Supreme Court: हिमाचल को मिलेगा 11,973 MU बिजली का हिस्सा, 60 साल पुराने मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
Supreme Court, करीब 60 साल से चले आ रहे बिजली बंटवारे के विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। इस फैसले के तहत हिमाचल प्रदेश को पंजाब और हरियाणा से अगले 20 वर्षों में कुल 11,973 मिलियन यूनिट (MU) बिजली मिलेगी। यह विवाद भाखड़ा-नांगल और ब्यास जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ा है, जिसमें हिमाचल प्रदेश अपनी निर्धारित बिजली हिस्सेदारी की मांग कर रहा था।

Supreme Court : बिजली के बंटवारे पर ऐतिहासिक फैसला, हिमाचल को पंजाब-हरियाणा से मिलेगा 11,973 MU का हिस्सा
Supreme Court, करीब 60 साल से चले आ रहे बिजली बंटवारे के विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। इस फैसले के तहत हिमाचल प्रदेश को पंजाब और हरियाणा से अगले 20 वर्षों में कुल 11,973 मिलियन यूनिट (MU) बिजली मिलेगी। यह विवाद भाखड़ा-नांगल और ब्यास जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ा है, जिसमें हिमाचल प्रदेश अपनी निर्धारित बिजली हिस्सेदारी की मांग कर रहा था। अदालत ने केंद्र सरकार के उस प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसके तहत बकाया राशि का भुगतान नकद के बजाय बिजली के रूप में किया जाएगा। इस फैसले से वर्ष 1966 से जुड़े बिजली बकाये के निपटारे का रास्ता साफ हो गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार किया। पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। अदालत ने तय किया कि पंजाब और हरियाणा अगले 20 वर्षों में हिमाचल प्रदेश को कुल 11,973 मिलियन यूनिट बिजली देंगे।यह भुगतान नकद राशि के रूप में नहीं, बल्कि बिजली की आपूर्ति के जरिए किया जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था वर्ष 2011 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप होगी। उस फैसले में हिमाचल प्रदेश को भाखड़ा-नांगल और ब्यास परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली में 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी का अधिकार दिया गया था।इस तरह ताजा आदेश के बाद हिमाचल प्रदेश को उसके पुराने बिजली बकाये का लाभ मिलने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, बिजली की आपूर्ति एक साथ नहीं होगी, बल्कि 20 वर्षों की अवधि में चरणबद्ध तरीके से की जाएगी।
आखिर क्या था 60 साल पुराना बिजली विवाद?
इस पूरे मामले की शुरुआत वर्ष 1966 से जुड़ी है। पंजाब के पुनर्गठन के बाद हिमाचल प्रदेश ने भाखड़ा-नांगल और ब्यास जलविद्युत परियोजनाओं में अपनी हिस्सेदारी का दावा किया था। हिमाचल प्रदेश का कहना था कि इन परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली में उसका भी निर्धारित हिस्सा बनता है और उसे इसका लाभ मिलना चाहिए।ये परियोजनाएं उत्तर भारत की महत्वपूर्ण जलविद्युत परियोजनाओं में शामिल हैं। इनके जरिए बिजली उत्पादन के साथ-साथ पानी के प्रबंधन और सिंचाई से जुड़े काम भी किए जाते हैं। इन परियोजनाओं से जुड़े बिजली बंटवारे में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और अन्य संबंधित क्षेत्रों की हिस्सेदारी का सवाल लंबे समय से चर्चा में रहा।हिमाचल प्रदेश की मांग थी कि उसे उस समय से बिजली का हिस्सा दिया जाए, जब से संबंधित परियोजनाओं में उसका अधिकार निर्धारित हुआ था। इस मुद्दे पर राज्यों के बीच सहमति नहीं बन पाई और मामला अदालत तक पहुंचा।
2011 में तय हुई थी हिमाचल की 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी
