Reel Film Day: सिनेमा की उस विरासत को सलाम, जिसने कहानी कहने का तरीका बदला
Reel Film Day, हर साल Reel Film Day मनाया जाता है ताकि सिनेमा की उस ऐतिहासिक तकनीक को याद किया जा सके, जिसने पूरी दुनिया में फिल्मों को एक नई पहचान दी। डिजिटल युग में भले ही फिल्म रील्स का इस्तेमाल लगभग खत्म हो गया हो,
Reel Film Day : डिजिटल दौर से पहले रील पर कैसे बनती थीं यादगार फिल्में?
Reel Film Day, हर साल Reel Film Day मनाया जाता है ताकि सिनेमा की उस ऐतिहासिक तकनीक को याद किया जा सके, जिसने पूरी दुनिया में फिल्मों को एक नई पहचान दी। डिजिटल युग में भले ही फिल्म रील्स का इस्तेमाल लगभग खत्म हो गया हो, लेकिन सिनेमा की नींव इन्हीं रील्स पर रखी गई थी। Reel Film Day हमें उस दौर की याद दिलाता है, जब फिल्मों को कैमरे में कैद करने के लिए सेलुलॉइड रील्स का इस्तेमाल किया जाता था।
क्या है Reel Film Day?
Reel Film Day एक ऐसा खास दिन है जो पारंपरिक फिल्म रील टेक्नोलॉजी और उसके योगदान को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। इस दिन फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग, सिनेप्रेमी और फिल्म इतिहासकार सिनेमा के शुरुआती दौर को याद करते हैं। यह दिन यह समझने का मौका देता है कि कैसे सीमित संसाधनों के बावजूद फिल्ममेकर्स ने कालजयी फिल्में बनाई।
फिल्म रील का इतिहास
फिल्म रील का इतिहास 19वीं सदी के अंत से शुरू होता है। शुरुआती फिल्मों को रिकॉर्ड करने के लिए सेलुलॉइड फिल्म स्ट्रिप्स का उपयोग किया जाता था, जिन्हें रील में लपेटा जाता था। साल 1895 में जब लुमिएर ब्रदर्स ने पहली बार सार्वजनिक रूप से फिल्म दिखाई, तब यही रील तकनीक इस्तेमाल की गई थी। भारत में भी सिनेमा की शुरुआत रील फिल्म से ही हुई। दादासाहेब फाल्के की 1913 में आई फिल्म राजा हरिश्चंद्र को फिल्म रील पर ही शूट किया गया था। उस दौर में एक-एक सीन को शूट करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता था, क्योंकि रील महंगी होती थी और एडिटिंग के विकल्प सीमित थे।
रील फिल्म बनाम डिजिटल सिनेमा
रील फिल्म और डिजिटल सिनेमा के बीच बड़ा फर्क है। रील पर शूट की गई फिल्मों में एक अलग तरह की ग्रेन, टेक्सचर और गहराई होती थी, जिसे आज भी कई फिल्ममेकर पसंद करते हैं। वहीं डिजिटल सिनेमा ने फिल्ममेकिंग को आसान, सस्ता और तेज बना दिया।रील फिल्म में एडिटिंग के लिए फिल्म को काटकर जोड़ना पड़ता था, जबकि डिजिटल तकनीक में यह काम कुछ क्लिक में हो जाता है। हालांकि सुविधा के बावजूद, कई दिग्गज डायरेक्टर्स का मानना है कि रील फिल्म की “आत्मा” डिजिटल में पूरी तरह नहीं आ पाती।
Reel Film Day का महत्व
Reel Film Day सिर्फ एक तकनीक को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह सिनेमा के संघर्ष, रचनात्मकता और जुनून का प्रतीक है। यह दिन नई पीढ़ी को यह सिखाता है कि आज जो अत्याधुनिक तकनीक उपलब्ध है, वह दशकों की मेहनत और प्रयोगों का नतीजा है। फिल्म स्कूल्स, म्यूजियम और आर्काइव्स में इस दिन खास स्क्रीनिंग्स, वर्कशॉप्स और डिस्कशन आयोजित किए जाते हैं। कई जगहों पर क्लासिक फिल्मों को रील प्रोजेक्टर पर दिखाया जाता है, ताकि लोग पुराने सिनेमाई अनुभव को महसूस कर सकें।
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भारत में Reel Film Day की अहमियत
भारत जैसे फिल्म-प्रेमी देश में Reel Film Day का महत्व और भी बढ़ जाता है। हिंदी सिनेमा से लेकर क्षेत्रीय फिल्मों तक, हजारों यादगार फिल्में रील पर बनी हैं। राज कपूर, गुरुदत्त, बिमल रॉय जैसे दिग्गजों की फिल्में आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। आज भले ही शूटिंग डिजिटल कैमरों से हो रही हो, लेकिन भारतीय सिनेमा की आत्मा रील युग में ही गढ़ी गई थी। Reel Film Day हमें उन तकनीशियनों, सिनेमैटोग्राफर्स और एडिटर्स को याद करने का मौका देता है, जिनका योगदान अक्सर पर्दे के पीछे रह जाता है।
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क्यों जरूरी है Reel Film Day मनाना?
रील फिल्म धीरे-धीरे इतिहास बन चुकी है, लेकिन उसे भुलाना सिनेमा के विकास को नजरअंदाज करने जैसा होगा। Reel Film Day हमें सिखाता है कि तकनीक बदल सकती है, लेकिन कहानी कहने का जादू हमेशा कायम रहता है। यह दिन फिल्म प्रेमियों के लिए नॉस्टैल्जिया का मौका होता है और नए क्रिएटर्स के लिए प्रेरणा का स्रोत। पुरानी तकनीकों को समझना भविष्य की फिल्मों को और बेहतर बनाने में मदद करता है। Reel Film Day सिनेमा के उस स्वर्णिम अध्याय को श्रद्धांजलि है, जिसने फिल्मों को एक कला के रूप में स्थापित किया। यह दिन याद दिलाता है कि डिजिटल दौर से पहले भी फिल्में लोगों को हंसाती थीं, रुलाती थीं और सोचने पर मजबूर करती थीं। रील फिल्म भले ही अब कम इस्तेमाल होती हो, लेकिन उसकी विरासत हमेशा सिनेमा के इतिहास में अमर रहेगी।
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