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Dopamine and Serotonin Effect: कभी खुशी तो कभी चिड़चिड़ापन, आखिर हार्मोन्स कैसे बदलते हैं हमारा मूड और व्यवहार?

Dopamine and Serotonin Effect, कभी अचानक बहुत खुशी महसूस होना, किसी काम को पूरा करने की जबरदस्त इच्छा होना, तनाव में चिड़चिड़ापन बढ़ जाना या बिना किसी स्पष्ट वजह के मूड खराब रहना इन सबके पीछे केवल हमारी परिस्थितियां ही जिम्मेदार नहीं होतीं।

Dopamine and Serotonin Effect : मूड स्विंग्स के पीछे हो सकते हैं ये हार्मोन्स, डोपामिन से सेरोटोनिन तक समझें पूरा कनेक्शन

Dopamine and Serotonin Effect, कभी अचानक बहुत खुशी महसूस होना, किसी काम को पूरा करने की जबरदस्त इच्छा होना, तनाव में चिड़चिड़ापन बढ़ जाना या बिना किसी स्पष्ट वजह के मूड खराब रहना इन सबके पीछे केवल हमारी परिस्थितियां ही जिम्मेदार नहीं होतीं। शरीर के अंदर बनने वाले हार्मोन और न्यूरोट्रांसमीटर भी भावनाओं, प्रेरणा, नींद, भूख और व्यवहार को प्रभावित करते हैं। हालांकि आम बोलचाल में डोपामिन और सेरोटोनिन को “हैप्पी हार्मोन” कहा जाता है, लेकिन वैज्ञानिक रूप से यह शब्द पूरी तस्वीर नहीं बताता। डोपामिन और सेरोटोनिन मुख्य रूप से न्यूरोट्रांसमीटर हैं और शरीर में इनकी भूमिका काफी व्यापक है। हालिया शोध भी बताता है कि दोनों अलग-अलग तरह की रिवार्ड और पनिशमेंट प्रक्रियाओं से जुड़े हो सकते हैं।

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डोपामिन क्या करता है?

डोपामिन को अक्सर खुशी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसका सबसे महत्वपूर्ण संबंध प्रेरणा, रिवार्ड, सीखने और किसी लक्ष्य की ओर बढ़ने से है। जब हमें किसी काम के बाद अच्छा परिणाम मिलता है या कोई अपेक्षित इनाम मिलने वाला होता है, तो डोपामिन सिस्टम सक्रिय हो सकता है। यह मस्तिष्क को यह समझने में मदद करता है कि कौन-सा व्यवहार दोबारा किया जाना चाहिए।2025 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण में 100 से अधिक अध्ययनों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें डोपामिन से रिवार्ड प्रोसेसिंग, रिवार्ड लर्निंग और लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रयास की तीव्रता जैसे पहलुओं के बीच संबंध पाया गया। इसका मतलब यह नहीं है कि डोपामिन सीधे-सीधे “खुशी” पैदा करता है, बल्कि यह हमारे व्यवहार को प्रेरित और निर्देशित करने वाली कई प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है।

सेरोटोनिन की भूमिका क्या है?

सेरोटोनिन को मूड, नींद, भूख और कई दूसरी शारीरिक प्रक्रियाओं से जोड़ा जाता है। मस्तिष्क में इसका सिस्टम भावनात्मक नियंत्रण और व्यवहार के अलग-अलग पहलुओं को प्रभावित करता है। हालिया वैज्ञानिक समीक्षा में भी सेरोटोनिन को मूड और व्यवहार से जुड़े महत्वपूर्ण न्यूरोट्रांसमीटर के रूप में वर्णित किया गया है।लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि सेरोटोनिन की मात्रा बढ़ते ही व्यक्ति खुश हो जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसका प्रभाव रिसेप्टर्स, मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों और दूसरे न्यूरोकेमिकल सिस्टम के साथ इसकी बातचीत पर निर्भर करता है। इसी कारण मूड से जुड़ी समस्याएं केवल “कम सेरोटोनिन” की वजह से बताना बहुत सरल व्याख्या होगी।

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तनाव में कोर्टिसोल कैसे करता है काम?

