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Tisca Chopra: दीपिका के बाद टिस्का चोपड़ा ने भी उठाया मुद्दा, बोलीं- शूटिंग के घंटे होने चाहिए तय

Tisca Chopra, जागरण फिल्म फेस्टिवल 2026 में अभिनेत्री टिस्का चोपड़ा ने फिल्म इंडस्ट्री में काम करने के तौर-तरीकों और कलाकारों को मिलने वाली सुविधाओं पर खुलकर बात की।

Tisca Chopra : फिल्म इंडस्ट्री में काम के घंटों पर फिर छिड़ी बहस, टिस्का चोपड़ा ने कही ये बात

Tisca Chopra, जागरण फिल्म फेस्टिवल 2026 में अभिनेत्री टिस्का चोपड़ा ने फिल्म इंडस्ट्री में काम करने के तौर-तरीकों और कलाकारों को मिलने वाली सुविधाओं पर खुलकर बात की। उन्होंने खास तौर पर शूटिंग के दौरान लंबे वर्किंग आवर्स, महिलाओं के लिए टॉयलेट की कमी और सेट पर घंटों तक भारी कॉस्ट्यूम में काम करने की चुनौतियों का जिक्र किया। टिस्का ने लंबे शूटिंग शेड्यूल को ‘दिहाड़ी मजदूरी’ जैसा बताया और कहा कि पैकअप का समय तय होना चाहिए। उनके इस बयान को अभिनेत्री दीपिका पादुकोण की आठ घंटे की वर्क शिफ्ट की मांग से जोड़कर देखा जा रहा है।

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महिलाओं के लिए टॉयलेट की सुविधा पर उठाया सवाल

टिस्का चोपड़ा ने फिल्म सेट पर महिलाओं को होने वाली परेशानियों के बारे में बात करते हुए कहा कि शूटिंग लोकेशन पर टॉयलेट की स्थिति अब भी कई बार ठीक नहीं होती। खासकर जब शूटिंग किसी बाहरी लोकेशन पर हो, तो महिला कलाकारों और क्रू मेंबर्स को बुनियादी सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।उन्होंने बताया कि कई बार महिलाओं को टॉयलेट इस्तेमाल करने के लिए चादर या दूसरे अस्थायी इंतजामों का सहारा लेना पड़ता है। टिस्का के मुताबिक, फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं के लिए बेहतर और सुरक्षित टॉयलेट सुविधाएं उपलब्ध कराना जरूरी है। उनका मानना है कि शूटिंग के दौरान कलाकारों और क्रू की बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

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लंबे वर्किंग आवर्स को बताया दिहाड़ी मजदूरी

टिस्का ने शूटिंग के लंबे शेड्यूल को भी एक बड़ी समस्या बताया। उन्होंने कहा कि फिल्म सेट पर काम केवल कैमरे के सामने अभिनय करने तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें काफी शारीरिक मेहनत भी शामिल होती है। कलाकारों को कई-कई घंटे अपने कॉस्ट्यूम में रहना पड़ता है। कई बार भारी ज्वेलरी, विग और मेकअप के साथ लंबे समय तक बैठना या शूटिंग करना पड़ता है।उन्होंने इस स्थिति को ‘दिहाड़ी मजदूरी’ जैसा बताते हुए कहा कि काम के घंटों को व्यवस्थित करने की जरूरत है। टिस्का ने अपनी इच्छा जाहिर की कि जब पैकअप का समय बताया जाए, तो वास्तव में उसी समय काम खत्म भी हो जाना चाहिए। उनके अनुसार, अगर 12 घंटे में पैकअप हो जाता है, तो यह अच्छा है, लेकिन 10 घंटे में शूटिंग पूरी हो जाए तो और बेहतर होगा।उनकी इस टिप्पणी ने फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले कलाकारों और तकनीकी कर्मचारियों के वर्किंग कंडीशंस पर एक बार फिर चर्चा शुरू कर दी है।

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दीपिका पादुकोण भी उठा चुकी हैं आठ घंटे की शिफ्ट का मुद्दा

फिल्मों में काम के घंटों को लेकर अभिनेत्री दीपिका पादुकोण भी पहले अपनी राय रख चुकी हैं। उन्होंने आठ घंटे की वर्क शिफ्ट की जरूरत पर बात की थी। दीपिका का कहना रहा है कि फिल्म इंडस्ट्री में लंबे समय तक काम करने को सामान्य मान लिया गया है, जबकि पर्याप्त आराम मिलने से काम की गुणवत्ता और उत्पादकता बेहतर हो सकती है।दीपिका ने यह भी कहा था कि फिल्म के क्रू मेंबर्स को अतिरिक्त काम के लिए ओवरटाइम का भुगतान मिलना चाहिए। उनके मुताबिक, कलाकारों के साथ-साथ कैमरा, लाइट, मेकअप और दूसरे विभागों में काम करने वाले लोगों के काम के घंटों और सुविधाओं पर भी ध्यान देना जरूरी है।दीपिका की आठ घंटे की शिफ्ट की मांग के बाद फिल्म इंडस्ट्री में इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। कुछ कलाकारों ने उनकी बात का समर्थन किया, जबकि कुछ ने फिल्म निर्माण की व्यावहारिक चुनौतियों का हवाला देते हुए तय समय में शूटिंग पूरी करने को मुश्किल बताया।

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फिल्म सेट पर बेहतर सुविधाओं की जरूरत

टिस्का चोपड़ा के बयान ने इस बहस का एक दूसरा पहलू भी सामने रखा है। शूटिंग के दौरान लंबे समय तक काम करना केवल समय से जुड़ा मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका असर कलाकारों और क्रू की शारीरिक थकान, आराम और काम करने की परिस्थितियों पर भी पड़ता है। खासकर महिलाओं के लिए टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता भी उतनी ही जरूरी है।फिल्म निर्माण में कई बार लोकेशन, मौसम, तकनीकी दिक्कतों और शूटिंग की जरूरतों के कारण शेड्यूल बढ़ सकता है। हालांकि, ऐसे में काम करने वाले लोगों के आराम और अतिरिक्त समय के भुगतान को लेकर स्पष्ट व्यवस्था होना भी महत्वपूर्ण है।जागरण फिल्म फेस्टिवल 2026 में टिस्का चोपड़ा की यह बातचीत फिल्म इंडस्ट्री में कामकाजी माहौल को लेकर जारी चर्चा का हिस्सा बन गई है। दीपिका पादुकोण के बाद टिस्का ने भी लंबे वर्किंग आवर्स और सेट पर मिलने वाली सुविधाओं पर सवाल उठाए हैं। अब देखना होगा कि फिल्म इंडस्ट्री में काम के घंटों और बुनियादी सुविधाओं को लेकर यह चर्चा आगे किस दिशा में जाती है।

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