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Allahabad High Court: CCTV फुटेज गायब, पुलिस के जवाबों से नाराज HC, SHO की जेब से जाएगा 65 हजार रुपये का मुआवजा

Allahabad High Court, उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है।

Allahabad High Court : इलाहाबाद HC ने देवरिया पुलिस को लगाई जमकर फटकार, SHO की सैलरी से 65 हजार वसूलने का आदेश

Allahabad High Court, उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। गौरी बाजार थाने में चार लोगों को कथित तौर पर अवैध हिरासत में रखने के मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने देवरिया के पुलिस अधीक्षक (SP) और थाने के स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) को कड़ी फटकार लगाई। पुलिस की ओर से थाने के CCTV कैमरे खराब होने और संबंधित अवधि की रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं होने की दलील पर अदालत संतुष्ट नहीं हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को लेकर बेहद तीखी टिप्पणी करते हुए उन्हें ‘झूठों का पुलिंदा’ तक कह दिया।

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चार लोगों की अवैध हिरासत का मामला

मामला देवरिया के गौरी बाजार पुलिस स्टेशन से जुड़ा है। चार लोगों की ओर से हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि पुलिस ने उन्हें गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा। आरोप के मुताबिक, कुछ याचिकाकर्ताओं को करीब 10 दिनों तक थाने में रखा गया। संबंधित हिरासत की अवधि 13 अप्रैल से 23 अप्रैल 2026 के बीच बताई गई है।मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस स्टेशन के CCTV कैमरों की रिकॉर्डिंग मांगी थी, ताकि यह पता लगाया जा सके कि याचिकाकर्ताओं को वास्तव में थाने में रखा गया था या नहीं और पुलिस की ओर से किए गए दावों की सच्चाई क्या है। लेकिन पुलिस की ओर से अदालत को बताया गया कि उस दौरान CCTV सिस्टम में तकनीकी खराबी थी और इसलिए रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं है। यही जवाब कोर्ट के लिए सबसे बड़ा सवाल बन गया।

CCTV खराब होने की दलील पर कोर्ट नाराज

अदालत ने पुलिस अधिकारियों से CCTV सिस्टम के खराब होने को लेकर कई सवाल पूछे। कोर्ट यह जानना चाहता था कि कैमरे कब खराब हुए, उन्हें कब ठीक किया गया और खराबी के बावजूद रिकॉर्डिंग क्यों उपलब्ध नहीं थी। पुलिस अधिकारियों के जवाब से अदालत संतुष्ट नहीं हुई। हाईकोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि यदि थाने का CCTV सिस्टम काम नहीं कर रहा था तो इसे ठीक कराने के लिए समय पर क्या कदम उठाए गए थे।अदालत के सामने CCTV फुटेज का उपलब्ध न होना इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि यही रिकॉर्ड पुलिस के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच में अहम सबूत हो सकता था। जब कोर्ट ने रिकॉर्डिंग मांगी और पुलिस उसे पेश नहीं कर पाई, तो मामले में पुलिस की भूमिका और उसके स्पष्टीकरण पर गंभीर सवाल खड़े हुए।

‘झूठों का पुलिंदा’ कहकर जताई नाराजगी

सुनवाई के दौरान पुलिस अधिकारियों की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण पर हाईकोर्ट की नाराजगी इतनी बढ़ गई कि अदालत ने पुलिस अधिकारियों के लिए बेहद कड़ी टिप्पणी की। रिपोर्टों के मुताबिक, जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की पीठ ने पुलिस के जवाबों पर सवाल उठाते हुए उन्हें ‘बंच ऑफ लायर्स’ यानी ‘झूठों का पुलिंदा’ कहा।कोर्ट की इस टिप्पणी से साफ था कि अदालत पुलिस की ओर से पेश की गई कहानी को लेकर आश्वस्त नहीं थी। खास तौर पर CCTV खराब होने और रिकॉर्डिंग नहीं मिलने की वजह को लेकर पुलिस का पक्ष अदालत को विश्वसनीय नहीं लगा।

