अब पैकेट देखकर ही पता चलेगा कितना Sugar-Salt-Fat! Warning Label पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
Warning Label, पैकेज्ड फूड और ड्रिंक्स पर फ्रंट-ऑफ-पैक Warning Label को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। 1
पैकेज्ड फूड कंपनियों को झटका! Warning Label पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सेहत को लेकर जताई चिंता
Warning Label, पैकेज्ड फूड और ड्रिंक्स पर फ्रंट-ऑफ-पैक Warning Label को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। 10 सितंबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि वह पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर ज्यादा कड़े हेल्थ वॉर्निंग लेबल लागू करने के लिए तैयार है। यह मामला खास तौर पर उन खाद्य पदार्थों से जुड़ा है जिनमें जरूरत से ज्यादा अतिरिक्त चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण चिंता लोगों, खासकर बच्चों, की सेहत है।

क्या है Front-of-Pack Warning Label?
फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल का मतलब है कि किसी पैकेज्ड फूड के सामने ही साफ और आसानी से दिखाई देने वाली जानकारी दी जाए, ताकि ग्राहक खरीदारी से पहले यह समझ सके कि उस उत्पाद में चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा ज्यादा है या नहीं। अभी भारत में पोषण से जुड़ी विस्तृत जानकारी मुख्य रूप से पैकेट के पीछे दी जाती है, जिसे पढ़ना हर उपभोक्ता के लिए आसान नहीं होता। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि ग्राहक को पैकेट खोलने या छोटे अक्षरों में लिखी जानकारी पढ़ने से पहले ही उत्पाद की पोषण संबंधी स्थिति का अंदाजा हो जाए।
FSSAI ने रखा था दो चरणों वाला प्रस्ताव
इस मामले में Food Safety and Standards Authority of India यानी FSSAI ने पहले दो चरणों में Warning Label लागू करने का प्रस्ताव रखा था। शुरुआती चरण में उन पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स के फ्रंट पर लाल रंग का हेक्सागोनल चेतावनी चिन्ह लगाने की बात थी, जिनमें तय सीमा से ज्यादा कम से कम दो पोषक तत्व यानी अतिरिक्त चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट मौजूद हों। इसके बाद दूसरे चरण में नियमों को और सख्त करने का प्रस्ताव था। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस मॉडल पर सवाल उठाए और कहा कि केवल दो पोषक तत्वों की सीमा पार होने पर चेतावनी लगाने से कई ऐसे उत्पाद इसके दायरे से बाहर रह सकते हैं जिनमें किसी एक हानिकारक पोषक तत्व की मात्रा काफी ज्यादा हो।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछे सख्त सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर सवाल उठाया कि Warning Label की व्यवस्था को दो चरणों में क्यों लागू किया जाए। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला ने इस बात पर जोर दिया कि अगर किसी खाद्य पदार्थ में चीनी या नमक की मात्रा तय सीमा से ज्यादा है तो उपभोक्ता को उसकी जानकारी मिलनी चाहिए। अदालत की चिंता यह है कि नियमों में ऐसी कोई गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए जिससे स्वास्थ्य के लिहाज से चिंता वाले उत्पाद बिना स्पष्ट चेतावनी के बाजार में मौजूद रहें।

सरकार ने एक साथ सख्त नियम लागू करने पर जताई सहमति
सुप्रीम कोर्ट के सवालों के बाद केंद्र की ओर से पेश वकील ने संकेत दिया कि सरकार दो चरणों वाले मॉडल के बजाय दोनों चरणों को एक साथ लागू करने पर विचार कर सकती है। इसका मतलब यह होगा कि अगर किसी उत्पाद में तीन में से किसी एक पोषक तत्व अतिरिक्त चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट की मात्रा निर्धारित सीमा से ज्यादा पाई जाती है, तो उस पर Warning Label लगाने का रास्ता खुल सकता है। हालांकि, अंतिम नियम और उनकी सटीक शर्तें आधिकारिक आदेश और नियामकीय प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होंगी।
Food Industry की अलग राय
दूसरी ओर पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री ने प्रस्तावित नियमों को लेकर अपनी चिंताएं सामने रखी हैं। All India Food Processors’ Association ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि पोषण संबंधी Warning Label तय करते समय प्रति 100 ग्राम या 100 मिलीलीटर के बजाय वास्तविक सर्विंग साइज को आधार बनाया जाना चाहिए। इंडस्ट्री का तर्क है कि अलग-अलग खाद्य पदार्थों को लोग अलग-अलग मात्रा में खाते हैं और केवल 100 ग्राम के आधार पर मूल्यांकन करने से कुछ पारंपरिक खाद्य पदार्थों पर भी चेतावनी लग सकती है।
चीनी, नमक और फैट को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?
