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काम की बात करोना

 जानें कैसे सोशल मीडिया द्वारा आम आदमी ही नहीं सेलेब्रिटिज भी दो गुटों में बंट जाते हैं

जानें कैसे हर बड़े आंदोलन की रीढ़ कैसे बन गया है ट्विटर


दुनिया जैसे- जैसे आगे  बढ़ी उसमें कई तरह के बदलाव होते गए. समाज में लोगों के अधिकारों से लेकर, टेक्नोलॉजी के साथ बदलती दुनिया तक हर चीज़ ने बदलाव को स्वीकार किया है. आज दुनिया में इतना बदलाव आ गया है टेक्नोलॉजी के द्वारा हम जिसे नहीं भी जानते हैं उससे घंटों सोशल मीडिया पर किसी बात पर बहस करते हैं. ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम ने लोगों के बीच तर्कों की एक अलग दुनिया को जन्म दिया है जहाँ से अब खबरें बनती हैं. तो चलिए आज काम की बात में हम बात करेंगे कैसे ट्विटर लोगों के एक युद्ध क्षेत्र बनता जा रहा है. हर दिन आंख खोलते ही लोग ट्विटर के हैशटैग चैक करते हैं. जिससे यह निर्धारित होता है कि कौन सी खबर आज दिनभर सुर्खियों में रहेगी.

अहम बिंदु

– अंतराष्ट्रीय सेलिब्रिटिज्स ने लगाया ट्विटर वार

– बिलकिस  बानो पर ट्वीट

– बेरोजगारी दिवस

– दो अप्रैल को ट्विटर द्वारा आंदोलन के लिए आह्वान

– आईटी सेल की भूमिका

किसान आंदोलन को लगभग तीन महीने होने जा रहे हैं. इस दौरान आंदोलन में कई मामले देखने को मिल रहे हैं. जिसमें आम आदमी से लेकर सेलेब्रिटिज्स तक कूद पड़े हैं. किसान आंदोलन जब से शुरु हुआ है. इसे सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा प्रचारित किया गया. ‘किसान एकता मोर्चा’ नाम का फेसबुक पेज बनाया गया. जिसके द्वारा लोगों को इससे जोड़ा जा सके. लेकिन अब किसान आंदोलन में कंगना और दलजीत दोसांझ के ट्वीट से आगे बढ़ते हुए अंतराष्ट्रीय सेलेब्ट्री तक पहुंच गया है.

अंतराष्ट्रीय सेलिब्रिटिज्स ने लगाया ट्विटर वार

खबरों की मानें तो साल 2016 तक पूरी दुनिया में 32 करोड़ ट्विटर पर एक्टिव मेंबर थे. अब इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछले चार सालों  में टेक्नोलॉजी के मामले में कितने आगे आ चुका हैं. इन्हीं चार सालों  में हम 4G से 5G की तरफ बढ़ चुके हैं. इतना ही नहीं बढ़ती टेक्नोलॉजी के बीच लोगों को वर्चुअल लड़ाइयों की तादाद में भी बढ़ोतरी हुई है. लोग अन्जान लोगों से घंटो बहस करते हैं. ऐसा ही कुछ किसान आंदोलन के दौरान हुआ. लभगग दो महीने बाद अचानक 31 जनवरी की रात हॉलीवुड  पॉप स्टार रिहाना के एक ट्वीट ने न्यूज चैनलों को आने वाले कुछ समय के लिए खबरों का पिटारा और लोगों के लिए लड़ने का एक मौका तैयार कर दिया. जिसमें आम से लेकर खास हर कोई दो गुटों में बंट गए.