जब शरीर तनाव महसूस करता है, तो हाइपोथैलेमस-पिट्यूटरी-एड्रिनल यानी HPA axis सक्रिय हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप कोर्टिसोल जैसे तनाव से जुड़े हार्मोन रिलीज होते हैं। थोड़े समय के तनाव में यह सिस्टम शरीर को चुनौती का सामना करने के लिए तैयार करता है, लेकिन लंबे समय तक तनाव रहने पर यही प्रक्रिया मूड और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है।वैज्ञानिक शोध में HPA axis और मस्तिष्क के मोनोअमीन न्यूरोट्रांसमीटर सिस्टम के बीच जटिल संबंध सामने आया है। तनाव से जुड़ी हार्मोनल गतिविधि सेरोटोनिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर के काम को प्रभावित कर सकती है।

एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन भी डालते हैं असर

महिलाओं में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे सेक्स हार्मोन भी मस्तिष्क के उन सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं जो मूड और भावनाओं से जुड़े हैं। एस्ट्रोजन का संबंध सेरोटोनिन, डोपामिन और नॉरएड्रेनालिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर सिस्टम से पाया गया है। यही कारण है कि हार्मोन में होने वाले प्राकृतिक बदलाव कुछ महिलाओं में मूड और भावनात्मक स्थिति में बदलाव के साथ जुड़े हो सकते हैं।मेनोपॉज के दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन में बदलाव भी न्यूरोट्रांसमीटर सिस्टम और तनाव प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। 2025 की एक समीक्षा में बताया गया कि इन हार्मोनल बदलावों के साथ नींद, गर्मी के दौरे, तनाव और अन्य सामाजिक-मानसिक कारक मिलकर भावनात्मक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।

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थायरॉइड हार्मोन का भी कनेक्शन

थायरॉइड से निकलने वाले T3 और T4 हार्मोन शरीर के मेटाबॉलिज्म के साथ-साथ मस्तिष्क के कामकाज में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। थायरॉइड हार्मोन में गड़बड़ी होने पर थकान, एकाग्रता में परेशानी और मूड में बदलाव जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। शोध में थायरॉइड हार्मोन और डोपामिन, सेरोटोनिन तथा नॉरएड्रेनालिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर के बीच संबंध पाया गया है।इसलिए लगातार मूड में बदलाव को केवल तनाव या व्यक्तित्व का हिस्सा मान लेना हमेशा सही नहीं होता। कुछ मामलों में शरीर में मौजूद हार्मोनल या अन्य चिकित्सकीय कारण भी भूमिका निभा सकते हैं।

ऑक्सीटोसिन और सामाजिक व्यवहार

ऑक्सीटोसिन को अक्सर प्यार और रिश्तों से जुड़े हार्मोन के रूप में बताया जाता है। यह सामाजिक जुड़ाव, मातृत्व और कुछ सामाजिक व्यवहारों से जुड़ी प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। हालांकि इसके प्रभाव भी परिस्थिति और व्यक्ति के सामाजिक वातावरण के अनुसार बदल सकते हैं। यानी इसे भी केवल “लव हार्मोन” कहकर समझना वैज्ञानिक रूप से अधूरा होगा।

क्या आंत और खान-पान भी मूड को प्रभावित करते हैं?

अब वैज्ञानिकों का ध्यान gut-brain axis यानी आंत और मस्तिष्क के बीच दोतरफा संबंध पर भी है। हालिया शोध में बताया गया है कि आंत में मौजूद माइक्रोबायोम कुछ ऐसे जैविक रास्तों को प्रभावित कर सकता है जो सेरोटोनिन, डोपामिन, GABA और ग्लूटामेट जैसे न्यूरोट्रांसमीटर से जुड़े हैं। हालांकि इस क्षेत्र में कई निष्कर्ष अभी शोध के स्तर पर हैं और इनके आधार पर किसी खास प्रोबायोटिक या डाइट को मानसिक बीमारी का इलाज मानना उचित नहीं है।

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मूड सिर्फ एक हार्मोन से कंट्रोल नहीं होता

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मूड और व्यवहार को किसी एक “हैप्पी हार्मोन” से समझना सही नहीं है। डोपामिन रिवार्ड और प्रेरणा से जुड़ा है, सेरोटोनिन कई भावनात्मक और शारीरिक प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है, कोर्टिसोल तनाव प्रतिक्रिया का हिस्सा है, जबकि एस्ट्रोजन और थायरॉइड हार्मोन जैसे दूसरे हार्मोन भी मस्तिष्क के न्यूरोकेमिकल सिस्टम को प्रभावित करते हैं।यही वजह है कि नींद, तनाव, भोजन, शारीरिक गतिविधि, सामाजिक संबंध और स्वास्थ्य की स्थिति—सभी मिलकर हमारे मूड को प्रभावित कर सकते हैं। वैज्ञानिक शोध लगातार यह समझने की कोशिश कर रहा है कि इन अलग-अलग सिस्टम के बीच संतुलन किस तरह व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। इसलिए किसी व्यक्ति के मूड में लंबे समय से बदलाव हो रहा हो, तो केवल “डोपामिन कम है” या “सेरोटोनिन कम है” मानने के बजाय उचित चिकित्सकीय मूल्यांकन कराना ज्यादा सही तरीका है।

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