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भारत में बिक रही Fanta पर बड़ा सवाल, UK के मुकाबले 3 गुना ज्यादा चीनी का दावा

Fanta, भारत में बिकने वाले पैकेज्ड फूड और सॉफ्ट ड्रिंक्स को लेकर एक नई Reuters रिपोर्ट ने बहस तेज कर दी है। रिपोर्ट में भारत और यूरोप में एक ही ग्लोबल ब्रांड के उत्पादों की सामग्री और लेबलिंग में अंतर को लेकर सवाल उठाए गए हैं। सबसे ज्यादा चर्चा Fanta को लेकर है।

Fanta में इतना अंतर क्यों? भारत में 3 गुना चीनी और यूरोप में आर्टिफिशियल कलर पर हेल्थ वॉर्निंग

Fanta, भारत में बिकने वाले पैकेज्ड फूड और सॉफ्ट ड्रिंक्स को लेकर एक नई Reuters रिपोर्ट ने बहस तेज कर दी है। रिपोर्ट में भारत और यूरोप में एक ही ग्लोबल ब्रांड के उत्पादों की सामग्री और लेबलिंग में अंतर को लेकर सवाल उठाए गए हैं। सबसे ज्यादा चर्चा Fanta को लेकर है। Reuters के मुताबिक, लंदन में बिकने वाली Fanta की एक कैन में 63 कैलोरी होती हैं, जबकि भारत में बिकने वाले इसी ब्रांड के पेय में करीब तीन गुना ज्यादा चीनी पाई जाती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय संस्करण में एक आर्टिफिशियल कलर मौजूद है, जिसके लिए यूरोप में प्रमुख हेल्थ वॉर्निंग जरूरी होती है।

लंदन और भारत की Fanta में कितना अंतर?

Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन में बिकने वाली Fanta में प्रति 100 मिलीलीटर करीब 4.6 ग्राम चीनी है, जबकि भारत में बिकने वाली Fanta में यह मात्रा लगभग 13 ग्राम प्रति 100 मिलीलीटर बताई गई है। यानी दोनों बाजारों में एक ही ब्रांड के नाम से बिकने वाले पेय की शुगर प्रोफाइल में बड़ा अंतर दिखाई देता है।यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ज्यादा मात्रा में चीनी का नियमित सेवन मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम से जुड़ा माना जाता है। हालांकि, किसी एक उत्पाद के सेवन से स्वास्थ्य पर असर का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। कुल डाइट, मात्रा और सेवन की आवृत्ति भी महत्वपूर्ण होती है।

आर्टिफिशियल कलर को लेकर भी सवाल

रिपोर्ट में Fanta के भारतीय संस्करण में इस्तेमाल होने वाले आर्टिफिशियल कलर का भी जिक्र किया गया है। Reuters के मुताबिक, जिस कलरेंट का इस्तेमाल किया गया है, उसकी मौजूदगी यूरोप में कुछ खाद्य उत्पादों पर प्रमुख स्वास्थ्य चेतावनी से जुड़ी होती है। वहीं भारत में इसकी जानकारी पैकेज के पीछे छोटे अक्षरों में दी जाती है।यही अंतर अब उपभोक्ता अधिकार और पारदर्शिता को लेकर बहस का विषय बन गया है। सवाल यह उठ रहा है कि अगर किसी उत्पाद के किसी घटक को लेकर यूरोप में ग्राहक को स्पष्ट चेतावनी दी जाती है, तो भारत में वही जानकारी उतनी प्रमुखता से क्यों नहीं दिखाई जाती।

मामला सिर्फ Fanta तक सीमित नहीं

Reuters की रिपोर्ट का फोकस केवल Fanta नहीं है। इसमें भारत में पैकेज्ड फूड और पेय पदार्थों के लिए फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लागू करने की कोशिश और उस पर खाद्य उद्योग की प्रतिक्रिया की भी चर्चा की गई है। भारत में लंबे समय से इस बात पर बहस चल रही है कि ज्यादा चीनी, नमक और वसा वाले उत्पादों पर पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी होनी चाहिए या नहीं।स्वास्थ्य विशेषज्ञों का तर्क है कि ग्राहक सुपरमार्केट या दुकान में किसी उत्पाद को खरीदते समय कुछ ही सेकंड में फैसला करता है। ऐसे में अगर महत्वपूर्ण पोषण संबंधी जानकारी पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में हो, तो उसे समझना मुश्किल हो सकता है। फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी का उद्देश्य इसी जानकारी को ज्यादा स्पष्ट बनाना है।

भारत में फ्रंट लेबलिंग को लेकर क्या हुआ?

