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World Education Day: 70 सालों में भारत में क्या है शिक्षा का स्तर

राजधानी में सरकार द्वारा शिक्षा की सुधार के लिए उठाये गए हैं अहम कदम


भारत जनसंख्या की नज़रो से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। वहीं पर शिक्षा के मामले में भी सबसे बड़ी अशिक्षित जनसख्या यहीं निवास करती है। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद देश ने जहाँ आर्थिक विकास किया वही शिक्षा के मामले में भी बहुत प्रगति की ।

जिन गाँवों में एक भी विद्यालय नहीं था और इने-गिने ही शिक्षित व्यक्ति थे, वहाँ पर विद्यालय की स्थापना की गयी और लोगों में शिक्षा के प्रति जागृति आई । लेकिन जितनी तेजी से विकास होना चाहिए था या जितनी गति से साक्षरता दर बढ़नी चाहिए थी, नहीं बड़ी । इसके कई कारण थे। इसमें बेरोजगारी और निर्धनता प्रमुख थी ।

इसको देखते हुए केन्द्र और राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर सबको शिक्षित और साक्षर बनाने के लिए कई प्रकार के प्रयास किए । अनेक गैर सरकारी या अर्धसरकारी योजनाएँ भी काम कर रही थीं । इससे जहाँ लोग बहुत बड़ी संख्या मे अशिक्षित और निरक्षर थे, वहाँ पर उन्हें यह समझ में आने लगा कि बिना पढ़े-पढाए न उनका कल्याण सम्भव है और न ही परिवार तथा समाज की उन्नति हो सकती है। यह भी समझ में आने लगा कि शिक्षा वह अंधकार मिटने का सशक्त माध्यम है जिससे व्यक्ति, परिवार और समाज का वहुमुखी विकास होता है।

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राजधानी में शिक्षा का स्तर:

अगर दिल्ली में शिक्षा के स्तर की बात करे तो शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए दिल्ली सरकार ने कई प्रमुख बिल पास किए हैं। एजुकेशन को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी काफी गंभीर है और हर तरीके के घोटाले को हटाना चाहते है। केजरीवाल ने प्राइवेट स्कूलों के बारे में बात करते हुए कहा कि पहले की स्थिति में कोई भी व्यक्ति प्राइवेट स्कूल बिना धोखाधड़ी के नहीं चला सकता था, अब कोई भी अगर ईमानदारी से स्कूल चलाना चाहे तो वह ऐसा कर सकता है। वहीं विपक्ष के विधायकों ने इस बिल का विरोध करते हुए सदन से वॉकआउट किया। विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता का कहना है कि इस बिल में कई खामियां हैं और बिल में स्कूलों को फीस बढ़ाने की खुली छूट दी जा रही है।

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