इस विवाद में वर्ष 2011 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला बेहद महत्वपूर्ण है। उस फैसले में अदालत ने भाखड़ा-नांगल और ब्यास परियोजनाओं से संबंधित बिजली में अलग-अलग राज्यों की हिस्सेदारी तय की थी। इसके मुताबिक हिमाचल प्रदेश को 7.19 प्रतिशत, पंजाब को 51.80 प्रतिशत और हरियाणा को 37.51 प्रतिशत हिस्सा दिया गया था। वहीं, चंडीगढ़ की हिस्सेदारी 3.50 प्रतिशत निर्धारित की गई थी। राजस्थान की हिस्सेदारी भी इस व्यवस्था में शामिल थी।2011 के फैसले के अनुसार हिमाचल प्रदेश को भाखड़ा परियोजना से 1 नवंबर 1966 से, देहर परियोजना से नवंबर 1977 से और पोंग बांध परियोजना से जनवरी 1978 से बिजली में हिस्सा मिलना था।हालांकि, हिस्सेदारी तय होने के बाद भी बकाये के भुगतान को लेकर विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। राज्यों के बीच पुराने खर्चों, भुगतान के तरीके और समयसीमा को लेकर मतभेद बने रहे। इसी वजह से इस फैसले को लागू करने में लंबे समय तक देरी हुई।
13,066 मिलियन यूनिट से घटकर 11,973 MU कैसे हुआ आंकड़ा?
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण यानी सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) ने हिमाचल प्रदेश की मूल बिजली हिस्सेदारी का आकलन 13,066 मिलियन यूनिट किया था। लेकिन अंतिम समझौते में यह मात्रा 11,973 मिलियन यूनिट तय की गई।इसके पीछे बांधों के निर्माण और उनसे जुड़े पुराने पूंजीगत खर्च का समायोजन शामिल है। प्रस्ताव के तहत ऐतिहासिक निर्माण लागत के मद में 420 करोड़ रुपये का समायोजन किया गया है। इस हिसाब को शामिल करने के बाद हिमाचल प्रदेश को मिलने वाली अंतिम बिजली की मात्रा 11,973 मिलियन यूनिट निर्धारित हुई।इस व्यवस्था की एक अहम बात यह है कि हिमाचल प्रदेश को इस समझौते के तहत पंजाब या हरियाणा को अलग से कोई रकम चुकानी नहीं होगी। बकाये का निपटारा बिजली की आपूर्ति के माध्यम से किया जाएगा।
20 साल की समयसीमा पर कैसे बनी सहमति?
बिजली बकाये का भुगतान कितने वर्षों में किया जाए, इस पर भी राज्यों के बीच मतभेद थे। केंद्र सरकार की ओर से शुरुआत में 15 वर्षों में भुगतान का प्रस्ताव रखा गया था। पंजाब सरकार ने इस अवधि पर आपत्ति जताई और बाद में भुगतान के लिए 30 साल का समय देने की मांग की।दूसरी ओर, हिमाचल प्रदेश चाहता था कि उसे उसका बकाया 10 वर्षों के भीतर मिल जाए। दोनों राज्यों की मांगों और भुगतान से जुड़ी व्यावहारिक परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 20 वर्षों की अवधि तय की।इस तरह अदालत ने दोनों पक्षों की मांगों के बीच एक समयसीमा निर्धारित की, जिसके तहत हिमाचल प्रदेश को धीरे-धीरे उसका बकाया बिजली हिस्सा मिलेगा।
हिमाचल प्रदेश के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
इस फैसले से हिमाचल प्रदेश को लंबे समय से लंबित बिजली हिस्सेदारी प्राप्त करने का रास्ता मिल गया है। राज्य को अगले दो दशकों में 11,973 मिलियन यूनिट बिजली मिलेगी। इससे बिजली की उपलब्धता और राज्य की ऊर्जा व्यवस्था को लेकर योजना बनाने में मदद मिल सकती है।वहीं, पंजाब और हरियाणा के लिए भी यह फैसला महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब उन्हें पुराने बिजली बकाये का निपटारा तय समयसीमा के भीतर करना होगा। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का आदेश केवल बिजली की मात्रा तय करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भुगतान का तरीका और समयसीमा भी निर्धारित कर दी गई है।
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