़ सकता है।

थलपति विजय की चिंता क्यों बढ़ी?

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलपति विजय के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य की लंबी तटरेखा और बड़ी संख्या में तटीय समुदाय समुद्र पर निर्भर हैं। मछली पालन, समुद्री कारोबार और तटीय पर्यटन राज्य की अर्थव्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।अगर समुद्री प्रदूषण लगातार बढ़ता है तो इसका असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा। मछुआरों की आजीविका, समुद्री खाद्य पदार्थों की सुरक्षा और तटीय पर्यटन भी प्रभावित हो सकते हैं। यही वजह है कि अरब सागर में मौजूद प्लास्टिक प्रदूषण को दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए गंभीर पर्यावरणीय चुनौती माना जा रहा है।

केरल के CM सतीशन ने भी जताई चिंता

केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन भी राज्य के समुद्री हितों को लेकर चिंता जता चुके हैं। मौजूदा रिपोर्टों में उनका रुख तटीय पर्यावरण और राज्य के हितों की सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है। केरल के लिए यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि राज्य की अर्थव्यवस्था में समुद्र, बंदरगाह, मछली पालन और पर्यटन की महत्वपूर्ण भूमिका है। विझिनजाम बंदरगाह और समुद्री गतिविधियों को लेकर भी केरल में व्यापक बहस चल रही है। ऐसे में समुद्री प्रदूषण और शिपिंग गतिविधियों से जुड़े पर्यावरणीय सवालों ने सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

सिर्फ दो राज्यों की समस्या नहीं

विशेषज्ञों और पर्यावरण संगठनों की चिंता सिर्फ केरल और तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। भारत की लंबी समुद्री सीमा और बड़े समुद्री व्यापार के कारण प्लास्टिक पेलेट प्रदूषण पूरे देश के लिए चिंता का विषय हो सकता है।रिपोर्ट के अनुसार, हर साल करीब 1 लाख से ज्यादा जहाज भारत के तटीय इलाकों के आसपास से गुजरते हैं। समुद्री गतिविधियों के बढ़ने के साथ कार्गो गिरने, प्लास्टिक सामग्री के समुद्र में पहुंचने और जहाजों से होने वाले प्रदूषण का जोखिम भी बना रहता है।

भारत में प्लास्टिक का बड़ा कारोबार

भारत में प्लास्टिक उद्योग काफी बड़ा है और देश बड़ी मात्रा में प्लास्टिक उत्पादों और कच्चे माल का आयात-निर्यात करता है। रिपोर्ट में दिए गए व्यापार आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 2023-24 की अवधि में कई देशों से प्लास्टिक ग्रेन्यूल्स की हजारों खेपें आयात कीं। वहीं भारत से भी बड़ी मात्रा में प्लास्टिक ग्रेन्यूल्स दूसरे देशों को भेजे जाते हैं। इस बड़े कारोबार का मतलब यह है कि प्लास्टिक पेलेट्स की सुरक्षित ढुलाई और समुद्री प्रदूषण को रोकने के लिए मजबूत निगरानी व्यवस्था बेहद जरूरी है।

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समुद्री जीवों के लिए कितना बड़ा खतरा?

प्लास्टिक नर्डल्स छोटे जरूर होते हैं, लेकिन पर्यावरण पर उनका असर बड़ा हो सकता है। समुद्री जीव इन्हें भोजन समझकर निगल सकते हैं। एक बार ये समुद्री खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाएं तो इनका प्रभाव कई स्तरों तक पहुंच सकता है।इसके अलावा समुद्र तटों पर जमा प्लास्टिक पेलेट्स को पूरी तरह साफ करना भी आसान नहीं है। ये रेत में मिल जाते हैं और सामान्य सफाई अभियान से इन्हें निकालना कठिन हो जाता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ समस्या के इलाज से ज्यादा उसकी रोकथाम पर जोर देते हैं।

ग्रीनपीस ने बताया ‘वेक-अप कॉल’

ग्रीनपीस ने इस तरह की घटनाओं को भारत की समुद्री गवर्नेंस के लिए ‘वेक-अप कॉल’ बताया है। संगठन ने प्लास्टिक पेलेट प्रदूषण की लंबे समय तक निगरानी, जवाबदेही की मजबूत व्यवस्था और शिपिंग कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने की जरूरत पर जोर दिया है। इसका मतलब साफ है कि केवल समुद्र तटों पर प्लास्टिक इकट्ठा करना पर्याप्त नहीं होगा। जहाजों में माल की सुरक्षित पैकेजिंग, परिवहन के दौरान निगरानी और समुद्र में कार्गो गिरने की स्थिति में तत्काल कार्रवाई जैसे कदम भी जरूरी होंगे।

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भारत के सामने बढ़ती चुनौती

अरब सागर में प्लास्टिक के ये छोटे-छोटे ‘छर्रे’ एक बड़ी समस्या की तरफ इशारा कर रहे हैं। यह मामला बताता है कि समुद्री प्रदूषण का असर किसी एक राज्य की सीमा तक सीमित नहीं रहता। समुद्री धाराएं प्रदूषकों को एक तट से दूसरे तट तक पहुंचा सकती हैं।तमिलनाडु और केरल जैसे समुद्री राज्यों के लिए यह पर्यावरण के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक चुनौती भी है। अब जरूरत इस बात की है कि केंद्र और तटीय राज्य सरकारें मिलकर समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी बढ़ाएं, प्रभावित तटों की नियमित सफाई करें और जहाजों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए जवाबदेही तय करें। फिलहाल अरब सागर में फैले प्लास्टिक नर्डल्स ने यह साफ कर दिया है कि समुद्र में फेंका गया छोटा-सा प्लास्टिक दाना भी आने वाले समय में बहुत बड़ा संकट बन सकता है।

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