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Antinational Sleeper Cells: नेपाल-बांग्लादेश जैसी बगावत की तैयारी? डायरी में मिले तख्तापलट के सबूत

Antinational Sleeper Cells, नोएडा में सामने आए एक सनसनीखेज मामले ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। जांच के दौरान गिरफ्तार आरोपियों से बरामद 28 पन्नों की एक डायरी में ऐसे कई संकेत मिले हैं,

Antinational Sleeper Cells : 28 पन्नों की डायरी में छिपा तख्तापलट का ब्लूप्रिंट, नोएडा में सनसनी

Antinational Sleeper Cells, नोएडा में सामने आए एक सनसनीखेज मामले ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। जांच के दौरान गिरफ्तार आरोपियों से बरामद 28 पन्नों की एक डायरी में ऐसे कई संकेत मिले हैं, जो युवाओं, खासकर Gen-Z को जोड़कर बड़े स्तर पर अशांति फैलाने की कथित साजिश की ओर इशारा करते हैं। जांच एजेंसियां इस डायरी को कई अहम खुलासों की कुंजी मान रही हैं और इसके आधार पर पूरे नेटवर्क की परतें खोलने में जुटी हैं।सूत्रों के मुताबिक, जांच में सामने आया है कि सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले Gen-Z युवाओं को चिह्नित कर उन्हें एक संगठित ढांचे में शामिल करने की कोशिश की जा रही थी। कथित तौर पर एक टीम ऐसे युवाओं की पहचान कर रही थी, जबकि दूसरी टीम उनसे संपर्क साधकर उन्हें अपने विचारों और योजनाओं से जोड़ने का काम कर रही थी। जांच एजेंसियों को शक है कि इन युवाओं को स्लीपर सेल की तरह तैयार करने की रणनीति पर काम हो रहा था, ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल किया जा सके।

28 पन्नों की डायरी से खुल रहे कई राज

जांच के दौरान बरामद 28 पेज की डायरी अब पूरे मामले का केंद्र बन गई है। बताया जा रहा है कि इस डायरी में 18 से 20 ऐसे लोगों के नाम और विवरण हैं, जो इंटरनेट मीडिया पर सरकार और देश विरोधी विचार व्यक्त करते रहे हैं। साथ ही, कैंपस और अन्य मंचों पर सक्रिय कुछ युवाओं के बारे में भी इसमें उल्लेख मिलने की बात सामने आई है।सूत्रों के अनुसार, इन युवाओं से संपर्क स्थापित कर उन्हें एक विचारधारा से जोड़ने, ब्रेनवॉश करने और संगठनात्मक ढांचे में शामिल करने की योजना पर काम किया जा रहा था। जांच एजेंसियां अब डायरी में दर्ज नामों और अन्य सुरागों के आधार पर आगे की कार्रवाई कर रही हैं।पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पूरे मामले की जांच सिर्फ हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठित अपराध, नेटवर्किंग और अन्य पहलुओं पर भी गहराई से पड़ताल की जा रही है। पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह ने भी साफ किया है कि जांच के आधार पर कार्रवाई जारी है और हर एंगल से मामले को देखा जा रहा है।

नेपाल-बांग्लादेश मॉडल से जोड़कर हो रही जांच

जांच एजेंसियां इस कथित साजिश को नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों में युवाओं की भूमिका से जोड़कर भी देख रही हैं। इन देशों में हाल के वर्षों में युवा वर्ग, खासकर Gen-Z, बड़े सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय रहा है। इसी पैटर्न को देखते हुए आशंका जताई जा रही है कि यहां भी तकनीक-प्रेमी और सोशल मीडिया पर सक्रिय युवाओं को लामबंद करने की रणनीति अपनाई जा रही थी।Gen-Z, यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी, इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर में पली-बढ़ी पहली पीढ़ी मानी जाती है। यह वर्ग सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय है और सूचना के आदान-प्रदान में तेज माना जाता है। इसी वजह से सुरक्षा एजेंसियां इस पीढ़ी के दुरुपयोग की आशंका को गंभीरता से ले रही हैं।

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पढ़े-लिखे आरोपियों की भूमिका पर भी सवाल

मामले में गिरफ्तार लोगों की प्रोफाइल ने भी जांच एजेंसियों को चौंकाया है। जानकारी के मुताबिक, पकड़े गए सभी आरोपित पढ़े-लिखे और अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े हैं। इनमें कोई इंजीनियर है, कोई शोधार्थी, कोई कलाकार तो कोई पत्रकारिता से जुड़ा रहा है।बताया जा रहा है कि एक आरोपी खुद को ऑटो चालक बताता था, लेकिन सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय था। एक महिला आरोपी गारमेंट फैक्ट्री में काम करती थी, जबकि अन्य आरोपियों में इतिहास से परास्नातक, नेट क्वालिफाइड और पीएचडी कर रहे लोग भी शामिल हैं। वहीं एक आरोपी पत्रकारिता और अनुवाद कार्य में विशेषज्ञता रखता है।इन प्रोफाइल्स ने इस केस को और संवेदनशील बना दिया है, क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि कथित नेटवर्क सिर्फ असामाजिक तत्वों तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षित और जागरूक वर्ग तक भी पहुंच बना रहा था।

सोशल मीडिया नेटवर्क पर एजेंसियों की नजर

जांच एजेंसियां अब इंटरनेट मीडिया और डिजिटल नेटवर्क की भी गहन पड़ताल कर रही हैं। डायरी में दर्ज नामों और सोशल मीडिया गतिविधियों के आधार पर संभावित संपर्कों, मैसेजिंग चैनलों और नेटवर्किंग पैटर्न को खंगाला जा रहा है। माना जा रहा है कि इस पूरे नेटवर्क की जड़ें डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए फैलाने की कोशिश की गई।विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक दौर में किसी भी विचारधारा या आंदोलन को सोशल मीडिया के जरिए तेजी से फैलाया जा सकता है। ऐसे में यदि किसी समूह ने युवाओं को संगठित करने की कोशिश की है तो उसकी जांच बेहद जरूरी हो जाती है।

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जांच के बाद ही साफ होगी पूरी तस्वीर

फिलहाल जांच शुरुआती चरण में है और एजेंसियां डायरी, डिजिटल साक्ष्यों और गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के जरिए पूरे मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि अभी कई सवालों के जवाब बाकी हैं क्या यह वास्तव में बड़े षड्यंत्र की तैयारी थी या कुछ लोगों की सीमित गतिविधि, इसका स्पष्ट जवाब जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

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