कोरोना महामारी के दौरान वॉरियर की तरह खड़े हैं टीचर्स

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corona effect on teachers

ज्यादा काम के कारण डिप्रेशन की परेशानी हो रही है


अहम बिंदु

ऑनलाइन क्लासेस और टीचर्स

टीचर्स के परेशानी

डिजिटल डिवाइड

कोरोना महामारी ने अचानक लगभग हर काम पर अंकुश लगा दिया है। लेकिन इस दौर में भी कुछ वॉरियर्स है जिन्होंने आंधियों के विपरीत जाकर अपने काम को जारी रखा। इनमें से एक है टीचर्स, जो घर से बाहर तो नहीं निकले लेकिन एक वॉरियर्स की तरह स्टूडेंट्स को लगातार पढ़ा रहे हैं। जिसके कारण स्टूडेंट्स को किसी तरह की परेशानी हो। नर्सरी से लेकर पीएचडी के एंट्रास तक हर एक्जाम अभी रुके हुए हैं। स्कूल कॉलेज खुलने का कुछ पता नही है। लेकिन टीचर्स है कि अब भी स्टूडेंट्स को लगातार पढ़ा रहे हैं।

ऑनलाइन क्लासेस और टीचर्स 

मार्च महीने के बाद से ही लगभग हर स्कूल, कॉलेज , कोचिंग से ऑनलाइन क्लासेस दी जा रही है। लेकिन ऑनलाइन क्लासेस इतनी प्रभावशाली साबित नहीं हो रही है  जितनी की पारंपरिक क्लासेस है। टीचर्स का कहना है कि यहां स्टूडेंट्स को समझाना थोड़ा मुश्किल है। बारबार उनसे पूछना पड़ता है। कई स्टूडेंट्स का बीचबीच में इंटरनेट भी डिसक्नेक्ट हो जाता है। उन्हें दोबारा से सारी चीजें बतानी पड़ती है।  कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के टीचर धनेश जोशी का कहना है कि बच्चों को जूम एप्प पर पढ़ाना होता है। जूम हर 45 मिनट के बाद डिसकनेक्ट हो जाता है। फिर से सारे बच्चों को कनेक्ट करो उन्हें दोबारा सारी चीजें बताओ इन सब में ही टाइम खत्म हो जाता है। कहीं कहीं इंटरनेट भी सही से नहीं चलता है तो पढ़ाने की इच्छा भी खत्म हो जाती है।

टीचर्स को परेशानी

कोरोना के दौरान टीचर्स को कई तरह की परेशानी हो रही है। खासकर महिला टीचर्स को क्योंकि ज्यादातर ऐसा देखा जाता है कि महिला टीचर्स अपने घरों में भी काम करती हैं। इस वक्त जब सब घर में है तो टाइम के साथ सामंजस्य बनाने में परेशानी हो रही है। इस बारे में हमने कुछ टीचर्स से बात की है।

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रविंदर कौर, पुलिस डीएवी स्कूल, अंबाला सीटी

रविंदर कौर का कहना है कि शुरुआती दिनों में बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। सबसे ज्यादा टेक्नोलॉजी को लेकर मेरे बच्चों ने जूम ऐप पर क्लास लेना सिखा। हमें इन सारी चीजें की कभी जरुरत ही नहीं पड़ी ही इससे पहले इन सबको लेकर कभी कोई काम किया गया है। लेकिन अब धीरेधीरे सब ठीक हो गया है। रविंदर कहती है कि यह एक अच्छा विकल्प है शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए इससे स्टूडेंट्स का सेलेब्स कम्पीलट कराने में सुविधा हो रही है। बाकी टेक्नोलॉजी को लेकर थोड़ी बहुत परेशानी होती है उम्मीद है धीरेधीरे यह सब ठीक हो जाएगा। स्कूल मैनेंजमेंट के बारे में बात करती हुए रविंदर कहती है कि सैलरी को लेकर कोई ज्यादा परेशानी नहीं हो रही। हां, एक दो दिन लेट आती है लेकिन अब जब कहीं कहीं लोगों की नौकरियां चली गई है तो हमें कम से कम सैलरी तो मिल रही है।

धनेश जोशी, कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर

 