 

रविवार की शाम 31 जनवरी को पॉप स्टार रिहाना ने किसानों के समर्थन में ट्वीट करते हुए कहा था कि इस समस्या पर भी ध्यान देने की जरुरत है. बस इसी बात के बाद पूरा सेलेब्रिटी गुट रिहाना को गलत साबित करने पर जुड़ गया. कंगना रन्नौत ने उसे पॉर्न स्टार तक कह दिया . वहीं दूसरी ओर किसी मुद्दे पर अक्सर चुप्पी लगाकर रखने वाले क्रिकेटर भी इस मुद्दे पर रिहाना को सबक सिखाने लगे. इस बहस में सेलेब्रिटिज के बाद आम लोग जुड़ गए. इस बात पर गौर करने वाली बात यह है कि ट्वीट ने  पूरे भारत में बहस का एक मौका तैयार कर दिया है. जिसमें न्यूज चैनल्स ने तो रिहाना को पेड ट्वीट  तक की बात कह दी. महाराष्ट्र के बीजेपी अध्यक्ष चंद्राकांत पाटील ने कहा है कि रिहाना को 18 लाख दिया गया है. वर्ना किसी पॉप स्टार को क्या जरुरत पड़ी है भारत के मुद्दे पर बोलने की.

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बिलकिस बानो पर ट्वीट

किसान आंदोलन के समर्थन के मामले में ट्वीट का मामला यही नहीं रुकि. किसान आंदोलन के शुरुआत दौर में ही ट्विटर द्वारा एजेंटा सेट किया जा रहा है. सितंबर में आएं तीन कृषि कानूनों को लेकर पंजाब में विरोध प्रदर्शन जारी था. हर जिले में कानून के विरोध में रैलियां की जा रही थी. इस दौरान पंजाब के मोगा जिले में एक बुजुर्ग महिला कमर के बल झुककर किसानों के समर्थन में आई. इस बुजुर्ग महिला की फोटो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई. जिसने एक पूरा एजेंडा तैयार कर दिया. जिसमें न्यूज चैनलों में खबर चलाने से लेकर पड़ताल करने तक की चीजों शामिल थी. इसी फोटो के लेकर एक्टर कंगना रन्नौत ने ट्वीट करते हुए बुजुर्ग महिला को शाहीन बाग में बिलकिस बानो बता दिया जिसे टाइम मैगनीज को 100 सबसे पावरफुल महिलाओं में शामिल किया गया था. इसी बात ने तुल पकड़ लिया. जिसके बाद तो पूरी मीडिया आमजनता को बुजुर्ग महिला को देशद्रोही साबित करने में जुड गई.

बेरोजगारी दिवस

ट्विटर ने हैगटैग के जरिए पूरा एक आंदोलन खड़ा किया जा सकता है. पिछले साल कोरोना और लॉकडाउन से परेशान युवा बेरोजगारी को लेकर अपना जीवन खत्म कर रहे थे. बिहार के मोतिहारी जिले के उस युवक को हम सब  कैसे भूल सकते हैं जिसने खून से लेटर लिखकर आत्महत्या कर ली थी. इस तरह की स्थिति ने युवाओं को और निराश कर दिया है. इससे  परेशान युवाओं ने ट्विटर का सहारा लिया. इस सहारे ने युवाओं के परेशानियां का निवारण किया. पिछले पांच सितंबर को “पांच सितंबर पांच बजे” के नाम से हैगटैग चलाया गया. जिसमें कई युवाओं ने हिस्सा लिया. जिसके फलस्वरुप ने देश के सड़कों पर युवाओं ने थाली ताली के साथ अपना गुस्सा जाहिर किया. इसके बाद 17 सितंबर को पीएम मोदी के जन्मदिन पर युवाओं ने बेरोजगारी दिवस के तौर पूरे भारत में युवाओं ने एकजुटता दिखाई. जिसके फलस्वरुप सरकार को झुकना पड़ा और दिसंबर में निलंबिलत पड़ी परीक्षाओं को शेड्युल किया.  इस दौरान परेशान युवाओं ने #राष्ट्रीय_बेरोजगार_दिवस ट्रेंड करवाया.

दो अप्रैल को ट्विटर द्वारा आंदोलन के लिए आह्वान

एससी एसटी एक्ट 1989 कानून के मामले सुप्रीम कोर्ट के फैसले बाद देश विभिन्न हिस्सों में इस फैसले के खिलाफ लोगों को एकजुट करने का काम सोशल मीडिया ने किया. जिसके द्वारा एकजुट हुए लोगों ने 2 अप्रैल 2018 में सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया. जिसमें ट्विटर का अहम योगदान रहा. ट्वीट के द्वारा ही सारी खबरें दी गई. जिसके द्वारा एक बार फिर पूरे आंदोलन को दो गुटों में बांट दिया. जहां एक ओर लोग इस आंदोलन के समर्थन में थे तो दूसरी ओर इसके विरोध में. इस तरह से एक आंदोलन को पूरा रुख ही बदल दिया.

