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Zomato ने कैंसिल किया ₹250 का ऑर्डर, रिफंड नहीं दिया तो अब भरने होंगे ₹8,250

Zomato, ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म Zomato को करीब ₹250 के दो फूड ऑर्डर कैंसिल करना काफी महंगा पड़ गया। दिल्ली के एक उपभोक्ता आयोग ने कंपनी को ग्राहक को ₹8,250.61 का भुगतान करने का आदेश दिया है। इसमें कैंसिल किए गए ऑर्डर की रकम, ब्याज,

₹250 का खाना नहीं पहुंचा तो ग्राहक पहुंचा कोर्ट, Zomato पर लगा ₹8,250 का भुगतान

Zomato, ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म Zomato को करीब ₹250 के दो फूड ऑर्डर कैंसिल करना काफी महंगा पड़ गया। दिल्ली के एक उपभोक्ता आयोग ने कंपनी को ग्राहक को ₹8,250.61 का भुगतान करने का आदेश दिया है। इसमें कैंसिल किए गए ऑर्डर की रकम, ब्याज, मानसिक परेशानी के लिए मुआवजा और मुकदमे का खर्च शामिल है। ब्याज को जोड़ने पर कुल भुगतान ₹8,250.61 से भी अधिक हो सकता है। यह मामला अगस्त 2024 का है, लेकिन दिल्ली कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन का आदेश 11 मई 2026 को आया था और अब यह मामला दोबारा चर्चा में है। आयोग ने Zomato की ओर से सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार माना।

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भांजी के बर्थडे के लिए किए थे 5 ऑर्डर

मामला दिल्ली के रहने वाले मनोज कुमार से जुड़ा है। वह Zomato Gold ग्राहक थे। अगस्त 2024 में अपनी भांजी के जन्मदिन के मौके पर उन्होंने एक ही पते से Zomato के जरिए कुल पांच अलग-अलग फूड ऑर्डर किए थे। इनमें से तीन ऑर्डर सही तरीके से डिलीवर हो गए। लेकिन बाकी दो ऑर्डर ग्राहक तक नहीं पहुंचे। इन दोनों ऑर्डर की कीमत क्रमशः ₹146.73 और ₹103.88 थी। दोनों को मिलाकर कुल रकम ₹250.61 थी। कुमार के अनुसार, Zomato ने दोनों ऑर्डर कैंसिल कर दिए और इसके लिए बताया कि डिलीवरी एजेंट ग्राहक से फोन पर संपर्क नहीं कर सका। कंपनी ने कथित तौर पर फोन को ‘नॉट रीचेबल’ होने का कारण बताया।

ऑर्डर कैंसिल हुआ, लेकिन रिफंड नहीं मिला

कुमार का कहना था कि ऑर्डर कैंसिल होने के बाद उन्हें ₹250.61 वापस नहीं मिले। उन्होंने जब रिफंड की मांग की तो कथित तौर पर उन्हें कैंसिलेशन चार्ज का हवाला दिया गया। इसके बाद मामला कस्टमर सपोर्ट तक पहुंचा, लेकिन विवाद का समाधान नहीं हुआ। आखिरकार ग्राहक ने दिल्ली के उपभोक्ता आयोग का रुख किया। इस मामले में ग्राहक ने अपने दावे के समर्थन में ऑर्डर समरी, कस्टमर सपोर्ट चैट की ट्रांसक्रिप्ट, शपथपत्र और लीगल नोटिस जैसे दस्तावेज पेश किए।

आयोग ने Zomato की दलील पर क्यों उठाए सवाल?

मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल Zomato की उस दलील से जुड़ा था कि ग्राहक का फोन पहुंच से बाहर था। आयोग ने इस दलील पर इसलिए सवाल उठाया क्योंकि उसी दौरान उसी पते पर किए गए तीन अन्य ऑर्डर सफलतापूर्वक डिलीवर हो गए थे। अगर ग्राहक से फोन पर संपर्क नहीं हो पा रहा था, तो बाकी तीन ऑर्डर उसी पते पर कैसे पहुंच गए—यह सवाल आयोग के सामने महत्वपूर्ण बन गया। आयोग ने कंपनी की ओर से ऑर्डर डिलीवरी में हुई समस्या और कैंसिलेशन चार्ज को उचित नहीं माना। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक आयोग ने इसे ‘Deficiency in Service’ यानी सेवा में कमी और Unfair Trade Practice यानी अनुचित व्यापार व्यवहार के दायरे में माना।

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सुनवाई में Zomato की तरफ से नहीं आया जवाब

