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FCRA Amendment Bill 2026: विदेशी फंडिंग कानून पर कांग्रेस का सरकार पर हमला, थरूर ने बताए बड़े खतरे

FCRA Amendment Bill 2026, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Amendment Bill) को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने दावा किया कि यदि यह विधेयक मौजूदा स्वरूप में पारित हो जाता है,

FCRA Amendment Bill 2026 : विदेशी फंडिंग कानून पर छिड़ी सियासी जंग, शशि थरूर बोले- भारतीयों को होगी परेशानी

FCRA Amendment Bill 2026, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Amendment Bill) को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने दावा किया कि यदि यह विधेयक मौजूदा स्वरूप में पारित हो जाता है, तो इसका असर केवल गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, शोध, सामाजिक कल्याण और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले लाखों भारतीय भी प्रभावित हो सकते हैं। थरूर का कहना है कि यह कानून पारदर्शिता बढ़ाने से अधिक सरकारी नियंत्रण बढ़ाने का प्रयास प्रतीत होता है।

क्या है पूरा मामला?

केंद्र सरकार संसद के मानसून सत्र में FCRA संशोधन विधेयक 2026 पेश करने की तैयारी में है। इस विधेयक का उद्देश्य विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए नियमों को और सख्त बनाना बताया जा रहा है।प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, निलंबित होता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो सरकार द्वारा नियुक्त एक “डिज़िग्नेटेड अथॉरिटी” उस संस्था के विदेशी फंड और उनसे बनाई गई संपत्तियों का नियंत्रण अपने हाथ में ले सकती है। सरकार का कहना है कि इससे विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।

शशि थरूर ने क्या कहा?

शशि थरूर ने एक लेख में इस विधेयक को “कार्यपालिका के केंद्रीकरण की खतरनाक दिशा” बताया। उनके अनुसार यह कानून सरकार और नागरिक समाज के बीच संबंधों को मूल रूप से बदल देगा।उन्होंने कहा कि सरकार स्वतंत्र संस्थाओं, मानवाधिकार संगठनों और थिंक टैंक को विकास साझेदार के बजाय संदेह की नजर से देख रही है। थरूर का आरोप है कि विदेशी फंडिंग पर अत्यधिक नियंत्रण लगाकर इन संस्थाओं की स्वतंत्रता सीमित की जा रही है।

“भारतीयों को होगी परेशानी”

थरूर का कहना है कि इस कानून का असर केवल NGO तक सीमित नहीं रहेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि देशभर में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, महिला सशक्तिकरण, आपदा राहत, आदिवासी क्षेत्रों के विकास और सामाजिक कल्याण से जुड़े अनेक संस्थान विदेशी सहायता पर निर्भर हैं।यदि इन संस्थाओं का संचालन प्रभावित होता है, तो इनकी सेवाओं का लाभ लेने वाले लाखों भारतीयों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों पर इसका असर अधिक पड़ने की आशंका जताई गई है।

सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार का कहना है कि FCRA का उद्देश्य विदेशी धन के दुरुपयोग को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी फंड का उपयोग केवल वैध और घोषित उद्देश्यों के लिए हो।सरकार का तर्क है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने के लिए नियमन आवश्यक है। हाल के संशोधनों में विदेशी दान के अंतिम स्रोत का खुलासा, प्रमुख पदाधिकारियों की अधिक जांच और धन के उपयोग पर कड़े नियम जैसे प्रावधान शामिल किए गए हैं।

पहले भी हो चुका है विवाद

FCRA कानून पहले भी कई बार विवादों में रहा है। 2020 में किए गए संशोधनों के बाद विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठनों पर प्रशासनिक खर्च की सीमा तय की गई थी और सब-ग्रांटिंग पर रोक लगाई गई थी।थरूर का कहना है कि पहले से लागू ये प्रावधान ही काफी सख्त हैं और नए संशोधन संस्थाओं के लिए और अधिक कठिन परिस्थितियां पैदा करेंगे।

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विपक्ष की मांग

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण विधेयक को जल्दबाजी में पारित नहीं किया जाना चाहिए। विपक्ष ने मांग की है कि इसे सिलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए ताकि सभी पक्षों की राय ली जा सके और संभावित प्रभावों का विस्तृत अध्ययन किया जा सके।

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आगे क्या?

अब सबकी नजर संसद के मानसून सत्र पर है, जहां इस विधेयक पर चर्चा होने की संभावना है। यदि सरकार इसे पारित कराने में सफल होती है, तो भारत में विदेशी फंड प्राप्त करने वाले हजारों संगठनों के संचालन के नियम बदल सकते हैं।वहीं, विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि कानून बनाते समय पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ नागरिक समाज की स्वतंत्रता और विकास कार्यों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।

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