आईटी सेल की भूमिका

बदलती टेक्नोलॉजी के बीच राजनीति पूरी तरह से टेक्नोलॉजी मय हो गई है. हर बड़ी राजनीतिक पार्टी का एक आईटी सेल है. जो हर खबर पर अपनी पैनी नजर रखती है. जो किसी भी खबर को अपने हिसाब से सोशल मीडिया पर पेश करते है. शाहीन बाग का आंदोलन हम सब  कैसे भूल सकते हैं. जब सरकार महिलाओं को वहां से उठाने में नाकाम रही तो उसे सोशल मीडिया का सहारा लिया. सुबह-सुबह लोगों को ट्विटर पर एक वीडियो वायरल किया गया .जिसमें बताया गया कि आंदोलन में बैठी महिलाएं को 500 रुपए दिए जा रहे हैं. जिससे लालच में महिलाएं कड़ाके की ठंड में वहां बैठी हैं. लेकिन बाद में पड़ताल में यह बाद गलत साबित हुई.

हम अक्सर देखते हैं मीडिया का लोगों को जीवन में अहम भूमिका रही है. हर दौर में मीडिया के अलग-अलग साधनों ने लोगों के जीवन में तरह-तरह के प्रभाव डाले हैं. जिस दौर में मीडिया के जिस साधन का दबदबा रहा  है उसने अपने हिसाब से लोगों को दिमाग को कंट्रोल किया है. प्रथम विश्व युद्ध  के दौर में अखबार द्वारा लोगों को दो गुटों में बंटा गया. इसी दौर में भारत में अखबारों द्वारा लोगों  स्वतंत्रता  के लिए प्रेरित किया गया. भारत में इंमरजेंसी के दौर में रेडिया की अहम भूमिका रही है. अब दौर टेक्नोलॉजी का है. जिसके द्वारा खबरों का निर्धारण कर उसे लोगों के सामने परोसा जा रहा है और उसे अपने नियंत्रण में रखा जा रहा है. जिसका सीधा लाभ सरकार और राजनीतिक  पार्टियों को मिलता है.

 

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काम की बात करोना

किसान आंदोलन में स्लोगन और बॉयकॉट का नारा बना रहा है इसे और मजबूत

महिलाएं  भी हर कदम पर कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है.


नए कृषि कानून के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन के 26 दिन हो चुके हैं. आज किसान संगठनों ने लोगों से समर्थन के तौर पर एक टाइम का खाना नहीं खाने की अपील की है. इस बीच सरकार और किसान संगठनों को बीच अब तक हुई बातचीत बेनतीजा रही है. दिल्ली के बॉर्डर को चारों तरफ से किसानों ने घेरा हुआ है. सिंघु बॉर्डर, टीकरी बॉर्डर और गाजीपुर बॉर्डर पर लगातार पंजाब, हरियाणा, पश्चिम यूपी और राजस्थान के किसान कड़ाके की ठंड में डटे हुए हैं. इस बीच किसान आंदोलन को लेकर मीडिया में कई तरह की खबरें आ रही है. कहीं इन्हें खालिस्तानी संबोधित किया जा रहा तो कहीं आंतकवादी. बात इतनी बड़ा गई कि कुछ दिन पहले ही धरने पर बैठे लोगों में नेशनल मीडिया का ही बॉयकॉट कर दिया और उनके पत्रकारों से बात करने से भी इंकार कर दिया. लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शन के बीच पीएम मोदी ने कहा है कि किसानों को भड़काने का काम किया जा रहा है. आज ‘काम की बात’ में हम ‘वन वर्ल्ड न्यूज’ द्वारा की गई ग्रांउड रिपोर्ट को बताएंगे कि लोग कैसे अपने-अपने स्तर नए कृषि कानून कार विरोध करे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्ष को दी नसीहत

