Surya Grahan 2026: सूर्य ग्रहण 2026 में अर्घ्य देना चाहिए या नहीं? पंडित जी से पूछें
Surya Grahan 2026, हिंदू धर्म में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है। प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य देना स्वास्थ्य, ऊर्जा और सकारात्मकता से जुड़ा हुआ माना जाता है। वहीं, जब सूर्य ग्रहण पड़ता है, तो यह एक विशेष खगोलीय
Surya Grahan 2026 : सूर्य ग्रहण और पूजा नियम, 2026 में ग्रहण के दौरान अर्घ्य देने को लेकर क्या कहते हैं शास्त्र
Surya Grahan 2026, हिंदू धर्म में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है। प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य देना स्वास्थ्य, ऊर्जा और सकारात्मकता से जुड़ा हुआ माना जाता है। वहीं, जब सूर्य ग्रहण पड़ता है, तो यह एक विशेष खगोलीय और धार्मिक घटना मानी जाती है। सूर्य ग्रहण के समय सूर्य और चंद्रमा की स्थिति में बदलाव होता है, जिसका प्रभाव पृथ्वी पर पड़ता है। इसी कारण ग्रहण काल को सामान्य समय से अलग और संवेदनशील माना जाता है।
सूर्य ग्रहण के दौरान क्यों बदल जाते हैं पूजा के नियम?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण काल में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। इसी वजह से मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और कई शुभ कार्यों पर रोक लगाई जाती है। शास्त्रों में ग्रहण के समय भोजन पकाने, खाने और सामान्य पूजा-पाठ से परहेज करने की सलाह दी गई है। यही कारण है कि सूर्य ग्रहण के दौरान सूर्य को अर्घ्य देने को लेकर भी लोगों के मन में भ्रम रहता है।
सूर्य ग्रहण में अर्घ्य देना शुभ है या अशुभ?
पंडितों और ज्योतिषाचार्यों के अनुसार सूर्य ग्रहण के दौरान सूर्य को अर्घ्य देना उचित नहीं माना जाता। ग्रहण काल में सूर्य ढका हुआ होता है और उसकी किरणें शुद्ध नहीं मानी जातीं। ऐसे समय में सूर्य को जल अर्पित करना शास्त्रसम्मत नहीं है। मान्यता है कि ग्रहण के दौरान की गई पूजा का फल नहीं मिलता, बल्कि इसका उल्टा प्रभाव भी पड़ सकता है।
शास्त्रों में क्या लिखा है?
धर्मग्रंथों के अनुसार ग्रहण काल को राहु-केतु का प्रभाव काल माना जाता है। इस समय देवताओं की बजाय असुरी शक्तियां अधिक सक्रिय मानी जाती हैं। इसी वजह से ग्रहण के दौरान न तो सूर्य की सीधी पूजा की जाती है और न ही उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। शास्त्रों में साफ लिखा है कि ग्रहण समाप्त होने के बाद ही सूर्य की उपासना करना फलदायी होता है।
तो फिर ग्रहण काल में क्या करें?
हालांकि सूर्य ग्रहण के दौरान सामान्य पूजा निषिद्ध होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह समय पूरी तरह व्यर्थ है। पंडित जी के अनुसार ग्रहण काल जप, तप और साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दौरान मन ही मन मंत्र जाप करना, भगवान का स्मरण करना और ध्यान करना विशेष फल देता है।
सूर्य ग्रहण में कौन से मंत्रों का जाप करें?
ग्रहण काल में मौन रहकर मंत्र जाप करने की परंपरा है। इस समय
- “ॐ नमः शिवाय”
- “ॐ सूर्याय नमः” (मन ही मन)
- गायत्री मंत्र
का जाप करना शुभ माना जाता है। ध्यान रहे कि मंत्रों का उच्चारण जोर से न करें, बल्कि मन में ही जप करें।
ग्रहण समाप्त होने के बाद अर्घ्य का सही तरीका
पंडित जी के अनुसार सूर्य ग्रहण समाप्त होने के बाद सूर्य को अर्घ्य देना बेहद शुभ माना जाता है। ग्रहण खत्म होते ही स्नान कर शरीर और मन को शुद्ध करें। इसके बाद तांबे के लोटे में स्वच्छ जल, लाल फूल और थोड़ा सा रोली डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें। इस समय “ॐ सूर्याय नमः” मंत्र का जाप करना विशेष फल प्रदान करता है।
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सूर्य ग्रहण के बाद दान का महत्व
ग्रहण के बाद दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि ग्रहण काल के बाद किया गया दान कई गुना फल देता है। जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, गुड़, तिल या दक्षिणा दान करना शुभ माना जाता है। इससे ग्रहण के नकारात्मक प्रभाव समाप्त होते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
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सूर्य ग्रहण 2026 में किन बातों का रखें ध्यान
सूर्य ग्रहण 2026 के दौरान कुछ सावधानियां रखना जरूरी माना गया है।
- ग्रहण काल में भोजन न करें
- गर्भवती महिलाएं विशेष सावधानी बरतें
- पूजा सामग्री को स्पर्श न करें
- ग्रहण के बाद पूरे घर की सफाई करें
- स्नान के बाद ही पूजा-पाठ करें
वैज्ञानिक और धार्मिक दृष्टिकोण का संतुलन
वैज्ञानिक रूप से सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से इसका प्रभाव मानसिक और आध्यात्मिक माना जाता है। पंडितों का मानना है कि परंपराओं का पालन करने से मन में अनुशासन और सकारात्मकता बनी रहती है। इसलिए सूर्य ग्रहण के दौरान नियमों का पालन करना बेहतर माना जाता है। Surya Grahan 2026 के दौरान सूर्य को अर्घ्य देना शास्त्रों के अनुसार उचित नहीं माना जाता। ग्रहण काल में पूजा की बजाय मंत्र जाप, ध्यान और आत्मचिंतन करना श्रेष्ठ होता है। ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य देना और दान-पुण्य करना अत्यंत शुभ फल प्रदान करता है। पंडित जी की मानें तो ग्रहण को डर का नहीं, बल्कि संयम और साधना का समय समझना चाहिए।
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