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ChandigarhCase: दो साल जेल में सिसकती रही बेटी, अब कोर्ट ने कहा – बेगुनाह थी आशा

चंडीगढ़ में पिता की मौत को हत्या बताकर बेटी को भेजा गया जेल, अदालत ने पुलिस जांच पर उठाए गंभीर सवाल

ChandigarhCase: कभी-कभी न्याय मिलने में इतनी देर हो जाती है कि ज़िंदगी का एक हिस्सा हमेशा के लिए छिन जाता है।

ChandigarhCase: चंडीगढ़ की रहने वाली आशा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है—जहाँ एक बेटी ने पिता को खोया, और उसी पिता की हत्या के आरोप में दो साल से ज्यादा समय तक जेल की सलाखों के पीछे ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ी।
चंडीगढ़ की जिला अदालत ने आखिरकार आशा को बेगुनाह मानते हुए बाइज्जत बरी कर दिया, लेकिन साथ ही यह सवाल भी छोड़ दिया—
“एक निर्दोष बेटी के खोए हुए दो साल की भरपाई कौन करेगा?”
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क्या था पूरा मामला?

9 अगस्त 2023 की वह रात आशा और उसके परिवार के लिए एक दुःस्वप्न बन गई।
मृतक सुमेई लाल, जो शराब के नशे में थे, घर में सब्जी काट रहे थे। पत्नी मालती देवी के मुताबिक, फर्श पर पानी होने के कारण उनका पैर फिसला और हाथ में पकड़ा चाकू सीधे उनकी छाती में जा लगा।
चीख सुनते ही बेटी आशा दौड़कर आई।
उसने घबराहट में चाकू निकाला, खून रोकने की कोशिश की और पिता को तुरंत अस्पताल पहुंचाया—
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

हादसे को हत्या क्यों बना दिया गया?

परिवार का कहना है कि यह एक दर्दनाक हादसा था, न कि कोई हत्या।
इसके बावजूद चंडीगढ़ पुलिस ने सिर्फ एक पड़ोसी की गवाही के आधार पर आशा को आरोपी बना दिया और उसे जेल भेज दिया।

कोर्ट ने इस जांच को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि—

“पूरा मामला एक ही गवाह पर टिका था, जबकि फोरेंसिक, मेडिकल और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की ठीक से जांच ही नहीं की गई।”

कोर्ट में कैसे पलटा मामला?

मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब मुख्य गवाह अपने बयान से मुकर गया।
इसके अलावा मेडिकल रिपोर्ट में भी चाकू की लंबाई और घाव की गहराई के बीच बड़ा विरोधाभास सामने आया।

आशा के वकील ने अदालत में स्पष्ट दलील दी कि—

हत्या का कोई ठोस मकसद साबित नहीं हुआ
कोई प्रत्यक्ष सबूत मौजूद नहीं था
और न ही परिस्थितिजन्य साक्ष्य हत्या की पुष्टि करते थे
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने आशा को बाइज्जत बरी कर दिया।

अब सबसे बड़ा सवाल…

आज आशा आज़ाद है, लेकिन उसके दो साल कौन लौटाएगा?
जिस उम्र में सपने देखने चाहिए थे, उस उम्र में उसने जेल की दीवारें देखीं।
जिस बेटी ने पिता को बचाने की कोशिश की, वही बेटी कातिल कहलाकर सलाखों के पीछे डाल दी गई।

परिवार अब सिर्फ न्याय नहीं, बल्कि जवाब चाहता है—

क्या पुलिस की लापरवाही की कोई कीमत नहीं?
क्या एक निर्दोष ज़िंदगी की बर्बादी का कोई हिसाब नहीं?

न्याय मिला… लेकिन देर से

यह मामला सिर्फ आशा का नहीं है,
यह उस सिस्टम पर सवाल है जहाँ जल्दबाज़ी में ज़िंदगियाँ कुचल दी जाती हैं।
अदालत ने भले ही आशा को आज़ाद कर दिया हो,
लेकिन उसके जीवन के दो अनमोल साल अब कभी वापस नहीं आ सकते।

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