26 नवंबर की सुबह से ही खबर आने लग गई थी किसानों ने दिल्ली की तरफ कूच कर दिया था. जिन्हें रोकने के लिए सरकार द्वारा हर नामुनकिन कोशिश की गई. किसानों पर ठंड में वाटर कैनन द्वारा पानी गिराने से लेकर रास्ते के अवरुद्ध करने तक हर कोशिश की गई. लेकिन किसान रुके नहीं और दिल्ली के बॉर्डर तक आ पहुंचे. अब इस आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट ने भी संज्ञान होते हुए सरकार और किसान संगठन दोनों को ही नसीहत दी है. चीफ जस्टिस एसए बोबडे की बेंच ने किसानों को सड़कों से हटाने की अर्जी पर दोबारा सुनवाई करते कहा है कि सरकार इस कानून को होल्ड करने की संभावनों को तलाशे. वहीं किसानों के लिए ‘राइट टू प्रोस्टेट’ की बात करते हुए कहा कि  आप लोग शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं. लेकिन यह ध्यान रहे दूसरे के अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए.

और पढ़ें: जानें लॉकडाउन से लेकर स्वास्थ्य संबंधी समस्या तक साल 2020 महिलाओं के लिए कैसा रहा

ठंड भी किसानों को हौसले के कम नहीं कर पा रही

कड़ाके की ठंड में जब हम घर से बाहर नहीं निकल पा रहे है किसान अपने संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए डटे हुए हैं. रिपोर्टिंग के दौरान कुलदीप भोला नाम के एक शख्स ने बताया कि ठंड बहुत ज्यादा है. हमारे घर में गिजर लगा हुआ है. किसी भी काम के लिए गर्म पानी है. लेकिन यहां तो हमलोग  खुले में ठंड पानी से नहा रहे हैं. लेकिन हम फिर भी खुश हैं क्योंकि हमें यह लड़ाई जीतनी है. हमलोग इस कानून को वापस कराने आएं है और वापस कराकर ही वापस जाएंगे.

स्लोगन बने विरोध का सहारा

इतिहास गवाह रहा है आंदोलन कितना भी बड़ा हो उसमें स्लोगन का अहम रोल रहा है. इस आंदोलन में भी विरोध के तौर पर तरह-तरह के स्लोगन लिखे जा रहे हैं. दीवारों पर भगत सिंह के नारों को लिखा गया है. बुढ़े जवान हर कोई भगत सिंह वाली लड़ाई को जीतने के लिए यह डटा हुआ है.  ज्यादातर स्लोगन पंजाबी में लिख हुए हैं. जिसे लोग लेकर घूम रहे हैं. इनमें से कुछ स्लोगन को बताते हैं.

प्रदर्शन स्थल पर गुरु ग्रंथ साहिब जी को रखा गया है. जहां अरदाश की जा रही है. इस के सामने हमें तीन कुछ महिलाएं दिखी जिन्हें अपने हाथ में एक क्लिप बोर्ड थाम रखा था. जिसमें लिखा था. ‘पगड़ी संभाल जट्टा, एक लहर पहले भी उठी थी, हम सबने मिलकर सरकार को झुका दिया था, जबकि सरकार वो भी टेढ़ी थी. एक महीने तक चला दुनिया का सबसे बडा किसान आंदोलन”.

शाहीन बाग के बाद किसान आंदोलन  में भी महिलाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया है. किसान आंदोलन में महिलाएं लंगर की सेवा देने से लेकर टैक्टर, जीप चलाने तक हर कदम पर अव्वल हैं. महिलाओं ने भी पूरा मोर्च संभाला है. रिपोर्टिंग के दौरान हमने देखा कि महिलाएं मीडिया को बाईट दे  रही है. चंडीगड से आई सीरीन अंग्रेजी में लिखा हुई क्लिप बोर्ड लेकर खड़ी थी. वह बता रही थी हम डायरेक्ट खेती से जुड़े नहीं है लेकिन हमें पता है कि यह हमारे किसान भाईयों के लिए यह कानून बहुत ही ज्यादा घातक है. सीरीन के क्लिप बोर्ड पर किसानों की आत्महत्या का भी जिक्र है.