धनेश जोशी का कहना है कि सबसे ज्यादा परेशानी टेक्नोलॉजी के लेकर है। लॉकडाउन के बाद से ही स्टूडेंट्स अपनेअपने घर चले गए हैं। कई बच्चे ऐसे है जो गांव में रहते है। वहां नेटवर्क की इतनी प्रॉब्लम है कि फोन पर बात ही बड़ी मुश्किल हो पाती है इंटरनेट के बारे में सोचना तो बेकार है। बच्चों को बारबार एक ही बात बतानी पड़ती हैं क्योंकि इंटरनेट डिसक्नेक्ट हो जाने के कारण दोबारा से सारी चीजें वहीं से शुरु करनी पड़ती है। ऑनलाइन क्लासेस के शुरुआती दिनों में बहुत बच्चों के बीच यह डर बैठा हुआ था कि जूम ऐप्प के जरिए उनका डेटा हैक किया जा रहा है। इस बारे में स्टूडेंट्स के समझाने में कभी समय लगा है। फिर धीरेधीरे बच्चों के बीच विश्वास पैदा किया गया और अब क्लासेस होती हैं। इसके साथ ही कुछ बच्चे क्लास के दौरान वीडियो ऑफ करके दूसरे काम करते रहते हैं। बहुत सारे बच्चे ऐसे भी है जिनके घर में ज्यादा कमरे नहीं है ताकि वह किसी पर्सनल रुम में बैठकर क्लास कर सके तो ऐसी परिस्थिति में घरवालों की आवाज भी बीचबीच में आती रहती है। जिससे पढ़ाने में मुश्किल होती है।

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जतिंद्र सिंह, गर्वमेंट आईटीआई, लालडू

जतिंद्र सिंह आईटीआई स्कूल में पढ़ाते है। उनकी बात भी बाकी टीचर्स से मिलती जुलती हैं। उनका कहना है कि ऑनलाइन क्लासेस  कुछ समय के लिए सही है लेकिन हमेशा इस पर क्लास ले पाना संभव नहीं है। हमलोग मोबाइल का इतना इस्तेमाल नहीं करते है तो टीचर्स को बहुत परेशानी हो रही थी। आईटीआई में ज्यादातर स्टूडेंट्स गांव के है जिनके पास इंटरनेट की प्रॉब्लम बहुत ज्यादा है। इसलिए क्लासरुम की पढ़ाई ही बेस्ट है। वहां बच्चों को समझाने में परेशानी कम होती है। किसी भी टॉपिक पर स्टूडेंट्स से एक बार में ही फीडबैक मिल जाता है। लेकिन यहां तो एकएक बच्चे से पूछना पड़ता है जिसमें बहुत समय बर्बाद होता है।

रुपा, अजीम प्रेमजी स्कूल, उद्यमसिंह नगर

रुपा एक युवा टीचर है। जिनका कहना है कि पहले तो हमें हमारी पर्सनल लाइफ के लिए समय मिल जाता था। स्कूल से वापस आने के बाद मैं कुछ पढ़ लिख लेती थी। लेकिन कोरोना के कारण जबसे ऑनलाइन क्लासेस शुरु हुई है मैं अपने लिए एकदम टाइम नहीं निकाल पाती हूं। पूरा दिन ऑनलाइन क्लास में ही पार हो जाता है।  इसका असर मेरे शरीर पर भी पड़ने लगा। धीरेधीरे तबीयत भी खराब होने लगी और ज्यादा काम के प्रेशर की वजह से तनाव महसूस होने लगा है।

डिजिटल डिवाइवड 

 

भारत एक विविधता वाला देश है। कहीं पहाडियां है तो कहीं जंगल, कहीं मरुस्थल तो कहीं समुद्र।  इसलिए इंटरनेट की सुविधा भी लोगों के पास इसी हिसाब से उपलब्ध है। दिल्ली और छत्तीसगढ़ के बस्तर में इंटरनेट की स्पीड एक जैसी नही है। कहीं 4जी चल रहा है तो कहीं एक पेज खोलने मुश्किल है।  इसे ही डिजिटल डिवाइड कहते है। इस हिसाब से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर क्लासेस करना बहुत बड़ा चैलेंज है। नेशनल सेंपल सर्वे ऑफिस के अनुसार भारत में केवल 27 प्रतिशत ऐसे परिवार है जहां घर में किसी एक सदस्य के पास इंटरनेट उपलब्ध है। भारत में केवल 12.5 प्रतिशत स्टूडेंट्स के पास इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है। इसके साथ ही लगभग 16 प्रतिशत महिलाएं ही इंटरनेट से जुड़ी हुई है। इंटरनेट का ज्यादातर इस्तेमाल शहरी लोग करते हैं जबकि भारत की लगभग 70 प्रतिशत आज भी गांव में बसती है। ऐसे में ऑनलाइन क्लासेस का सपना भविष्य में कितना कारगार साबित होता है यह देखना अभी बाकी है।

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