पैकेज्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के बढ़ते इस्तेमाल के बीच ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार चिंता जताते रहे हैं। इनका जरूरत से ज्यादा सेवन लंबे समय में मोटापा और कई गैर-संचारी बीमारियों के जोखिम से जुड़ा हो सकता है। इसी वजह से फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग को उपभोक्ताओं को बेहतर जानकारी देने का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना जा रहा है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार भारत में मोटापा और अधिक वजन एक बढ़ती स्वास्थ्य चिंता है और विशेषज्ञ खाद्य पदार्थों की पोषण संबंधी जानकारी को उपभोक्ताओं के लिए ज्यादा स्पष्ट बनाने की मांग कर रहे हैं।
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बच्चों की सेहत पर भी सुप्रीम कोर्ट का जोर
इस सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर बढ़ते बच्चों की सेहत को लेकर चिंता जताई। अदालत ने संकेत दिया कि खाद्य लेबलिंग का उद्देश्य केवल कंपनियों के लिए नियम बनाना नहीं, बल्कि लोगों को बेहतर और सूचित विकल्प चुनने में मदद करना होना चाहिए। बच्चों में पैकेज्ड स्नैक्स, मीठे पेय और अन्य प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की लोकप्रियता को देखते हुए साफ चेतावनी उपभोक्ताओं और अभिभावकों के लिए उपयोगी हो सकती है।
आगे क्या हो सकता है?
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के लिखित आदेश और सरकार की अगली कार्रवाई पर नजर रहेगी। यदि ज्यादा सख्त Front-of-Pack Warning Label व्यवस्था लागू होती है, तो पैकेज्ड फूड कंपनियों को अपने उत्पादों की पैकेजिंग और लेबलिंग में बदलाव करना पड़ सकता है। इससे ग्राहकों को खरीदारी के समय उत्पाद में मौजूद अतिरिक्त चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट के बारे में ज्यादा स्पष्ट जानकारी मिल सकती है। हालांकि, Warning Label की सीमा, सर्विंग साइज या प्रति 100 ग्राम मानक और लागू होने की तारीख जैसे अंतिम विवरण आधिकारिक नियमों के बाद ही सामने आएंगे।
उपभोक्ताओं के लिए क्या मतलब है?
फिलहाल उपभोक्ताओं को किसी नए Warning Label के लागू होने का इंतजार करने के बजाय पैकेट के पीछे दी गई Nutrition Information जरूर पढ़नी चाहिए। खास तौर पर अतिरिक्त चीनी, सोडियम और सैचुरेटेड फैट की मात्रा पर ध्यान देना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह बहस इस बात को रेखांकित करती है कि पैकेज्ड फूड खरीदते समय सिर्फ स्वाद, कीमत या विज्ञापन ही नहीं, बल्कि उसकी पोषण संबंधी जानकारी भी महत्वपूर्ण है।कुल मिलाकर, पैकेज्ड फूड के फ्रंट पर Warning Label का मुद्दा अब केवल खाद्य कंपनियों और नियामक के बीच का मामला नहीं रह गया है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और केंद्र के बदले रुख से संकेत मिल रहा है कि भारत में उपभोक्ताओं को खाद्य पदार्थों से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों की जानकारी देने के लिए नियम और मजबूत हो सकते हैं। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के आगामी लिखित आदेश और FSSAI की अंतिम व्यवस्था पर है।
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