Nepal flood victims: DNA सुरक्षित, फिर दफनाए जा रहे शव… नेपाल में बाढ़ पीड़ितों की पहचान बनी बड़ी चुनौती
Nepal flood victims, नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ और फ्लैश फ्लड के बाद हालात लगातार गंभीर बने हुए हैं। बाढ़ के पानी में बहकर बड़ी संख्या में शव कई किलोमीटर दूर तक पहुंच गए हैं, जिससे मृतकों की पहचान करना बेहद मुश्किल हो गया है।
Nepal flood victims : नेपाल में अपनों की तलाश जारी, DNA सैंपल लेने के बाद दफनाए जा रहे अज्ञात शव; 29 की पहचान
Nepal flood victims, नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ और फ्लैश फ्लड के बाद हालात लगातार गंभीर बने हुए हैं। बाढ़ के पानी में बहकर बड़ी संख्या में शव कई किलोमीटर दूर तक पहुंच गए हैं, जिससे मृतकों की पहचान करना बेहद मुश्किल हो गया है। शवगृहों में जगह कम पड़ने और कई शवों के सड़ने की स्थिति को देखते हुए नेपाली अधिकारियों ने अज्ञात शवों को दफनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। हालांकि, दफनाने से पहले प्रत्येक शव से DNA और अन्य फोरेंसिक नमूने सुरक्षित किए जा रहे हैं, ताकि भविष्य में परिजन सामने आने पर वैज्ञानिक तरीके से पहचान की जा सके। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अब तक 650 से अधिक बरामद शवों में केवल 29 की पहचान हो पाई है।

बाढ़ में बहकर दूर-दूर तक पहुंचे शव
नेपाल में आई इस आपदा ने कई जिलों में भारी तबाही मचाई है। भोटेकोशी, त्रिशूली और नारायणी नदी के तेज बहाव में शव कई दर्जन किलोमीटर दूर तक बह गए। कुछ शव मलबे और कीचड़ में दबे मिले, जबकि कई शव क्षत-विक्षत हालत में बरामद किए गए। नेपाल पुलिस के मुताबिक, शुरुआती 669 बरामद अवशेषों में से 211 शव ऐसे थे जो क्षतिग्रस्त, आंशिक या अलग-अलग हिस्सों में मिले। ऐसी स्थिति में केवल चेहरे या सामान्य शारीरिक पहचान के आधार पर मृतकों की पहचान करना बेहद कठिन हो गया है।
अब तक सिर्फ 29 शवों की पहचान
रविवार शाम तक सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, 650 से अधिक बरामद शवों में केवल 29 की पहचान हो सकी थी। चितवन में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। वहां त्रिशूली और नारायणी नदी के किनारे अब तक सैकड़ों शव बरामद किए गए हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम की पहचान हो पाई है। कई शव घटनास्थल से काफी दूर मिलने के कारण उनके परिजनों तक जानकारी पहुंचाना भी मुश्किल हो रहा है। अधिकारियों के मुताबिक, कई परिवार अब भी अपने लापता सदस्यों की तलाश कर रहे हैं। कुछ मामलों में परिजनों ने चेहरे से नहीं, बल्कि कपड़ों, गहनों, टैटू, स्कूल यूनिफॉर्म या दूसरी व्यक्तिगत चीजों से अपने प्रियजनों की पहचान की है। एक पिता ने अपने पांच साल के बेटे को स्कूल टाई, हार और कान की बाली देखकर पहचान लिया।

DNA सैंपल लेने के बाद ही दफनाए जा रहे शव
अज्ञात शवों को दफनाने का फैसला जल्दबाजी में नहीं किया गया है। अधिकारियों ने पहले DNA सैंपल, फिंगरप्रिंट, तस्वीरें और शरीर पर मौजूद पहचान के निशानों को रिकॉर्ड करने की व्यवस्था की है। नेपाल पुलिस के अनुसार, हर शव को एक अलग कोड नंबर दिया जा रहा है। उसके साथ शव की तस्वीर, शारीरिक पहचान, कपड़े, गहने और अन्य सामान का विवरण भी दर्ज किया जा रहा है। इसके अलावा पोस्टमार्टम रिपोर्ट और घटनास्थल से संबंधित कानूनी दस्तावेज भी सुरक्षित रखे जा रहे हैं। दफनाने की जगह की GPS लोकेशन, तस्वीर और नक्शा भी रिकॉर्ड किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में किसी परिवार को अपने लापता सदस्य के बारे में जानकारी मिले तो संबंधित शव को दोबारा खोजा और DNA मिलान के जरिए पहचान की जा सके।
चितवन में सबसे ज्यादा दबाव
