2,500 डॉलर का एक ताबूत! Kargil Coffin Controversy में कीमत से लेकर गुणवत्ता तक पर उठे सवाल
Kargil Coffin Controversy, देश की रक्षा करते हुए अपनी जान गंवाने वाले सैनिकों का सम्मान हर भारतीय के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
Kargil Coffin Controversy : शहीदों के ताबूतों की खरीद पर सवालों से संसद तक गूंजा विवाद, क्या थी पूरी कहानी?
Kargil Coffin Controversy, देश की रक्षा करते हुए अपनी जान गंवाने वाले सैनिकों का सम्मान हर भारतीय के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन कारगिल युद्ध के बाद सैनिकों के पार्थिव शरीर को लाने के लिए खरीदे गए ताबूतों की कीमत और गुणवत्ता को लेकर ऐसा विवाद सामने आया, जिसने देश की राजनीति से लेकर संसद तक हलचल मचा दी। इस मामले को आमतौर पर ‘कारगिल ताबूत घोटाला’ या ‘Coffin Scam’ कहा जाता है। साल 2001-2002 में सामने आए इस विवाद में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की रिपोर्ट ने खरीद प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए थे। हालांकि, इस मामले में लगाए गए आरोपों और बाद में हुई न्यायिक कार्रवाई के बीच अंतर समझना भी जरूरी है।

क्या था कारगिल ताबूत खरीद का पूरा मामला?
साल 1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध हुआ था। इस युद्ध में भारतीय सेना के कई जवान शहीद हुए। उनके पार्थिव शरीर को सम्मानपूर्वक लाने और उनके परिवारों तक पहुंचाने के लिए विशेष ताबूतों की जरूरत महसूस की गई। इसी सिलसिले में रक्षा मंत्रालय ने अमेरिका की एक कंपनी से एल्युमिनियम के ताबूत खरीदने का सौदा किया।रक्षा मंत्रालय के रिकॉर्ड के अनुसार, ऑपरेशन विजय के मद्देनजर 150 एल्युमिनियम ताबूतों की खरीद को मंजूरी दी गई थी। इन ताबूतों का इस्तेमाल शहीद सैनिकों के पार्थिव शरीर को सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से ले जाने के लिए किया जाना था। लेकिन बाद में इनकी कीमत और गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने लगे।
172 डॉलर और 2,500 डॉलर की कीमत ने क्यों बढ़ाया विवाद?
इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा ताबूतों की कीमत को लेकर हुई। CAG की रिपोर्ट में एक ताबूत की खरीद कीमत लगभग 2,500 अमेरिकी डॉलर होने पर सवाल उठाया गया था। वहीं, सेना से जुड़े एक पुराने दस्तावेज में वर्ष 1994 के दौरान इसी तरह के ताबूत की कीमत करीब 172 डॉलर बताई गई थी।दोनों कीमतों के बीच बड़ा अंतर होने के कारण खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठे। विपक्ष ने आरोप लगाया कि ताबूतों को बहुत ज्यादा कीमत पर खरीदा गया और सरकारी धन के इस्तेमाल में अनियमितताएं हुईं।हालांकि, उस समय के रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने कीमतों के अंतर पर अपना पक्ष रखा था। उन्होंने कहा था कि 172 डॉलर वाली कीमत के आधार को लेकर सवाल थे और अलग-अलग परिस्थितियों में कीमतों में अंतर हो सकता है। सरकार ने यह भी कहा था कि खरीद प्रक्रिया में जिम्मेदारी तय करने का विषय संसद की लोक लेखा समिति यानी Public Accounts Committee के विचाराधीन है।
गुणवत्ता पर भी उठे थे गंभीर सवाल
विवाद सिर्फ कीमत तक सीमित नहीं रहा। रक्षा मंत्रालय के रिकॉर्ड और उस समय की रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका से आए ताबूत निर्धारित वजन संबंधी मानकों पर खरे नहीं उतरे। मार्च 2000 में भारत पहुंची खेप को गुणवत्ता जांच के बाद इस्तेमाल के लिए अस्वीकार कर दिया गया था।रिपोर्टों में बताया गया कि ताबूतों का वजन तय मानकों से अधिक था। इसके बाद आपूर्ति करने वाली कंपनी और खरीद प्रक्रिया की भूमिका पर सवाल उठे। मामला इसलिए भी गंभीर माना गया क्योंकि ये ताबूत युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के पार्थिव शरीर को ले जाने के लिए खरीदे गए थे।इस खरीद को लेकर सरकारी खजाने को हुए नुकसान के अलग-अलग आंकड़े सामने आए। बाद में केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI ने अपनी जांच में लगभग 89 लाख रुपये के नुकसान का उल्लेख किया। यह जांच एजेंसी का आरोप था, न कि अदालत द्वारा दोष सिद्ध किए जाने का निष्कर्ष।
संसद में हुआ हंगामा, विपक्ष ने मांगा जवाब
दिसंबर 2001 में यह मामला संसद में जोरदार तरीके से उठा। विपक्षी नेताओं ने ताबूतों की कीमत और गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से जवाब मांगा। इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में हंगामा हुआ और कार्यवाही भी बाधित हुई।उस समय केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA की सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। विपक्ष ने सरकार से खरीद प्रक्रिया में जिम्मेदारी तय करने की मांग की।दूसरी ओर, सरकार ने अपने पक्ष में कहा कि खरीद के दौरान निर्धारित प्रक्रिया अपनाई गई थी और ताबूतों की गुणवत्ता से जुड़ी समस्या के बाद आपूर्तिकर्ता के खिलाफ कदम उठाए गए। जॉर्ज फर्नांडिस ने भी इस मामले में जिम्मेदारी तय करने के लिए संसदीय जांच प्रक्रिया की बात कही थी। इस तरह ताबूतों की खरीद का मुद्दा एक बड़े राजनीतिक विवाद में बदल गया।
CBI जांच में क्या सामने आया?
