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Supreme Court: करप्शन पर SC का आया बड़ा फैसला, 2014 से पहले दर्ज मामले पर दिया बयान

भ्रष्‍टाचार में शामिल अधिकारियों पर लगाम कसने के लिए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अहम फैसला दिया है।

Supreme Court: जानिए क्या है धारा -6ए की प्रकिया? क्या होगा फैसले का असर ?


भ्रष्‍टाचार में शामिल अधिकारियों पर लगाम कसने के लिए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि साल 2014 से पहले दर्ज भ्रष्‍टाचार के मामलों में भी अधिकारियों को गिरफ़्तारी से संरक्षण नहीं मिलेगा।
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने करप्शन के मामले में CBI को जॉइंट सेक्रेटरी और उससे ऊपर के अधिकारी के खिलाफ कानूनी प्रावधान लागू करने की तारीख से कार्रवाई कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के एक फैसले में दिल्ली स्पेशल इस्टेब्लिसमेंट एक्ट की धारा-6ए को खारिज कर दिया था। इस प्रावधान में कहा गया था कि जॉइंट सेक्रेटरी और उससे ऊपर के अधिकारी के खिलाफ जांच से पहले संबंधित अथॉरिटी से मंजूरी लेनी होगी। इस मंजूरी के प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट ने गैर-संवैधानिक करार दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक बेंच के सामने यह कानूनी सवाल था कि क्या 2014 का जजमेंट पूर्व प्रभाव से लागू होगा या जजमेंट की तारीख के बाद से।

क्या था साल 2014 में SC का फैसला

दरअसल, साल 2014 में सुब्रमण्यम स्वामी बनाम सीबीआई निदेशक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम 1946 की धारा 6 ए को रद्द कर दिया था। धारा 6ए में सीबीआई को ज्वाइंट सेक्रेटरी और इससे वरिष्ठ पद वाले अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी लेना अनिवार्य होता था।

ये कहते हुए किया खारिज

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एस. के. कौल की अगुआई वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने कहा है कि शीर्ष अदालत ने 2014 में सुब्रमण्यम स्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के केस में धारा-6 ए को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि जॉइंट सेक्रेटरी और उससे ऊपर के अधिकारियों के खिलाफ भी करप्शन केस चलाने के लिए कंपिटेंट अथॉरिटी से मंजूरी की जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजमेंट के पहले के दर्ज केस में भी मंजूरी की जरूरत नहीं होगी।

क्या है धारा -6ए की प्रकिया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि DSPE एक्ट की धारा-6ए की प्रक्रिया को बताया है और यह धारा किसी अपराध या सजा की बात नहीं करता है। साथ ही कहा कि संविधान के अनुच्छेद-20 (1) कहीं से भी धारा-6ए को अवैध करार देने पर रोक नहीं लगाता है। सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के जजमेंट में इस प्रावधान को गैर-संवैधानिक करार दे चुका है ऐसे में यह पूर्व प्रभाव से लागू होगा। यह धारा-6 ए, 11 सितंबर 2003 को एक्ट में जोड़ा गया था यानी उसी तारीख से जजमेंट की व्यवस्था लागू होगी।

क्या होगा फैसले का असर ?

सीनियर एडवोकेट रमेश गुप्ता ने बताया कि इस फैसले का असर ये होगा कि CBI ने 2014 से पहले के किसी केस में अगर किसी बड़े अधिकारी के खिलाफ केस चलाने से पहले मंजूरी नहीं ली होगी तो भी उस मामले में छानबीन हो सकेगी। आज के फैसले से साफ है कि धारा-6ए के तहत अधिकारियों को जो प्रोटेक्शन मिला हुआ था अब पहले दिन से नहीं रहा।
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