रिपोर्टिंग का करवा जैसे-जैसे आगे  बढ़ा तरह-तरह के क्लिप बोर्ड देखने के मिलें. जिनमें ज्यादातर पंजाबी और अंग्रेजी में स्लोगन लिखा हुए थे. एक ग्रुप में कुछ लोग अलग-अलग स्लोगन लेकर खड़े थे. एक बोर्ड पर नौकरी गंवाने वाले लोगों के लिए एक अपील थी. जिसमें साफ लिखा जितने लोगों ने अपनी नौकरी गंवाई है. दिल्ली बॉर्डर पर उनके लिए लंगर की व्यवस्था की गई है. वहीं दूसरी ओर जियो और रिलाइंस को बॉयकॉट करने की बात लिखी गई है. गौरतलब है कि जब से किसान आंदोलन हो रहा है जियो की सिम को लेकर लगातार बॉयकॉट करने की बात कही जा रही है.

लोग बॉयकॉट की बात पर ही नही रुके ब्लकि यहां तो लोगों ने अपने क्लिप बोर्ड पर सीजन सेल के जैसे सेल-सेल का भी नारा लिखा है. एक शख्स में अपने हाथ में जो किल्प बोर्ड पकड़ा था जिसमें लिखा था ‘भारत में सेल लगी है. अब तक 23 पीसीयू बिक चुके हैं. अगर आप भी कुछ लेना चाहते हैं तो इनसे संपर्क करें’ और नीचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की फोटो लगी थी.

यही से आगे युवाओं का एक जत्था मुख्य स्टेज की तरफ बढ़ते हुए विरोध में यह लिख रहा है कि “प्रधानमंत्री एक प्रधानसेवक की तरह कार्य करें न कि किसी सम्राट की तरह’.

विरोध का तरीका सिर्फ स्लोगन तक ही नहीं रुका है. यहां तो क्रांतिकारी कविताएं वाले क्लिप बोर्ड लिए लोग घूम रहे थे. कविता पंजाबी में है. जिसका हिंदी अनुवाद इस प्रकार है..

मांस के टुकड़े के लिए कुत्ता जैसे पूंछ मारता हुआ घुमता है

ठीक वैसे ही गोदी मीडिया सरकार की रखैल बनी हुई है

खाने के लाले हैं, हमारी जमीन छीनी जा रही है.

सड़कों पर किसानों और मजदूरों का डेरा है

और भारत का राजा अंधा और बहिरा है.

लेखक- राज काकरे

विश्व के सबसे बड़े विरोध में किसान बड़ी हिम्मत के साथ कड़ाके की ठंड में डटे हुए हैं. इससे पहले रविवार को आंदोलन के दौरान शहीद हुए लोगों को श्रद्धांजलि दी गई है. इस आंदोलन को लगभग एक महीना होने वाला है. अब देखना है कि इस मुद्दे पर सरकार कब नरम पड़ती है.

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काम की बात करोना

जानें किसान आंदोलन को पूरी दुनिया से समर्थन क्यों मिल रहे है

सरकार को इसे वापस लेना होगा


नए कृषि कानून को लेकर लगातार आंदोलन जारी है. 26 नवंबर से शुरु हुआ आंदोलन लगातार जारी है. सरकार और किसान संगठन के बीच हुई बातचीत भी अभी तक बेनतीजा रही है. इस बीच विदेशों में भी किसान आंदोलन को समर्थन मिलना शुरू हो गया है.  आज काम की बात में हम इसपर ही बात करेंगे.

अहम बिंदु

– सितंबर से विरोध शुरु हुआ
– लगातार किसान दिल्ली बॉर्डर पर डटे हैं
– पूरी दुनिया से आ रहा है समर्थन

सितंबर महीने में सरकार द्वारा लाएं गए कृषि बिल का पहले दिन से ही विरोध होना शुरू हो गया था. देश के अलग-अलग हिस्सों में दो महीने तक किसान संगठनों द्वारा विरोध किया गया. लेकिन सरकार की तरफ से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई. सरकार की बेरुखी को देखते हुए किसानों ने दिल्ली आने का फैसला किया. 26 नवंबर को किसानों ने दिल्ली की तरफ प्रस्थान किया. किसानों को रोकने के लिए सरकार ने एड़ी चोटी का जोर लगाया. लेकिन सफल नहीं हो पाई. आज किसानों के आंदोलन को 13 दिन हो चुके हैं. अभी तक कोई समाधान नहीं निकल पाया है. इस बीच विदेशों में भी किसान आंदोलन को समर्थन मिलने लग गया है.

