Supreme Court Guidelines: ‘चरित्र’ और ‘लज्जा’ जैसी टिप्पणियों से बचें, रेप मामलों पर सुप्रीम कोर्ट के अहम निर्देश
Supreme Court Guidelines, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने रेप और यौन हिंसा से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान इस्तेमाल होने वाली भाषा को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि न्यायपालिका, वकीलों, पुलिस और जांच एजेंसियों को ऐसे मामलों में पीड़िता के लिए अपमानजनक, रूढ़िवादी या संवेदनहीन शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
Supreme Court Guidelines : रेप मामलों में संवेदनशील भाषा अपनाने का निर्देश, सुप्रीम कोर्ट ने जारी की नई गाइडलाइन
Supreme Court Guidelines, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने रेप और यौन हिंसा से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान इस्तेमाल होने वाली भाषा को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि न्यायपालिका, वकीलों, पुलिस और जांच एजेंसियों को ऐसे मामलों में पीड़िता के लिए अपमानजनक, रूढ़िवादी या संवेदनहीन शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अदालत ने विशेष रूप से ‘लज्जा भंग’, ‘बेबस महिला’, ‘चरित्रहीन’, ‘आदतन’, ‘उकसाने वाली’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल से बचने पर जोर दिया है।सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य पीड़ित को सम्मान देना और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना है, न कि ऐसी भाषा का प्रयोग करना जिससे उसकी गरिमा को ठेस पहुंचे। अदालत ने कहा कि भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती, बल्कि यह समाज की सोच और न्याय व्यवस्था के दृष्टिकोण को भी दर्शाती है।

क्यों जरूरी पड़ी नई गाइडलाइंस?
देश में लंबे समय से यह चिंता जताई जाती रही है कि रेप मामलों की सुनवाई के दौरान कई बार अदालतों के आदेशों, पुलिस रिपोर्टों और कानूनी दस्तावेजों में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल होता है जो पीड़िता को दोषी ठहराने या उसके सम्मान को कम करने वाले प्रतीत होते हैं।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन अपराध किसी महिला की “इज्जत” या “लज्जा” का नहीं, बल्कि उसके शारीरिक स्वायत्तता, गरिमा और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। इसलिए न्यायिक भाषा भी इसी संवैधानिक सोच के अनुरूप होनी चाहिए।
किन शब्दों से बचने की सलाह?
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि न्यायिक और कानूनी दस्तावेजों में निम्न प्रकार के शब्दों और अभिव्यक्तियों से बचा जाए—
- “लज्जा भंग”
- “बेबस महिला”
- “चरित्रहीन”
- “आदतन यौन संबंध बनाने वाली”
- “उकसाने वाली”
- “सहमति का अनुमान लगाने वाले” शब्द
- पीड़िता के पहनावे, व्यवहार या निजी जीवन पर अनावश्यक टिप्पणी
अदालत ने कहा कि ऐसे शब्द न्यायिक निष्पक्षता को प्रभावित कर सकते हैं और समाज में गलत संदेश भेजते हैं।
पीड़िता को सम्मानजनक भाषा में संबोधित करने पर जोर
गाइडलाइंस के अनुसार, अदालतों को “पीड़िता” या “सर्वाइवर” जैसे सम्मानजनक शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए। किसी महिला के साथ हुई यौन हिंसा को उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि यौन अपराध का केंद्र बिंदु सहमति (Consent) और अपराधी का कृत्य है, न कि महिला का चरित्र या सामाजिक स्थिति।
न्यायाधीशों और वकीलों के लिए भी निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—
- जिरह के दौरान अपमानजनक प्रश्नों से बचा जाए।
- पीड़िता के निजी जीवन को अनावश्यक रूप से चर्चा का विषय न बनाया जाए।
- अदालत की टिप्पणियों में लैंगिक पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए।
- निर्णय लिखते समय संवेदनशील और सम्मानजनक भाषा अपनाई जाए।
- न्यायिक अधिकारियों को समय-समय पर लैंगिक संवेदनशीलता का प्रशिक्षण दिया जाए।
पुलिस और जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी
नई गाइडलाइंस केवल अदालतों तक सीमित नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस और जांच एजेंसियों को भी निर्देश दिया कि एफआईआर, केस डायरी और चार्जशीट तैयार करते समय ऐसी भाषा का उपयोग न करें जिससे पीड़िता का अपमान हो।साथ ही, जांच के दौरान पीड़िता की पहचान और निजता की रक्षा करना कानूनन अनिवार्य है।
संवैधानिक मूल्यों पर जोर
अदालत ने कहा कि भारतीय संविधान प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है। यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया भी इसी सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिए। किसी भी महिला को उसके चरित्र, कपड़ों या जीवनशैली के आधार पर नहीं आंका जा सकता।सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि सहमति का अर्थ स्पष्ट, स्वतंत्र और स्वैच्छिक सहमति है। केवल प्रतिरोध न करने का अर्थ सहमति नहीं माना जा सकता।
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समाज पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि इन दिशा-निर्देशों से न्यायिक प्रक्रिया अधिक संवेदनशील बनेगी। इससे पीड़िताओं का न्याय व्यवस्था पर विश्वास बढ़ेगा और अदालतों में लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा।महिला अधिकार संगठनों ने भी इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि भाषा बदलने से सोच बदलने की दिशा में सकारात्मक शुरुआत होती है।सुप्रीम कोर्ट की यह पहल केवल शब्दों को बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायिक व्यवस्था में संवेदनशीलता, समानता और गरिमा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अब अदालतों, पुलिस, वकीलों और जांच एजेंसियों से अपेक्षा की जाएगी कि वे यौन अपराधों से जुड़े मामलों में ऐसी भाषा का प्रयोग करें जो पीड़िता का सम्मान बनाए रखे और न्याय की संवैधानिक भावना को मजबूत करे। इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि न्यायिक प्रक्रिया किसी भी पीड़िता के लिए दोबारा मानसिक उत्पीड़न का कारण न बने, बल्कि उसे सम्मान और निष्पक्ष न्याय का भरोसा दे।
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