Savitribai Phule death anniversary 2026: भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले की प्रेरक विरासत
Savitribai Phule death anniversary 2026, भारत के सामाजिक इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने सदियों की कुरीतियों को चुनौती देकर नई दिशा दी। ऐसी ही महान समाज सुधारिका थीं सावित्रीबाई फुले।
Savitribai Phule death anniversary 2026 : सावित्रीबाई फुले, रूढ़ियों को तोड़कर नारी शिक्षा का मार्ग बनाने वाली वीरांगना
Savitribai Phule death anniversary 2026, भारत के सामाजिक इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने सदियों की कुरीतियों को चुनौती देकर नई दिशा दी। ऐसी ही महान समाज सुधारिका थीं सावित्रीबाई फुले। वे भारत की पहली महिला शिक्षिका, नारी शिक्षा की अग्रदूत और दलित-वंचित वर्गों के अधिकारों की सशक्त आवाज थीं। 10 मार्च 1897 को उनके निधन के कारण हर वर्ष उनकी पुण्यतिथि समाज सुधार और शिक्षा के प्रति उनके अद्वितीय योगदान को स्मरण करने का अवसर देती है। 2026 में उनकी पुण्यतिथि हमें उनके संघर्ष और आदर्शों को पुनः याद करने का अवसर प्रदान करती है।
प्रारंभिक जीवन और विवाह
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में एक किसान परिवार में हुआ। उस समय भारत में महिलाओं की शिक्षा को महत्व नहीं दिया जाता था। बाल विवाह प्रचलित था और लड़कियों को पढ़ाना समाज के विरुद्ध माना जाता था। कम आयु में उनका विवाह समाज सुधारक ज्योतिराव फुले से हुआ। विवाह के बाद ज्योतिराव ने सावित्रीबाई को पढ़ना-लिखना सिखाया। शिक्षा प्राप्त करने के बाद सावित्रीबाई ने स्वयं को समाज सेवा और शिक्षा के कार्यों के लिए समर्पित कर दिया।
भारत की पहली महिला शिक्षिका
1848 में सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले ने पुणे में लड़कियों के लिए पहला आधुनिक विद्यालय खोला। उस समय यह कदम अत्यंत क्रांतिकारी था। समाज के रूढ़िवादी वर्गों ने इसका तीव्र विरोध किया।जब सावित्रीबाई पढ़ाने के लिए स्कूल जाती थीं, तो लोगों द्वारा उन पर पत्थर, कीचड़ और गोबर फेंका जाता था। लेकिन वे अतिरिक्त साड़ी लेकर चलती थीं और स्कूल पहुंचकर कपड़े बदलकर पढ़ाना जारी रखती थीं।उनका विश्वास था कि शिक्षा ही समाज परिवर्तन का सबसे बड़ा साधन है। उन्होंने न केवल लड़कियों को पढ़ाया, बल्कि दलित और पिछड़े वर्ग के बच्चों को भी शिक्षा का अधिकार दिलाया।
सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष
सावित्रीबाई फुले ने केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि समाज की कई कुरीतियों के खिलाफ भी आवाज उठाई। उस समय विधवाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी और बाल हत्या जैसी घटनाएं होती थीं। उन्होंने 1853 में विधवाओं और परित्यक्त महिलाओं के लिए “बालहत्या प्रतिबंधक गृह” की स्थापना की। यहां अनचाहे गर्भ से जन्मे बच्चों को संरक्षण दिया जाता था। उन्होंने बाल विवाह, जाति भेदभाव और स्त्री उत्पीड़न के विरुद्ध निरंतर संघर्ष किया। उनके कार्यों ने समाज सुधार की नई धारा को जन्म दिया।
साहित्यिक योगदान
सावित्रीबाई फुले एक संवेदनशील कवयित्री भी थीं। उनकी कविताओं में शिक्षा, समानता और आत्मसम्मान का संदेश मिलता है।उनकी प्रमुख कृतियों में काव्य फुले (1854) और बावन काशी सुबोध रत्नाकर शामिल हैं। उनकी रचनाएं उस समय के सामाजिक अन्याय के विरुद्ध चेतना जगाने का माध्यम बनीं। उनकी कविताएं आज भी महिलाओं और वंचित वर्गों के आत्मविश्वास को बढ़ाने वाली प्रेरणादायक धरोहर मानी जाती हैं।
सत्यशोधक आंदोलन में भूमिका
ज्योतिराव फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज का उद्देश्य जाति-भेद और सामाजिक असमानता को समाप्त करना था। सावित्रीबाई इस आंदोलन की सक्रिय सहयोगी थीं। उन्होंने महिलाओं को संगठित किया और सामाजिक न्याय के विचारों का प्रसार किया। वे समाज सुधार के कार्यों में अपने पति की सच्ची सहयात्री थीं। ज्योतिराव फुले के निधन (1890) के बाद सावित्रीबाई ने सत्यशोधक समाज का नेतृत्व भी संभाला और उनके अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाया।
सेवा और त्याग का अद्वितीय उदाहरण
1897 में पुणे में प्लेग महामारी फैल गई। सावित्रीबाई ने रोगियों की सेवा के लिए अपना जीवन जोखिम में डाल दिया। वे संक्रमित लोगों को अस्पताल पहुंचाने और उनकी देखभाल में जुटीं।इसी सेवा कार्य के दौरान उन्हें भी संक्रमण हो गया और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। इस प्रकार उन्होंने मानव सेवा करते हुए अपने जीवन का बलिदान दिया। उनका जीवन सच्चे अर्थों में सेवा, करुणा और त्याग का प्रतीक है।
पुण्यतिथि का महत्व
सावित्रीबाई फुले की पुण्यतिथि हमें याद दिलाती है कि शिक्षा और समानता के अधिकार के लिए कितने संघर्ष किए गए। आज भारत में महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों की जो स्थिति है, उसमें उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। 2026 में उनकी पुण्यतिथि पर देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है और नारी शिक्षा तथा सामाजिक न्याय के प्रति उनके संदेश को दोहराया जाता है।
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आधुनिक समाज के लिए प्रेरणा
सावित्रीबाई फुले का जीवन आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने दिखाया कि समाज की रूढ़ियों को तोड़कर परिवर्तन संभव है।
उनसे हमें सीख मिलती है—
- शिक्षा ही सशक्तिकरण का सबसे बड़ा साधन है
- समानता और मानवाधिकार के लिए संघर्ष आवश्यक है
- सामाजिक सुधार के लिए साहस और दृढ़ता चाहिए
आज के समय में जब लैंगिक समानता और शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है, सावित्रीबाई फुले का योगदान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। सावित्रीबाई फुले भारतीय समाज सुधार आंदोलन की अग्रदूत थीं। उन्होंने महिलाओं और वंचित वर्गों को शिक्षा और सम्मान का अधिकार दिलाने के लिए जीवन समर्पित किया। उनकी पुण्यतिथि 2026 केवल स्मरण का दिन नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपनाने का संकल्प लेने का अवसर है। भारत की नारी शिक्षा और सामाजिक न्याय की यात्रा में सावित्रीबाई फुले का नाम सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा। उनका संघर्ष और त्याग आने वाली पीढ़ियों को समानता, शिक्षा और मानवता के मार्ग पर प्रेरित करता रहेगा।
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