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सबसे पहले कनाडा ने अपना समर्थन दिया

नवंबर के आखिरी सप्ताह में शुरू हुआ आंदोलन को सबसे पहला समर्थन कनाडा की तरफ से मिला. एक सप्ताह पहले कनाडा के पीएम जस्टिन और रक्षा मंत्री हरजीत सज्जन ने इस कानून का विरोध करते हुए कहा था कि किसानों को शांतिपूर्ण आंदोलन करने का अधिकार है. इस बयान पर विदेश मंत्रालय समेत कई राजनीतिक पार्टियों ने इसका विरोध किया. लगातार बढ़ विरोध के बीच हमने किसान संगठन के लोगों के बात की.ऑल इंडिया किसान सभा के वाईस प्रेसिडेंट सूरत सिंह धर्मकोट का कहना है कि हम सिंघु बॉर्डर पर बैठकर  इस काले कानून को रद्द करवाना चाहते हैं. सरकार इस कानून का पोस्टमॉर्टम न करें. सरकार कह रही है कि तीन कानूनों का नाम न बदला जाए. लेकिन उसके अंदर के प्रावधानों में बदलाव कर देते हैं. हमें पता है इससे कोई लाभ नहीं होगा. हम इसे पूरी तरह रद्द कराना चाहते हैं.

दुनिया के अलग अलग हिस्सों में हो रहे विरोध प्रदर्शन के बारे में  बात करते हुए सूरत सिंह कहते है कि जो व्यक्ति धरती माता से प्यार करता है और यह जनता है कि इसमें से अन्न प्राप्त होता है वो सभी जन दुनिया के कोने-कोने से इस आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं. मोदी सरकार को इसे रद्द करना चाहिए. लेकिन सरकार अभी भी डिप्लोमेसी की बात कर रही है. उन्हें भी पता है इसमें दोष है. अब यह लड़ाई कॉरपोरेट बनाम मजदूर हो गई है. इसे सरकार को रद्द करना पड़ेगा.

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पूरी दुनिया में पंजाबी है

कनाडा के बाद विश्व के अन्य देशों में जहाँ पंजाबी ज्यादा रहते हैं. वहाँ लगातार प्रदर्शन हो रहा है.  पिछले सप्ताह इंग्लैंड में भारतीय उच्च्योग के बाहर लोगों ने जमकर प्रदर्शन किया. कई लोगों को इसके बाद हिरासत में भी लिया गया. अमेरिका में भी कुछ ऐसा ही हाल है. किसानों के समर्थन में अब आते देशों के बारे में हमने सिंघु बॉर्डर पर बैठे ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के जनरल सेक्रेटरी विक्की माहेश्वरी से बात की. उन्होंने बताया कि कृषि हर चीज़ का आधार है. इस कारण यह मुद्दा पूरी दुनिया में फैला है. पंजाब के लोग पूरी दुनिया के हर कोने में बसे है. जिसके कारण यह फैल रहा है. हमारे देश का आर्थिक आधार है. अगर इस पर कोई आंच आएगी तो किसान सड़कों पर आएंगे. यह कानून पूरी तरह से देश को बर्बाद कर देगा. कल जब अडानी और अम्बानी पंजाब या अन्य जगहों पर खेती करने जाएंगे तो किसानों गेहूं उगाने के लिए क्यों कहेंगे. वो अपने फायदे के लिए ही कृषि कराएंगे. यह हम किसानों के लिए युद्ध की तरह है. जिसे हमें जितना है.

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आठवें दिन किसान संगठन और सरकार के बीच की बातचीत रही बेनतीजा

आज कैप्टन अमरिंदर सिंह से मिले अमित शाह


किसान आंदोलन के आठवें दिन भी कोई समाधान नहीं निकला पाया है. आज लगभग साढ़े सात घंटे तक किसान संगठनों और सरकार के बीच चली बैठक बेनतीजा रही. अगली बैठक 5 दिसंबर को होगी.