SP से पूछा- SHO पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

मामले में देवरिया के SP की भूमिका पर भी कोर्ट ने सवाल उठाए। अदालत ने यह जानना चाहा कि यदि थाने में CCTV से जुड़ी इतनी गंभीर खामी थी तो संबंधित SHO के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई। सुनवाई के दौरान SP और गौरी बाजार थाने के प्रभारी को अदालत के सामने पेश होना पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार, SP ने अदालत से बिना शर्त माफी भी मांगी।कोर्ट का रुख इस बात को लेकर भी सख्त था कि पुलिस स्टेशन जैसे संवेदनशील स्थान पर CCTV व्यवस्था को लेकर इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हुई। पुलिस थानों में CCTV रिकॉर्डिंग का उद्देश्य ही पुलिस की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखना और हिरासत से जुड़े मामलों में तथ्य सामने लाना है। ऐसे में रिकॉर्डिंग का गायब होना या उपलब्ध न होना न्यायिक जांच को प्रभावित कर सकता है।

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चार याचिकाकर्ताओं को 65 हजार रुपये मुआवजा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले में चारों याचिकाकर्ताओं को मुआवजा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने तीन याचिकाकर्ताओं को 20-20 हजार रुपये और चौथे याचिकाकर्ता को 5 हजार रुपये देने का निर्देश दिया। इस तरह कुल मुआवजे की राशि 65 हजार रुपये बनती है।अदालत ने खास तौर पर निर्देश दिया कि यह रकम संबंधित SHO के वेतन से वसूली जाए। यानी राज्य सरकार पहले मुआवजे का भुगतान करेगी और बाद में 65 हजार रुपये की राशि SHO की सैलरी से रिकवर की जाएगी। इस आदेश को पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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अवैध हिरासत पर अदालत का सख्त संदेश

हाईकोर्ट का यह रुख केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि पुलिस हिरासत में नागरिकों के अधिकारों को लेकर भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। किसी व्यक्ति को कानून के मुताबिक प्रक्रिया का पालन किए बिना हिरासत में रखना उसके मौलिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर मामला हो सकता है। ऐसे मामलों में पुलिस से पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है।देवरिया मामले में अदालत ने इसी बात को गंभीरता से लिया। जब पुलिस के पास कथित हिरासत की अवधि से जुड़ी CCTV रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध नहीं थी, तो अदालत ने पुलिस के स्पष्टीकरण को लेकर सवाल उठाए और पीड़ितों के लिए मुआवजे का आदेश दिया।

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पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

इस मामले ने उत्तर प्रदेश के पुलिस थानों में CCTV व्यवस्था और उसकी निगरानी को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। CCTV कैमरे केवल सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि पुलिस और आम नागरिक दोनों के अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यदि किसी थाने में कैमरे लंबे समय तक खराब रहते हैं या रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं होती, तो गंभीर मामलों में सच्चाई सामने लाना मुश्किल हो सकता है।हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी से यह संदेश भी गया है कि पुलिस अधिकारियों को अदालत के सामने अपने दावों और रिकॉर्ड को लेकर पूरी तरह जवाबदेह रहना होगा। केवल तकनीकी खराबी का हवाला देकर रिकॉर्डिंग के अभाव को सही नहीं ठहराया जा सकता, खासकर तब जब मामला किसी व्यक्ति की कथित गैरकानूनी हिरासत से जुड़ा हो।फिलहाल, इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश ने देवरिया पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा तेज कर दी है। चार लोगों की कथित अवैध हिरासत, CCTV फुटेज का उपलब्ध न होना और पुलिस अधिकारियों के स्पष्टीकरण पर अदालत की नाराजगी इस मामले के प्रमुख बिंदु रहे। कोर्ट द्वारा 65 हजार रुपये का मुआवजा SHO की सैलरी से वसूलने का आदेश भी पुलिस जवाबदेही को लेकर एक कड़ा संदेश माना जा रहा है।

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