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Election Commission of India: RTI से खुला चुनाव आयोग की चिट्ठी का मामला, कैबिनेट सचिव तक पहुंची थी शिकायत

Election Commission of India, भारत के निर्वाचन आयोग से जुड़ा एक प्रशासनिक मामला सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आया है। जानकारी के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एक वरिष्ठ अधिकारी के कामकाज को लेकर कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे थे

 Election Commission of India : दो चुनाव आयुक्तों की शिकायत क्यों बनी चर्चा का विषय? RTI में सामने आई चिट्ठी

Election Commission of India, भारत के निर्वाचन आयोग से जुड़ा एक प्रशासनिक मामला सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सामने आया है। जानकारी के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एक वरिष्ठ अधिकारी के कामकाज को लेकर कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे थे। दोनों ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के काम करने के तरीके और अधिकारियों के बीच काम के बंटवारे में किए गए बदलावों पर आपत्ति जताई थी। RTI के जरिए सामने आए दस्तावेजों से यह भी पता चला है कि कैबिनेट सचिवालय ने इन शिकायतों पर सीधे कार्रवाई करने के बजाय पत्रों को स्वीकार किया और संबंधित अधिकारियों को जानकारी दी। यह मामला 23 अक्टूबर 2026 को सामने आई रिपोर्टों के बाद चर्चा में है।

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क्या है पूरा मामला?

प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे थे। इन पत्रों में वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग की ओर से जारी किए गए एक कार्य-विभाजन आदेश पर सवाल उठाए गए थे। आरोप था कि अधिकारियों के बीच काम की जिम्मेदारियों में बदलाव करने से पहले न तो निर्वाचन आयोग के साथ उचित चर्चा की गई और न ही संबंधित अधिकारियों को इस बारे में जानकारी दी गई।मनीष गर्ग भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, उन्हें निर्वाचन आयोग में वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया था। विवाद उस समय सामने आया, जब प्रशासनिक विभाग की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारी की अनुपस्थिति के दौरान काम के बंटवारे में बदलाव किया गया।

किस आदेश पर जताई गई थी आपत्ति?

रिपोर्टों के अनुसार, प्रशासनिक विभाग के उप चुनाव आयुक्त भानु प्रकाश येतुरु 27 जुलाई से 9 अगस्त तक अवकाश पर थे। इस दौरान मनीष गर्ग को प्रशासनिक जिम्मेदारी से संबंधित अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। आरोप है कि 28 जुलाई को जिम्मेदारी संभालने के कुछ ही घंटों के भीतर उन्होंने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्तों, उप चुनाव आयुक्तों, महानिदेशकों और समान स्तर के अधिकारियों के बीच काम के आवंटन में बदलाव का आदेश जारी कर दिया।सुखबीर सिंह संधू ने अपने पत्र में कहा था कि काम के नए बंटवारे पर निर्वाचन आयोग या संबंधित अधिकारियों के साथ चर्चा नहीं की गई। विवेक जोशी ने भी इसी तरह की आपत्ति जताई। उन्होंने यह भी कहा कि जब उन्होंने प्रशासनिक विभाग से संबंधित फाइल मांगी, तो उन्हें वह उपलब्ध नहीं कराई गई।हालांकि, इन बातों को दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से लगाए गए आरोपों और शिकायतों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इन शिकायतों के सामने आने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप किसी जांच में साबित हो चुके हैं।

चुनाव आयुक्तों ने किस कानून का हवाला दिया?

रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपने पत्रों में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 के प्रावधानों का हवाला दिया। उनका आरोप था कि काम के आवंटन में किया गया बदलाव स्थापित प्रक्रियाओं और आयोग की पूर्व अनुमति से जुड़ी व्यवस्थाओं के अनुरूप नहीं था।निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसका काम चुनाव प्रक्रिया का संचालन और निगरानी करना है। इसलिए आयोग के भीतर अधिकारियों की जिम्मेदारियों, निर्णय लेने की प्रक्रिया और प्रशासनिक अधिकारों का स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है। इस मामले में मुख्य सवाल यह है कि वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कार्य-विभाजन में बदलाव करने की प्रक्रिया क्या थी और क्या संबंधित बदलाव के लिए आवश्यक चर्चा या मंजूरी ली गई थी।

कैबिनेट सचिवालय ने क्या फैसला लिया?