आज हुई बैठक से पहले किसान आंदोलन की बैठक के दौरान हुए लंच में किसानों ने सरकार के खाने को मनाकर दिया. ब्रेक के दौरान सिंघु बॉर्डर से आये खाने को किसानों ने खाया. किसानों के बने लंगर से ही विज्ञान भवन में खाना लाया गया था. खाना सफेद रंग की एम्बुलेंस में लाया गया था.

सरकार के साथ हो रही बैठक में कविता तालुकदार अकेली महिला बैठक का हिस्सा बनी. कविता एक समाज सेविका भी है. बैठक के दौरान कविता ने अपने सवालों से कृषि मंत्रालय के पदाधिकारियों के पसीने छुड़ा दिए.

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आज दोपहर 12 बजे शुरु हुई बैठक में एक बार फिर एमएसपी की बात को रखा. संयुक्त किसान मोर्चा की ओर से 10 पन्नों का एक खाखा सरकार को सौंपा गया.  इस खाखे में पांच मुख्य बातें कही गई थी. जिसमें शामिल है एपीएमसी एक्ट 17 पॉइंट पर असहमति, एसेंशियल कमोडिटी एक्ट 8, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग  एक्ट 12 पॉइंट पर असहमति जताई है.

किसान आंदोलन के 8वें दिन दिन आज पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह गृहमंत्री अमित शाह से मिले. बैठक के बाद उन्होंने कहा यह सरकार और किसानों के बीच का मामला है मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता. मैं चाहता हूं जल्द से जल्द इसमें कोई समाधान निकाला जाए.

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सरकार और कृषि संगठन के बीच बातचीर रही बेनतीजा अब तीन दिसंबर को फिर होगी बैठक

छठे दिन बॉर्डर  पर डटे हुए हैं किसान


नए कृषि कानून को लेकर लगातार चल रहे आंदोलन के बीच आज छठे दिन किसानों को सरकार से बात करने का मौका दिया गया. किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच विज्ञान भवन में लगभग चार घंटे तक बैठक चली. लेकिन चार घंटे बाद भी यह बैठक बेनतीजा रही. अब अगली बैठक तीन दिसंबर  को होगी. इससे पहले सरकार ने बैठक के दौरान MSP और APMC ACT  पर प्रेजेंटेशन दिया गया. जिसमें किसानों को MSP के बारे में समझाने की कोशिश की गई .

किसानों का ऐलान आंदोलन जारी रहेगा

इससे पहले बैठक के दौरान किसानों का कहना था कि उन्हें किसान समिति पर कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन जबतक कोई समिति किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचीत और कोई ठोस बात निकालकर नहीं आती वह आंदोलन जारी रखेगें. इस बीच सरकार ने यह भी प्रस्ताव  दिया है कि समिति रोजाना बैठकर चर्चा करने  को तैयार है, ताकि कोई नतीजा निकल सकें. किसान संगठन के प्रतिनिधि का कहना है कि सरकार ऐसा कानून लाई है जिससे हमारी जमीनें बड़े कॉरपोरेट ले लेंगे. हम अपनी जमीन कॉरपोरेट को देने को तैयार नहीं हैं.

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खिलाड़ी भी आएं समर्थन में…

लगातार बढ़ते आंदोलन के बीच किसानों के समर्थन में अब कई खिलाड़ी भी आ गए हैं. इन खिलाड़ियों ने अवॉर्ड वापसी की बात कही है. इनमें करतार सिहं, बॉस्केट बॉल खिलाड़ी सज्जन सिंह चीमा, हॉकी खिलाड़ी राजबीर कौर हैं. इससे पहले कई कलाकार भी किसानों के समर्थन में आगे आएं हैं. इसी बीच हरियाणा के विधायकों ने भी किसानों को समर्थन देने का मन बना लिया है. हरियाणा के निर्दलीय विधायक सोमबीर सांगवान ने प्रदेश सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है. विधायक का कहना है कि किसानों के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया है उसको देखे हुए  मैं सरकार से अपना समर्थन वापस लेता हूं.

