Diwali 2026: दिवाली के खास स्नान की परंपरा, तिल के तेल से अभ्यंग करने के पीछे छिपा है बड़ा महत्व
Diwali 2026, दिवाली का त्योहार आते ही घरों में साफ-सफाई, सजावट, पूजा-पाठ और पकवानों की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इस पर्व पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करने के साथ कई ऐसी परंपराएं भी निभाई जाती हैं, जिनका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।
Diwali 2026 : दिवाली पर सूर्योदय से पहले क्यों करते हैं अभ्यंग स्नान? जानें तिल के तेल से जुड़ी परंपरा
Diwali 2026, दिवाली का त्योहार आते ही घरों में साफ-सफाई, सजावट, पूजा-पाठ और पकवानों की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इस पर्व पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करने के साथ कई ऐसी परंपराएं भी निभाई जाती हैं, जिनका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इन्हीं में से एक है अभ्यंग स्नान (Abhyanga Snan)। खासतौर पर नरक चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली के दिन तिल के तेल से शरीर की मालिश करके स्नान करने की परंपरा है। कई जगह इसे रूप चौदस और नरक चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन सूर्योदय से पहले तिल के तेल से अभ्यंग स्नान करने से नकारात्मकता दूर होती है और व्यक्ति को सौंदर्य, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। आइए जानते हैं क्या है अभ्यंग स्नान, इसे करने का सही तरीका और इसके पीछे छिपी धार्मिक मान्यता।
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क्या होता है अभ्यंग स्नान?
अभ्यंग स्नान एक पारंपरिक स्नान विधि है, जिसमें नहाने से पहले पूरे शरीर पर तेल लगाकर मालिश की जाती है। इसके लिए आमतौर पर तिल के तेल का इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद में भी तेल से शरीर की मालिश को अभ्यंग कहा गया है। इसमें शरीर पर हल्के हाथों से तेल लगाया जाता है, ताकि त्वचा को नमी मिले और शरीर को आराम महसूस हो।नरक चतुर्दशी के दिन इस स्नान का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर शरीर पर तिल का तेल लगाना चाहिए और फिर उबटन या पारंपरिक स्नान सामग्री से स्नान करना चाहिए। महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में यह परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है।
नरक चतुर्दशी पर क्यों किया जाता है अभ्यंग स्नान?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर नामक राक्षस के वध से जुड़ा है। मान्यता है कि नरकासुर के अत्याचारों से परेशान लोगों को भगवान कृष्ण ने मुक्ति दिलाई थी। इसी विजय की खुशी में नरक चतुर्दशी मनाई जाती है।धार्मिक परंपरा में माना जाता है कि इस दिन सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करने से नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है। कुछ मान्यताओं में इसे पापों से मुक्ति और जीवन में सकारात्मकता लाने वाला स्नान भी बताया गया है। हालांकि, ये धार्मिक आस्थाएं और परंपराएं हैं, जिन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरीके से मनाया जाता है।

अभ्यंग स्नान में तिल के तेल का ही इस्तेमाल क्यों?
हिंदू धार्मिक परंपराओं में तिल के तेल को विशेष महत्व दिया गया है। पूजा-पाठ, दीपक जलाने और कई धार्मिक अनुष्ठानों में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। मान्यता है कि तिल का तेल पवित्र होता है और इसका संबंध शुभता से है। इसी वजह से नरक चतुर्दशी पर अभ्यंग स्नान के लिए तिल के तेल को प्राथमिकता दी जाती है।आयुर्वेद में भी तिल के तेल का इस्तेमाल शरीर की मालिश के लिए लंबे समय से होता रहा है। इसे त्वचा को मुलायम बनाए रखने और रूखेपन को कम करने में मददगार माना जाता है। खासकर सर्दियों की शुरुआत में जब मौसम में बदलाव के कारण त्वचा रूखी होने लगती है, तब तेल से मालिश करने की परंपरा उपयोगी हो सकती है।
अभ्यंग स्नान करने का सही तरीका क्या है?