मामले का एक और अहम पहलू यह रहा कि उपभोक्ता आयोग के समक्ष Zomato ने शिकायत का प्रभावी तरीके से बचाव नहीं किया। कंपनी को मामले की जानकारी और नोटिस दिए गए थे, लेकिन वह आयोग के सामने पेश नहीं हुई और तय समय के भीतर अपना लिखित जवाब भी दाखिल नहीं कर सकी। इसके बाद आयोग ने 10 जून 2025 को Zomato के खिलाफ ex parte कार्यवाही की। इसका अर्थ है कि मामले में कंपनी की ओर से प्रभावी बचाव के बिना सुनवाई आगे बढ़ी। वहीं, मनोज कुमार ने अपने दावे से संबंधित दस्तावेज और सबूत आयोग के सामने रखे। Zomato की ओर से इन दावों का विरोध नहीं किए जाने के कारण आयोग ने ग्राहक की ओर से पेश किए गए सबूतों को चुनौती न दिए गए साक्ष्य के रूप में देखा।

₹250 के बदले अब देने होंगे ₹8,250.61

दिल्ली उपभोक्ता आयोग ने अपने आदेश में Zomato को ग्राहक को ₹250.61 वापस करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही इस रकम पर 6 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा। इसके अलावा ग्राहक को हुई मानसिक परेशानी, उत्पीड़न और असुविधा के लिए ₹5,000 का मुआवजा दिया गया है। मुकदमे में हुए खर्च के लिए आयोग ने ₹3,000 अलग से देने का आदेश दिया। इस तरह मूल रकम ₹250.61 होने के बावजूद कुल भुगतान ₹8,250.61 तक पहुंच गया। ब्याज को जोड़ने पर अंतिम भुगतान इससे भी अधिक होगा।

भुगतान के लिए मिला 45 दिन का समय

आयोग ने Zomato को आदेश मिलने के बाद 45 दिनों के भीतर इस रकम का भुगतान करने का निर्देश दिया है। इसमें रिफंड, ब्याज, मुआवजा और मुकदमे का खर्च शामिल है। यानी एक छोटा-सा ₹250 का विवाद अब कंपनी के लिएहजारों रुपये का मामला बन गया है।

ग्राहकों के लिए भी महत्वपूर्ण है यह मामला

यह फैसला सिर्फ Zomato के लिए ही नहीं, बल्कि ऑनलाइन फूड डिलीवरी ऐप इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों के लिए भी महत्वपूर्ण है। ऑर्डर कैंसिल होने या रिफंड से जुड़ा विवाद होने पर ग्राहक के पास अगर पर्याप्त रिकॉर्ड मौजूद हो, तो वह अपने दावे को मजबूती से साबित कर सकता है। मनोज कुमार के मामले में ऑर्डर डिटेल, कस्टमर सपोर्ट चैट और कानूनी नोटिस जैसे दस्तावेज अहम साबित हुए। इसलिए अगर किसी ग्राहक का ऑर्डर बिना उचित कारण कैंसिल होता है, रिफंड नहीं मिलता या कैंसिलेशन चार्ज को लेकर विवाद होता है, तो उसे संबंधित स्क्रीनशॉट, ऑर्डर हिस्ट्री और कंपनी के साथ हुई बातचीत सुरक्षित रखनी चाहिए।

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Zomato के लिए क्या है इस फैसले का मतलब?

उपभोक्ता आयोग का यह आदेश ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के लिए एक अहम संदेश भी माना जा सकता है। छोटी रकम के ऑर्डर में भी अगर ग्राहक को सेवा नहीं मिलती और उसका पैसा वापस नहीं किया जाता, तो मामला उपभोक्ता विवाद तक पहुंच सकता है। इस मामले में आयोग ने खास तौर पर इस बात पर गौर किया कि एक ही पते पर तीन दूसरे ऑर्डर सफलतापूर्वक पहुंचाए गए थे। इसलिए केवल फोन नॉट रीचेबल होने की दलील से ऑर्डर कैंसिल करने और रिफंड रोकने को आयोग ने स्वीकार नहीं किया।

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33 गुना से ज्यादा पड़ा मामला

₹250.61 की मूल रकम के मुकाबले ₹8,250.61 का आदेश करीब 33 गुना बैठता है। इसमें ब्याज के अलावा ₹5,000 मुआवजा और ₹3,000 मुकदमे का खर्च शामिल है। हालांकि इसे सीधे तौर पर केवल ‘जुर्माना’ कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा, क्योंकि आदेश में अलग-अलग मदों के तहत रिफंड, ब्याज, मुआवजा और मुकदमे की लागत शामिल है।कुल मिलाकर, ₹250.61 के दो फूड ऑर्डर से शुरू हुआ विवाद Zomato के लिए ₹8,250.61 का भुगतान करने के आदेश तक पहुंच गया। दिल्ली उपभोक्ता आयोग ने कंपनी को सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार के लिए जिम्मेदार माना। साथ ही ग्राहक को मूल रकम के साथ ब्याज, मानसिक परेशानी का मुआवजा और मुकदमे का खर्च देने का निर्देश दिया।यह मामला ऑनलाइन शॉपिंग और फूड डिलीवरी सेवाओं में ग्राहक अधिकारों और रिफंड की जिम्मेदारी को लेकर भी महत्वपूर्ण है।

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