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BRICS समिट में बढ़ा अमेरिका विरोधी सुर, रूस-ईरान के रुख से भारत की बढ़ी मुश्किलें

BRICS, नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर 2026 को आयोजित हो रहा BRICS शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया कई बड़े भू-राजनीतिक संकटों से गुजर रही है। रूस और ईरान की ओर से अमेरिका तथा पश्चिमी देशों की नीतियों पर खुलकर निशाना साधे जाने के कारण इस सम्मेलन की अहमियत और बढ़ गई है।

रूस-ईरान ने BRICS में अमेरिका को घेरा, अब भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या?

BRICS, नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर 2026 को आयोजित हो रहा BRICS शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया कई बड़े भू-राजनीतिक संकटों से गुजर रही है। रूस और ईरान की ओर से अमेरिका तथा पश्चिमी देशों की नीतियों पर खुलकर निशाना साधे जाने के कारण इस सम्मेलन की अहमियत और बढ़ गई है। भारत इस साल BRICS की मेजबानी कर रहा है और उसकी सबसे बड़ी चुनौती यही है कि सम्मेलन को किसी एक देश या पश्चिम-विरोधी मंच की छवि से बचाते हुए सभी सदस्य देशों को एक साझा एजेंडे पर साथ रखा जाए।

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रूस और ईरान ने अमेरिका पर साधा निशाना

BRICS सम्मेलन में रूस और ईरान की प्राथमिकताएं अमेरिका की नीतियों से टकराती नजर आ रही हैं। रूस लंबे समय से पश्चिमी प्रतिबंधों और अमेरिकी नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था की आलोचना करता रहा है। वहीं ईरान भी अमेरिका और इजरायल के साथ जारी संघर्ष के बीच BRICS मंच का इस्तेमाल अपनी स्थिति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से रखने की कोशिश कर रहा है।रूस और ईरान का जोर ऐसे वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक ढांचे पर है, जिसमें किसी एक शक्ति का दबदबा कम हो। दोनों देश BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था और पश्चिमी प्रतिबंधों से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने की वकालत कर रहे हैं। इससे BRICS को अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने वाले मंच के रूप में पेश करने की कोशिश भी तेज हो सकती है।

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

भारत की स्थिति रूस और ईरान से अलग है। नई दिल्ली के मॉस्को के साथ पुराने और मजबूत रणनीतिक संबंध हैं, जबकि ईरान के साथ भी भारत के महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं। दूसरी ओर भारत अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भी अपने संबंध लगातार मजबूत कर रहा है।ऐसे में भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल संतुलन का है। अगर BRICS के मंच से अमेरिका के खिलाफ बहुत आक्रामक भाषा अपनाई जाती है, तो भारत के लिए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और पश्चिमी साझेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन हो सकता है। भारत लगातार यह संदेश देता रहा है कि BRICS किसी देश के खिलाफ गठबंधन नहीं है, बल्कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग का मंच है।

ईरान युद्ध ने बढ़ाई मुश्किल

इस बार BRICS की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती पश्चिम एशिया का संकट है। अमेरिका और इजरायल तथा ईरान के बीच जारी युद्ध ने BRICS देशों के बीच भी मतभेद पैदा कर दिए हैं। खास तौर पर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात की स्थिति एक जैसी नहीं है।यही कारण है कि भारत के लिए सभी सदस्य देशों से एक जैसी राजनीतिक भाषा पर सहमति बनाना आसान नहीं है। इससे पहले मई 2026 में BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान भी ईरान युद्ध को लेकर सदस्य देशों में मतभेद सामने आए थे और संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका था। बाद में भारत को चेयर स्टेटमेंट जारी करना पड़ा था।

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फिर कैसे बनी संयुक्त घोषणा पर सहमति?