अभ्यंग स्नान करने के लिए सबसे पहले सुबह जल्दी उठकर स्नान की तैयारी करें। इसके बाद थोड़ी मात्रा में तिल का तेल लेकर शरीर पर हल्के हाथों से मालिश करें। हाथ-पैर, कंधों और शरीर के अन्य हिस्सों पर आराम से तेल लगाएं। चेहरे पर तेल लगाने से पहले अपनी त्वचा के प्रकार का ध्यान रखें।तेल लगाने के बाद कुछ समय तक इसे शरीर पर रहने दें। इसके बाद गुनगुने पानी से स्नान करें। पारंपरिक रूप से कई जगह स्नान के दौरान बेसन, चंदन, हल्दी या उबटन का इस्तेमाल भी किया जाता है। हालांकि, त्वचा पर किसी भी नई सामग्री का इस्तेमाल करने से पहले उसकी अनुकूलता जांचना जरूरी है।धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन स्नान के बाद साफ कपड़े पहनकर भगवान की पूजा की जाती है और घर में दीप जलाए जाते हैं।
अभ्यंग स्नान के क्या हो सकते हैं फायदे?
तिल के तेल से मालिश करने के कुछ शारीरिक फायदे भी हो सकते हैं। नियमित और सही तरीके से की गई तेल मालिश त्वचा को नमी देने में मदद कर सकती है।
त्वचा का रूखापन कम करने में मदद: तिल के तेल में मौजूद फैटी एसिड त्वचा को मुलायम बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। इससे खासकर सूखी त्वचा को राहत मिल सकती है।
शरीर को आराम: हल्के हाथों से मालिश करने से मांसपेशियों को आराम महसूस हो सकता है। इससे शरीर की थकान कम करने में भी मदद मिल सकती है।
तनाव कम करने में मदद: आरामदायक वातावरण में की गई हल्की मालिश से मन को सुकून मिल सकता है। यह रोजमर्रा के तनाव से राहत पाने का एक तरीका हो सकता है।
त्वचा की नमी बनाए रखना: मौसम बदलने पर त्वचा में रूखापन बढ़ सकता है। ऐसे में तेल लगाने से त्वचा की नमी बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, अभ्यंग स्नान को किसी बीमारी का इलाज नहीं समझना चाहिए। इसके फायदे व्यक्ति की त्वचा और स्वास्थ्य की स्थिति पर निर्भर करते हैं।
अभ्यंग स्नान करते समय इन बातों का रखें ध्यान
तिल के तेल से मालिश करते समय कुछ सावधानियां बरतना जरूरी है। अगर आपकी त्वचा संवेदनशील है या पहले से किसी तरह की एलर्जी है, तो तेल लगाने से पहले पैच टेस्ट जरूर करें। त्वचा पर जलन, खुजली या लालिमा होने पर इसका इस्तेमाल बंद कर दें।चेहरे और आंखों के आसपास तेल लगाने से बचें। अगर त्वचा पर घाव, संक्रमण या सूजन है, तो प्रभावित हिस्से पर मालिश न करें। स्नान के दौरान बाथरूम का फर्श भी फिसलन भरा हो सकता है, इसलिए सावधानी रखें।
परंपरा और सेहत का खूबसूरत मेल
नरक चतुर्दशी पर अभ्यंग स्नान केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की एक पुरानी परंपरा भी है। इसमें शरीर की देखभाल, स्वच्छता और सकारात्मक शुरुआत का संदेश छिपा है। जहां धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे शुभता और नकारात्मकता से मुक्ति से जोड़ा जाता है, वहीं तेल मालिश त्वचा को नमी देने और शरीर को आराम पहुंचाने में मदद कर सकती है।इसलिए इस दिवाली अगर आप भी अभ्यंग स्नान की परंपरा निभाना चाहते हैं, तो अपनी सेहत और त्वचा का ध्यान रखते हुए इसे अपना सकते हैं। त्योहार की शुरुआत स्वच्छता, सकारात्मकता और अपनों के साथ खुशियां बांटने के संकल्प के साथ करें।
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