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भारत

भारत में मासिक चक्र के विषय में प्रचलित अन्धविश्वास

क्या मासिक चक्र जैसी मिथ्या का आज के ज़माने में होना उचित है?


भारत में मासिक चक्र को लेकर कई रुधिवादिताएँ आज भी प्रचलित हैं। आज इतना उन्नत होने के बावज़ूद भी हमारे देश के कई हिस्सों में ऐसे अनेकों अन्धविश्वास चल रहे  हैं जिनका विज्ञान में कोई तर्क अभी तक नहीं मिला है। यह एक हर मास होने वाली प्रक्रिया है जिसमे महिलाओं और लड़कियों में रक्त प्रसाव होता है।

भारत में इसे जितना गुप्त रखा जा सके उतना गुप्त रखा जाता है। इसे टैबू माना जाता है। यह सत्य है कि इस समय में थोड़ी मुश्किलें होती हैं पर हमारा समाज इसे अधिक मुश्किल बना देते हैं। इसमें लड़कियों पर कई पाबंदियाँ लगा दी जाती है। यह एक नेचुरल प्रोसेस है जिसका होना अनिवार्य है और इसके बारे में जो अन्धविश्वास है उससे लड़कियों की मानसिक स्थिति पर प्रभाव पड़ता है।

यह पता होने के बावज़ूद भी की यह एक साधारण और प्राकृतिक क्रिया है फिर भी लडकियों और महिलाओं पर कई पाबंदियाँ लगा दी जाती हैं इनमे से कुछ सही भी हैं किंतु कुछ बिलकुल आधारहीन हैं। क्या आपको नहीं लगता कि इन रुधिवादिताओं को खत्म करने का यही उचित समय है? अगर इन अंधविश्वासों को हमने अब भी अपने समाज में पनपने दिया तो ये बुरी तरह से माहौल को दूषित कर देंगी।

वैसे तो शहरों में इसमें ज़्यादा पाबन्दी नही होती बीएस यह रोक होती है कि मासिक चक्र के दौरान स्त्री पूजा के कमरे में प्रवेश नहीं कर सकती क्योंकि वह इस समय पवित्र नहीं होती। पूजा करने के लिए मनुष्य का पवित्र और स्वच्छ होना अनिवार्य है। और गाओं या थोड़े पिछड़े हुए इलाकों में प्रसाव के समय रसोई घर में नहीं घुसने दिया जाता। ऐसा चलन शहरों के कुछ घरों में भी होता है।

भारत में मासिक चक्र के विषय में प्रचलित अन्धविश्वास

विज्ञान में केवल इस तथ्य का तर्क है कि महिलाओं को इस समय में अचार या कोई और ऐसी वस्तु को क्यों नहीं स्पर्श करने दिया जाता। विज्ञान के अनुसार इस समय तन से कुछ ऐसी गन्ध निकलती है जिससे वे दूषित हो जाते हैं। पर ऐसा केवल पुराने समय में होता था जब स्वच्छता की इतनी सुविधाएँ नही थी। परंतु यदि महिलाएँ नैपकिन्स का इस्तेमाल करें और पूरी तरह स्वच्छ्ता रखें तो ऐसा नही होगा।

कई कई समुदायों में लड़कियों को इस दौरान पानी से दूर रखा जाता है। पानी को पवित्र माना जाता है और उन लोगों का यह मानना होता है की यदि इस प्रसाव के दौरान स्त्री पानी के स्पर्श में आती है तो पानी दूषित हो जाता है।

कई जगह ऐसी हैं जहाँ पर स्त्रियों को केवल एक कमरे में ही रखा जाता है और यहाँ बैठकर वे केवल ऐसे काम करती हैं जिसमे शारीरिक मेहनत कम से कम हो। ऐसा माना जाता है कि ऐसे समय में यदि शारीरिक कार्य अधिक किया जाये तो उस महिला का गर्भपात होने में मुश्किलें होती है।

कई जगह पर अधिकतर ऐसे इलाके जो बहुत अधिक पिछड़े हुए हैं उनमे महिला रक्त प्रसाव को सोखने के लिए राख, पत्ते, पुराने कपड़ो का प्रयोग करती हैं । और उन्हें यह सलाह दी जाती है कि वह उस कपडे का प्रयोग उसे साफ़ कर फिर से करें।

इन सभी से उन में इन्फेक्शन और कई बीमारियों हो जाती हैं। तो इस विषय पर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि अगर इन्हें ऐसे ही दबाता रहा जाये तो ये हमारे देश में महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए बहुत ज़्यादा हानिकारक होगा।

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