मामले की जांच आगे बढ़ने के बाद CBI ने जून 2006 में केस दर्ज किया। जांच एजेंसी ने आरोप लगाया कि ताबूतों और बॉडी बैग की खरीद में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा।अगस्त 2009 में CBI ने दिल्ली की विशेष अदालत में चार लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। इनमें अमेरिका में भारतीय दूतावास में तत्कालीन सैन्य अधिकारी रहे मेजर जनरल अरुण रॉय, कर्नल एस. के. मलिक, कर्नल एफ. बी. सिंह और अमेरिकी आपूर्तिकर्ता विक्टर बैजा शामिल थे।गौर करने वाली बात यह है कि तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का नाम इस आरोपपत्र में शामिल नहीं था। हालांकि, किसी आरोपपत्र में नाम होना अपने आप में दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। अदालत में आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य जरूरी होते हैं।
Read More: Kerala Governor: लोकभवन में खाने को लेकर नया आदेश, सिर्फ शाकाहारी भोजन बनाने के फैसले पर सवाल
अदालत में क्या हुआ? क्या आरोप साबित हुए?
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू दिसंबर 2013 में सामने आया। दिल्ली की एक अदालत ने तीन सैन्य अधिकारियों को आरोपों से मुक्त कर दिया। अदालत ने कहा कि उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले। अमेरिकी आपूर्तिकर्ता विक्टर बैजा भी इस मामले में आरोपपत्र में शामिल था, लेकिन वह अदालत में पेश नहीं हुआ था।इसलिए इस मामले को समझते समय दो बातों में अंतर करना जरूरी है। पहली, CAG की रिपोर्ट में खरीद की कीमत और प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे और CBI ने जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल किया था। दूसरी, अदालत में आरोपों के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण तीन सैन्य अधिकारियों को राहत मिली। इस मामले में आरोपों को दोष सिद्ध होने के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा।
शहीदों के सम्मान से जुड़ा मामला क्यों है महत्वपूर्ण?
कारगिल ताबूत विवाद केवल सरकारी खरीद या पैसों के लेन-देन का मामला नहीं था। इसने रक्षा खरीद में पारदर्शिता, गुणवत्ता की जांच और सरकारी धन के इस्तेमाल को लेकर कई सवाल सामने रखे। जब किसी वस्तु की खरीद सेना और शहीद सैनिकों से जुड़ी हो, तो यह सुनिश्चित करना जरूरी होता है कि निर्धारित मानकों का पालन किया जाए और किसी भी तरह की अनियमितता की शिकायत की निष्पक्ष जांच हो।इस मामले से यह भी स्पष्ट होता है कि किसी सरकारी सौदे पर सवाल उठने के बाद जांच, संसदीय समीक्षा और न्यायिक प्रक्रिया की अपनी-अपनी भूमिकाएं होती हैं। किसी रिपोर्ट में आपत्ति दर्ज होना, जांच एजेंसी का आरोप लगाना और अदालत में दोष सिद्ध होना अलग-अलग चरण हैं। किसी भी विवाद को समझने के लिए इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखना जरूरी है।
कारगिल ताबूत विवाद से क्या सबक मिलता है?
साल 2001-2002 में चर्चा में आया यह विवाद आज भी रक्षा खरीद में जवाबदेही और पारदर्शिता की अहमियत को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उदाहरण है। इस मामले में ताबूतों की कीमत, गुणवत्ता और खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठे, संसद में बहस हुई और जांच के बाद मामला अदालत तक पहुंचा। लेकिन न्यायिक प्रक्रिया के परिणाम को भी उसी गंभीरता से सामने रखना चाहिए, जिस गंभीरता से शुरुआती आरोपों पर चर्चा की जाती है।देश के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले सैनिकों का सम्मान केवल शब्दों तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनके पार्थिव शरीर को सम्मानपूर्वक घर पहुंचाना, उनके परिवारों के प्रति संवेदनशीलता दिखाना और सेना से जुड़े खर्चों में जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।कारगिल ताबूत विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि रक्षा खरीद में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्थाएं कितनी प्रभावी हैं। लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन उन सवालों के जवाब तथ्यों, निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही सामने आने चाहिए। यही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही का वास्तविक अर्थ है।
We’re now on WhatsApp. Click to join.
अगर आपके पास भी हैं कुछ नई स्टोरीज या विचार, तो आप हमें इस ई-मेल पर भेज सकते हैं info@oneworldnews.com.