रिपोर्ट के अनुसार, Food Safety and Standards Authority of India यानी FSSAI ने पैकेज्ड फूड पर रंगीन फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लागू करने की योजना को आगे नहीं बढ़ाया। इसके बजाय नियामक ने चीनी, नमक और वसा की मात्रा बताने वाली ब्लैक-एंड-व्हाइट न्यूट्रिशनल टेबल का प्रस्ताव रखा है।FSSAI की ओर से यह तर्क दिया गया कि केवल रंगीन चेतावनी लेबल भारतीय भोजन की विविधता और अपेक्षाकृत अधिक तीखे स्वाद को पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखते। हालांकि, इस फैसले की सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने आलोचना की है।

बड़ी कंपनियों पर क्यों उठे सवाल?

Reuters की रिपोर्ट में Coca-Cola और Nestlé जैसी बड़ी कंपनियों का भी जिक्र है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ वैश्विक कंपनियां यूरोपीय बाजारों में अधिक स्पष्ट पोषण लेबलिंग का इस्तेमाल करती हैं, जबकि भारत में फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी के प्रस्ताव का उद्योग जगत ने विरोध किया।यही विरोधाभास अब बहस का केंद्र बन गया है। आलोचकों का सवाल है कि अगर उपभोक्ता को यूरोप में किसी उत्पाद की पोषण संबंधी जानकारी अधिक स्पष्ट रूप से बताई जा सकती है, तो भारत में भी समान स्तर की पारदर्शिता क्यों नहीं होनी चाहिए।हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि कंपनियां जानबूझकर भारतीय ग्राहकों को नुकसान पहुंचाने के लिए अलग फॉर्मूला इस्तेमाल करती हैं। अलग-अलग देशों में खाद्य नियम, स्वाद की पसंद, उपलब्ध सामग्री और बाजार की मांग अलग होती है। इसलिए उत्पादों की रेसिपी में बदलाव होना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है।

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मार्च की बैठक में क्या हुआ था?

Reuters के मुताबिक, मार्च 2026 में भारतीय खाद्य नियामक और उद्योग प्रतिनिधियों के बीच इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण बैठक हुई थी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि उद्योग प्रतिनिधियों ने फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी को लेकर आपत्ति जताई और इसे उपभोक्ताओं के लिए भ्रम पैदा करने वाला बताया।कंपनियों की ओर से यह तर्क भी सामने आया कि केवल चेतावनी चिह्न लगाने से लोग जरूरी नहीं कि कम चीनी या कम नमक वाले उत्पाद खरीदना शुरू कर दें। इसके बजाय हिस्से यानी portion size और संतुलित सेवन पर जोर देने की बात कही गई।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग को लेकर विवाद अब न्यायिक स्तर तक भी पहुंच चुका है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले की समीक्षा कर रहा है। इससे पैकेज्ड फूड पर स्पष्ट स्वास्थ्य चेतावनी का मुद्दा और महत्वपूर्ण हो गया है।यह बहस ऐसे समय हो रही है जब भारत में मोटापा और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों को लेकर चिंता बढ़ रही है। Reuters ने The Lancet में प्रकाशित एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि 2050 तक भारत में करीब 45 करोड़ लोग अधिक वजन या मोटापे की समस्या से प्रभावित हो सकते हैं।

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यूरोप में हेल्थ वॉर्निंग क्यों अहम है?

यूरोप में कुछ आर्टिफिशियल कलरेंट वाले खाद्य उत्पादों पर विशेष चेतावनी की व्यवस्था है। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को उत्पाद खरीदने से पहले संभावित प्रभावों के बारे में जानकारी देना है। Reuters की रिपोर्ट में Fanta के भारतीय संस्करण में मौजूद कलरेंट और यूरोपीय लेबलिंग व्यवस्था के बीच इसी अंतर को प्रमुखता से दिखाया गया है।यहां यह समझना जरूरी है कि किसी उत्पाद पर चेतावनी होना और उसका बिक्री के लिए प्रतिबंधित होना दो अलग बातें हैं। हेल्थ वॉर्निंग का उद्देश्य उपभोक्ता को जानकारी देकर चुनाव करने में सक्षम बनाना होता है।

आम उपभोक्ता के लिए इसका क्या मतलब?

इस रिपोर्ट के बाद उपभोक्ताओं के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि किसी भी पैकेज्ड ड्रिंक या फूड को खरीदते समय सिर्फ ब्रांड नाम या विज्ञापन पर निर्भर न रहें। लेबल पर दी गई चीनी, कैलोरी, नमक, वसा और अन्य सामग्री की जानकारी को देखना बेहतर है।खासकर बच्चों को नियमित रूप से ज्यादा चीनी वाले पेय देने से बचना और पानी, दूध या अन्य कम चीनी वाले विकल्पों को प्राथमिकता देना स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर हो सकता है। भारत में Fanta और ब्रिटेन में बिकने वाली Fanta के बीच चीनी की मात्रा में कथित बड़ा अंतर Reuters की रिपोर्ट के बाद चर्चा का विषय बन गया है। इसके साथ ही पैकेज्ड फूड पर स्पष्ट हेल्थ वॉर्निंग, कंपनियों की लेबलिंग नीति और भारतीय उपभोक्ताओं को मिलने वाली जानकारी पर भी सवाल उठ रहे हैं।

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