RTI के जवाब में सामने आए फाइल नोट्स के अनुसार, कैबिनेट सचिवालय ने 3 और 4 अगस्त को इस मामले पर विचार किया। अधिकारियों ने माना कि दोनों चुनाव आयुक्तों की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, लेकिन ये पत्र व्यक्तिगत क्षमता में भेजे गए थे। इन्हें पूरे निर्वाचन आयोग की ओर से भेजा गया आधिकारिक पत्र नहीं माना जा सकता था।फाइल नोटिंग में यह भी कहा गया कि पूरे आयोग की ओर से औपचारिक संवाद के अभाव में इस स्तर पर कार्रवाई करना उचित नहीं होगा। ऐसा कदम संवैधानिक संस्था के कामकाज में कार्यपालिका के हस्तक्षेप के रूप में भी देखा जा सकता है।इसके बाद कैबिनेट सचिवालय ने दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्र मिलने की पुष्टि करने का फैसला किया। दस्तावेजों के अनुसार, 5 अगस्त को कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन ने दोनों को पत्रों की प्राप्ति स्वीकार करते हुए जवाब भेजा। शिकायतों की प्रतियां कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT), स्थापना अधिकारी और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कार्यालय को भी भेजी गईं, ताकि मामला रिकॉर्ड में रहे और भविष्य में अधिकारी से जुड़े निर्णयों के समय इस पर विचार किया जा सके।

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क्या मतदाता सूची से जुड़े काम पर भी उठे सवाल?

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू मतदाता सूची से जुड़ी जिम्मेदारियों का बंटवारा है। सितंबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों को आशंका थी कि काम के आवंटन में बदलाव से मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और रिकॉर्ड अपडेट करने से संबंधित अधिकारों का केंद्रीकरण हो सकता है। उनका कहना था कि इन कार्यों में राज्य स्तर पर मौजूद अधिकारियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर को स्पष्ट किया था कि संबंधित अधिकारी की ओर से जारी किए गए काम के पुनर्वितरण संबंधी आदेश लागू नहीं किए गए थे। आयोग के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों के निर्देशों के बाद इन आदेशों को लागू नहीं किया गया। आयोग ने यह भी कहा था कि कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र एक अधिकारी के कामकाज से संबंधित थे, न कि आयोग की नीति या सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के कामकाज से।

RTI आवेदन से कैसे सामने आई जानकारी?

इस मामले की जानकारी पारदर्शिता कार्यकर्ता और सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश के. बत्रा की ओर से दायर RTI आवेदन के जवाब में सामने आई। आवेदन के माध्यम से कैबिनेट सचिवालय में दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्रों से संबंधित दस्तावेज और फाइल नोटिंग मांगी गई थी। इन दस्तावेजों से शिकायतों पर हुई प्रशासनिक चर्चा और सचिवालय के रुख की जानकारी मिली।दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि कैबिनेट सचिवालय ने शिकायतों को पूरी तरह नजरअंदाज करने के बजाय उनकी प्राप्ति स्वीकार की और संबंधित विभागों को जानकारी दी। हालांकि, उसने इन पत्रों के आधार पर सीधे कार्रवाई करने से परहेज किया। इस तरह शिकायत दर्ज होने, उस पर प्रशासनिक विचार किए जाने और औपचारिक कार्रवाई होने के बीच का अंतर स्पष्ट होता है।

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अब इस मामले में किन सवालों पर नजर रहेगी?

इस घटनाक्रम के बाद मुख्य सवाल यह है कि निर्वाचन आयोग के भीतर अधिकारियों के काम के बंटवारे से जुड़े विवादों को सुलझाने की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए। दूसरा सवाल यह है कि यदि किसी चुनाव आयुक्त को किसी अधिकारी के कामकाज पर आपत्ति हो, तो उस शिकायत को पूरे आयोग के आधिकारिक रुख के रूप में सामने लाने की प्रक्रिया क्या है।फिलहाल, RTI से सामने आए दस्तावेज शिकायतों, कैबिनेट सचिवालय की फाइल नोटिंग और पत्रों की प्राप्ति स्वीकार किए जाने की पुष्टि करते हैं। वे अपने आप में मनीष गर्ग के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित नहीं करते। इसी तरह, कैबिनेट सचिवालय का सीधे कार्रवाई न करना भी आरोपों को सही या गलत ठहराने वाला अंतिम निर्णय नहीं है।

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