आपको बता दें किसान आंदोलन का आज छठां दिन हैं. इस बीच दिल्ली के तीन बॉर्डर पर किसान डटे हुए हैं. इसी बीच भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद ने भी मंगलवार को किसान आंदोलन में हिस्सा लिया. चंद्रशेखर गाजीपुर के बॉर्डर पर बैठे किसानों को अपना समर्थन दे रहे थे.

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दिल्ली पुलिस ने किसानों को आने की दी अनुमति, दिल्ली सरकार ने अस्थाई जेल की अनुमति को ठुकराया

तीन दिसंबर को दोबारा किसानों के साथ होगी बैठक


 

नए कृषि कानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों को आज दिल्ली आने की अनुमति दे दी गई है.  दो दिन से चल रहे प्रदर्शन के बीच आज दोपहर दिल्ली पुलिस ने किसानों को बुराड़ी के निरंकारी ग्रांउड में प्रदर्शन करने की इजाजत दे दी है. लेकिन इस आददेश में यह साफ कर दिया गया है कि इस दौरान किसान दिल्ली के किसी और हिस्से में नहीं जा सकते हैं. अगर जाते हैं तो पुलिस उनके साथ रहेगी.

 

दिल्ली सरकार ने अस्थाई जेल की मांग को ठुकराया.

 

आज की अनुमति से पहले हजारों की संख्या में किसान दिल्ली में घुसने की कोशिश कर रहे थे. जिसके कारण सिंधु बॉर्डर पुलिस और किसानों के बीच झड़प हुई. किसानों ने पुलिस पर पथराव किया. जिसके जवाब में पुलिस ने आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया. किसान लगातार दिल्ली जाने की मांग करते हुए कह रहे थे कि उनके साथ 5 लाख किसान है और वह बिना दिल्ली गए वापस नहीं जाएंगे. कोई भी शख्स  उन्हें उनको लक्ष्य से हटा नहीं सकता है. आपको बता दें निरंकारी ग्रांउड की अनुमति से पहले किसान जंतर-मंतर या रामलीला की मांग कर रहे थे. किसानों बढ़ते प्रदर्शन के बीच दिल्ली पुलिस ने किसानों के लिए अस्थाई जेल बनाने की मांग की थी. जिसे दिल्ली सरकार ने ठुकरा दिया. कल किसानों को कोरोना के देखते हुए दिल्ली में प्रवेश के लिए रोका जा रहा था.  

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पहले दिन भी किसानों को रोकने की कोशिश की गई थी 

कल किसान पंजाब से हरियाणा होते हुए दिल्ली के लिए कूच कर रहे  थे. उन्हें रोकने के लिए हरियाणा पुलिस ने रास्ते में बैरिकेटस लगाए. सड़क पर बड़े-बड़े पत्थर रखेंतारों से रास्ते के ब्लॉक कर दिया.  पुलिस की ऐसा रवैया देखते हए  किसानों ने पुलिस पर पत्थारबाजी की. उन्हें रोकने के लिए पुलिस ने वाटर कैनन से पानी की बौछर की  जिद पर अड़ें किसानों को रोकने के लिए कल भी  दिल्ली बॉर्डर पर आंसू गैस भी छोड़े गए थे. बढ़ते तनाव के बीच कल दिल्ली एनसीआर में मेट्रो को भी बंद कर दिया गया था.   कुरुक्षेत्र हाइवे पर किसान फायर बिग्रेड और वाटर कैनन की गाड़ियों पर चढ़े गए थे. बिल लागू होने के बाद से ही किसानों के साथ खड़े योगेंद्र यादव को हरियाणा पुलिस ने कुछ किसानों के साथ गुरुग्राम में हिरासत में ले लिया था. आज भी किसान सुबह से ही एंट्री को लेकर अडे हुए थे.

 

कृषि मंत्री का बयान–     

कल कृषि मंत्री ने बयान देते हुए कहा है कि किसान संगठनों को तीन दिसंबर को फिर से बातचीत के लिए बुलाया गया है. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार देश भर के किसानों के हित में काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैकिसानों की आय दोगुनी करने लिए सरकार प्रतिबद्ध है. इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि नए कानून भी किसानों के हित में हैं.

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