Vote Scam: कैश-फॉर-वोट मामला क्या है? जानिए JMM सांसदों, नरसिम्हा राव सरकार और सुप्रीम कोर्ट का कनेक्शन
Vote Scam, आम जनता वोट देती है इस उम्मीद में कि महंगाई कम होगी, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, सड़कें बनेंगी और देश का विकास होगा। लेकिन भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ऐसा मामला भी सामने आया, जिसने संसद में होने वाले मतदान और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए।
Vote Scam, आम जनता वोट देती है इस उम्मीद में कि महंगाई कम होगी, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, सड़कें बनेंगी और देश का विकास होगा। लेकिन भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ऐसा मामला भी सामने आया, जिसने संसद में होने वाले मतदान और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए। यह मामला साल 1993 का है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार के खिलाफ लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। सरकार उस समय अल्पमत में थी और उसे बचाने के लिए जरूरी समर्थन जुटाना एक बड़ी चुनौती थी।
क्या था 1993 का कैश-फॉर-वोट मामला?
जुलाई 1993 में लोकसभा में पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया। उस समय कांग्रेस के पास सरकार चलाने के लिए जरूरी बहुमत नहीं था। 28 जुलाई 1993 को प्रस्ताव पर मतदान हुआ, जिसमें अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में 251 और विरोध में 265 वोट पड़े। इस तरह सरकार गिरने से बच गई।हालांकि, मतदान के बाद सरकार को समर्थन देने वाले कुछ सांसदों को लेकर गंभीर आरोप सामने आए। आरोप था कि झारखंड मुक्ति मोर्चा यानी JMM के कुछ सांसदों और जनता दल के कुछ सदस्यों को अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ वोट देने के लिए रिश्वत दी गई थी। इस मामले में तीन करोड़ रुपये से अधिक की कथित रिश्वत के आरोप सामने आए। ये आरोप जांच और अदालती कार्यवाही का विषय बने। ध्यान देने वाली बात यह है कि आरोपों को अपने आप में किसी व्यक्ति का दोष साबित होने के बराबर नहीं माना जा सकता।
किन सांसदों के नाम आए सामने?
इस मामले में झारखंड मुक्ति मोर्चा के तत्कालीन सांसदों शिबू सोरेन, सूरज मंडल, साइमन मरांडी और शैलेंद्र महतो के नाम सामने आए। जांच एजेंसियों ने कथित रिश्वत और सरकार के पक्ष में मतदान के बीच संबंध की जांच की। मामले में कथित तौर पर रिश्वत देने और लेने से जुड़े कई लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई हुई।इस प्रकरण ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया कि क्या संसद में सांसदों का वोट किसी राजनीतिक सौदे का हिस्सा बन सकता है? सांसदों से उम्मीद की जाती है कि वे अपने क्षेत्र के लोगों और देश के हितों को ध्यान में रखते हुए फैसले लें। अगर किसी सांसद पर पैसे लेकर वोट देने का आरोप लगता है, तो इससे जनता का भरोसा और लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। हालांकि, किसी भी मामले में अंतिम निष्कर्ष अदालत के फैसलों और उपलब्ध सबूतों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
1998 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
यह मामला आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। 17 अप्रैल 1998 को सुप्रीम कोर्ट ने पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम राज्य (CBI/SPE) मामले में फैसला सुनाया। पांच जजों की पीठ के बहुमत ने माना कि संसद में दिए गए वोट या भाषण से जुड़े रिश्वत के मामले में सांसदों को संविधान के अनुच्छेद 105(2) के तहत अभियोजन से छूट मिल सकती है। यह फैसला 3-2 के बहुमत से आया था।संविधान का अनुच्छेद 105 संसद के सदस्यों के विशेषाधिकारों से जुड़ा है। इसका उद्देश्य सांसदों को सदन में बिना अनुचित दबाव के बोलने और अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने की स्वतंत्रता देना है। लेकिन 1998 के फैसले की व्याख्या को लेकर सवाल उठे। आलोचकों का कहना था कि अगर रिश्वत लेने वाले सांसद को वोट डालने के कारण आपराधिक मुकदमे से छूट मिल सकती है, तो इससे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई में मुश्किल पैदा हो सकती है।
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2024 में सुप्रीम कोर्ट ने बदला पुराना फैसला
चार मार्च 2024 को सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने 1998 के फैसले को पलट दिया। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने सर्वसम्मति से स्पष्ट किया कि सांसदों और विधायकों को सदन में वोट देने या भाषण से जुड़े रिश्वत के आरोपों में आपराधिक मुकदमे से संवैधानिक छूट नहीं मिलती।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिश्वत लेना संसदीय विशेषाधिकार का हिस्सा नहीं हो सकता। अदालत के अनुसार, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी सार्वजनिक जीवन की ईमानदारी को नुकसान पहुंचाते हैं। केवल इस आधार पर कि किसी सांसद या विधायक का काम सदन में मतदान या भाषण से जुड़ा है, उसे रिश्वत लेने के आरोप में कानूनी कार्रवाई से सुरक्षा नहीं दी जा सकती।यह फैसला इसलिए अहम माना गया क्योंकि इसने जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और भ्रष्टाचार के मामलों में कानून के समान इस्तेमाल से जुड़े सवालों पर स्पष्टता दी। साथ ही, इसने यह भी रेखांकित किया कि संसदीय विशेषाधिकार का उद्देश्य जनप्रतिनिधियों के कामकाज की रक्षा करना है, न कि कथित आपराधिक गतिविधियों को संरक्षण देना।
लोकतंत्र में वोट की कीमत क्या है?
1993 का कैश-फॉर-वोट मामला भारतीय राजनीति के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इसने दिखाया कि सरकार के बहुमत और संसद में होने वाले मतदान को लेकर उठे आरोप कितने बड़े कानूनी और संवैधानिक सवाल पैदा कर सकते हैं। 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने यह साफ किया कि रिश्वत के आरोपों को संसदीय विशेषाधिकार के पीछे छिपाकर आपराधिक जांच से बचा नहीं जा सकता।लोकतंत्र में वोट केवल सरकार बनाने या गिराने का साधन नहीं है। यह जनता के विश्वास और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी से जुड़ा अधिकार है। मतदाताओं के लिए जरूरी है कि वे चुनाव के समय उम्मीदवारों के काम, सार्वजनिक रिकॉर्ड और जवाबदेही को ध्यान में रखें। वहीं, जनप्रतिनिधियों से भी उम्मीद की जाती है कि वे अपने फैसलों में पारदर्शिता बनाए रखें और जनता के भरोसे का सम्मान करें।
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