चितवन जिला इस समय शवों की पहचान और सुरक्षित रखे जाने की चुनौती का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। यहां बड़ी संख्या में शव नदी के किनारे बरामद हुए हैं। अस्पतालों और अस्थायी शवगृहों की क्षमता सीमित होने के कारण शवों को लंबे समय तक सुरक्षित रखना संभव नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, चितवन के सरकारी और निजी अस्पतालों की संयुक्त क्षमता करीब 50 शवों को रखने की है, जबकि बरामद शवों की संख्या इससे कई गुना अधिक हो चुकी है। इसी वजह से अधिकारियों ने भरतपुर के देवघाट इलाके में अज्ञात शवों को दफनाने की व्यवस्था शुरू की। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, चितवन में 272 शव बरामद किए जा चुके हैं, जिनमें 12 की पहचान हुई है, जबकि 199 अज्ञात शवों को DNA नमूने और अन्य पहचान संबंधी रिकॉर्ड सुरक्षित करने के बाद दफनाया गया है।
भविष्य में शवों को निकाला भी जा सकेगा
नेपाल सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन शवों का दफनाना अंतिम रूप से परिवार से उनका अधिकार छीनना नहीं है। यह फिलहाल अस्थायी और आपातकालीन व्यवस्था है। यदि भविष्य में किसी परिवार को अपने लापता सदस्य के बारे में पुख्ता जानकारी मिलती है और DNA जांच से पहचान की पुष्टि होती है, तो संबंधित शव या अवशेष को कब्र से निकालकर परिवार को अंतिम संस्कार के लिए सौंपा जा सकता है। हर शव का अलग कोड और दफन स्थल का सटीक रिकॉर्ड रखने की वजह से भविष्य में शव को ढूंढने में मदद मिलेगी। अधिकारियों का कहना है कि वैज्ञानिक और कानूनी रिकॉर्ड इस पूरी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
स्वास्थ्य संबंधी खतरे ने बढ़ाई चिंता
शवों की बढ़ती संख्या और उनके सड़ने की स्थिति ने स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी बढ़ा दी हैं। नेपाल पुलिस के मुताबिक, कई शव लंबे समय तक कीचड़ और पानी में दबे रहने के कारण तेजी से खराब हो रहे हैं। इससे दुर्गंध और संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। इसी वजह से प्रशासन ने शवों के सम्मानजनक और सुरक्षित प्रबंधन के साथ-साथ संभावित स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने के लिए प्रक्रिया तेज की है। अधिकारियों के मुताबिक, शवों को दफनाने से पहले उनकी तस्वीरें, पहचान संबंधी निशान, DNA और अन्य फोरेंसिक साक्ष्य सुरक्षित करना अनिवार्य प्रक्रिया का हिस्सा है। इससे एक तरफ स्वास्थ्य संकट को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी तरफ परिवारों के लिए भविष्य में अपने लापता सदस्यों की पहचान की संभावना भी बनी रहेगी।
लापता लोगों के परिजनों की उम्मीद अभी कायम
नेपाल की इस त्रासदी में बड़ी संख्या में लोग अभी भी लापता हैं। कई परिवार अस्पतालों, शवगृहों और ऑनलाइन जारी की गई तस्वीरों के जरिए अपने रिश्तेदारों की तलाश कर रहे हैं। विशेषज्ञों के लिए भी यह आपदा बड़ी फोरेंसिक चुनौती बन गई है, क्योंकि शव अलग-अलग जिलों में और कई बार घटनास्थल से बहुत दूर मिले हैं। ऐसे में DNA नमूनों का संरक्षण आने वाले दिनों में मृतकों की पहचान के लिए सबसे अहम साबित हो सकता है। नेपाल पुलिस ने अज्ञात शवों से जुड़ी तस्वीरों और उपलब्ध विवरणों को सार्वजनिक करने की व्यवस्था भी की है, ताकि परिजन किसी पहचान योग्य निशान के जरिए अपने रिश्तेदार का पता लगा सकें। फिलहाल राहत और बचाव अभियान के साथ शवों की तलाश और पहचान का काम भी जारी है। सिर्फ 29 शवों की पहचान हो पाना बताता है कि इस आपदा के बाद नेपाल के सामने चुनौती कितनी बड़ी है। DNA और फोरेंसिक रिकॉर्ड सुरक्षित करके शवों को दफनाने का मौजूदा तरीका कम से कम यह सुनिश्चित करता है कि आज अज्ञात रह गए पीड़ितों की पहचान भविष्य में भी संभव बनी रहे।
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