अब ताजा घटनाक्रम में तस्वीर कुछ बेहतर दिखाई दे रही है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, BRICS सदस्य देशों ने नई दिल्ली शिखर सम्मेलन से पहले संयुक्त घोषणा पर सहमति बना ली है। प्रस्तावित बयान में किसी विशेष देश का नाम लिए बिना एकतरफा युद्ध और ऐसी नीतियों की आलोचना किए जाने की बात सामने आई है, जिन्हें BRICS देश वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह मानते हैं।यह भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि मानी जा सकती है, क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि गंभीर मतभेदों के बावजूद BRICS देश किसी न्यूनतम साझा एजेंडे पर सहमत हो सकते हैं।

अमेरिका से रिश्ते भी संभालने होंगे

भारत की एक और चुनौती अमेरिका के साथ अपने संबंधों को लेकर है। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, तकनीक, व्यापार और रणनीतिक सहयोग काफी महत्वपूर्ण है। ऐसे में BRICS मंच पर अगर अमेरिकी नीतियों के खिलाफ बहुत तीखा रुख अपनाया जाता है, तो इसका असर भारत-अमेरिका संबंधों पर पड़ने की आशंका रहेगी।भारत की कोशिश संभवतः यही होगी कि वह अमेरिका का समर्थन या विरोध करने के बजाय बहुपक्षीय व्यवस्था, संवाद और कूटनीतिक समाधान की भाषा पर जोर दे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी BRICS को सहयोग के मंच के रूप में पेश करने पर जोर दिया है, न कि पश्चिम-विरोधी गठबंधन के रूप में।

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चीन का फैक्टर भी अहम

BRICS सम्मेलन में चीन की भूमिका भी भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 12 सितंबर को नई दिल्ली पहुंचे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी अहम मुलाकात हो रही है। यह बैठक भारत-चीन संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद दोनों देश BRICS जैसे बहुपक्षीय मंच पर साथ काम करते हैं। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह BRICS में चीन के साथ सहयोग भी करे और अपने राष्ट्रीय हितों तथा सुरक्षा चिंताओं से समझौता भी न करे।

ऊर्जा और अर्थव्यवस्था पर भी नजर

ईरान संकट का असर सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है। पश्चिम एशिया में संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी परिस्थितियों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का सीधा असर भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश पर पड़ सकता है।इसलिए BRICS सम्मेलन में ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला, व्यापार और भुगतान व्यवस्था पर बातचीत भारत के लिए बेहद अहम है। भारत चाहता है कि वैश्विक अस्थिरता के बीच ऊर्जा और जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति बाधित न हो।

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भारत के सामने अवसर भी बड़ा

इन चुनौतियों के बावजूद भारत के पास इस सम्मेलन के जरिए अपनी कूटनीतिक भूमिका मजबूत करने का बड़ा अवसर है। BRICS अब पहले की तुलना में काफी बड़ा समूह बन चुका है और इसमें दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं।अगर भारत रूस, ईरान, चीन, UAE और अन्य सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद साझा सहमति बनाने में सफल होता है, तो नई दिल्ली की वैश्विक कूटनीतिक भूमिका मजबूत होगी। भारत की कोशिश आर्थिक सहयोग, तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों को राजनीतिक टकराव से ऊपर रखने की हो सकती है।नई दिल्ली में हो रहा BRICS सम्मेलन भारत के लिए सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं, बल्कि कठिन कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा भी है। एक तरफ रूस और ईरान अमेरिका तथा पश्चिमी नीतियों के खिलाफ मजबूत आवाज उठा रहे हैं, दूसरी तरफ भारत को अमेरिका और अन्य पश्चिमी साझेदारों के साथ अपने संबंध भी बनाए रखने हैं।इसके साथ ही चीन के साथ संबंध, ईरान युद्ध, UAE की स्थिति, ऊर्जा सुरक्षा और BRICS की आंतरिक एकता जैसे मुद्दे भारत के सामने मौजूद हैं। ऐसे माहौल में भारत की सफलता इस बात से तय होगी कि वह BRICS को टकराव का मंच बनाने के बजाय सहयोग और संवाद का प्रभावी मंच बना पाता है या नहीं। संयुक्त घोषणा पर बनी सहमति फिलहाल इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत जरूर देती है।

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