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Menopause Hormones: मेनोपॉज में खुद पर आने लगता है गुस्सा? इन हार्मोनल बदलावों की वजह से हो सकता है ऐसा

Menopause Hormones, मेनोपॉज महिलाओं की जिंदगी का एक सामान्य जैविक चरण है, लेकिन इस दौरान शरीर में होने वाले बदलाव कई बार भावनात्मक रूप से परेशान कर सकते हैं।

Menopause Hormones : मेनोपॉज सिर्फ पीरियड्स बंद होने का नाम नहीं! मूड पर भी पड़ता है हार्मोन्स का असर

Menopause Hormones, मेनोपॉज महिलाओं की जिंदगी का एक सामान्य जैविक चरण है, लेकिन इस दौरान शरीर में होने वाले बदलाव कई बार भावनात्मक रूप से परेशान कर सकते हैं। कुछ महिलाओं को इस समय बिना किसी स्पष्ट वजह के चिड़चिड़ापन महसूस होता है, तो कभी छोटी-सी बात पर गुस्सा या रोने का मन करने लगता है। कई बार बेचैनी, उदासी, तनाव और अकेलापन भी महसूस हो सकता है। ऐसे में महिला को लग सकता है कि आखिर उसे खुद के साथ क्या हो रहा है। दरअसल, इसके पीछे शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव की भी बड़ी भूमिका हो सकती है। खासकर एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन्स में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर मूड और नींद पर पड़ सकता है।

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क्या होता है मेनोपॉज?

मेनोपॉज वह प्राकृतिक अवस्था है जब महिला के पीरियड्स स्थायी रूप से बंद हो जाते हैं। आम तौर पर लगातार 12 महीने तक पीरियड्स न आने के बाद मेनोपॉज माना जाता है। इसके पहले का चरण पेरिमेनोपॉज कहलाता है। इस दौरान पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं और हार्मोन्स के स्तर में काफी उतार-चढ़ाव हो सकता है। यही अवधि कई महिलाओं के लिए मूड से जुड़े बदलावों के लिहाज से चुनौतीपूर्ण हो सकती है।हर महिला का अनुभव अलग होता है। किसी को बहुत कम लक्षण होते हैं, जबकि किसी दूसरी महिला में हॉट फ्लैशेज, नींद की समस्या, चिड़चिड़ापन और मूड में बदलाव ज्यादा दिखाई दे सकते हैं।

एस्ट्रोजन का मूड से क्या कनेक्शन है?

मेनोपॉज के आसपास अंडाशय से बनने वाले एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर कम होने लगता है। एस्ट्रोजन का संबंध केवल प्रजनन तंत्र से नहीं है, बल्कि यह मस्तिष्क के कई कार्यों को भी प्रभावित करता है। यह सेरोटोनिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर और उनके रिसेप्टर्स की गतिविधि पर असर डाल सकता है। सेरोटोनिन को मूड और भावनात्मक संतुलन से जोड़कर देखा जाता है।इसी वजह से हार्मोनल बदलाव के दौरान कुछ महिलाओं में मूड स्विंग, चिड़चिड़ापन या उदासी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि मेनोपॉज से गुजरने वाली हर महिला को डिप्रेशन होगा। हार्मोनल बदलाव कई कारणों में से एक हो सकता है।

नींद खराब होने से बढ़ सकती है परेशानी

मेनोपॉज के दौरान हॉट फ्लैशेज और रात में पसीना आने जैसी समस्याएं नींद को प्रभावित कर सकती हैं। अगर रात में बार-बार नींद टूटती है, तो अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन और ध्यान लगाने में परेशानी महसूस हो सकती है।लगातार खराब नींद भावनात्मक स्थिति को और प्रभावित कर सकती है। इस तरह एक चक्र बन सकता है हार्मोनल बदलाव से नींद प्रभावित हुई, नींद खराब होने से मूड बिगड़ा और खराब मूड की वजह से तनाव बढ़ गया।

क्या केवल हार्मोन्स ही जिम्मेदार हैं?

नहीं। मेनोपॉज के दौरान मूड में बदलाव को केवल हार्मोन्स के खाते में डालना सही नहीं होगा। इस उम्र में महिलाओं की जिंदगी में कई दूसरे बदलाव भी हो सकते हैं। बच्चों का घर से दूर जाना, परिवार की जिम्मेदारियां, काम का तनाव, रिश्तों में बदलाव या उम्र बढ़ने को लेकर चिंता जैसी परिस्थितियां मानसिक स्थिति पर प्रभाव डाल सकती हैं।इसके अलावा हॉट फ्लैशेज, वजन में बदलाव, शरीर में दर्द या यौन स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियां भी तनाव बढ़ा सकती हैं। इसलिए किसी महिला के मूड में बदलाव के पीछे कई कारण एक साथ काम कर सकते हैं।

चिड़चिड़ापन और मूड स्विंग को कैसे संभालें?

मेनोपॉज के दौरान अपनी दिनचर्या पर ध्यान देना काफी मददगार हो सकता है। नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और संतुलित आहार शरीर और मूड दोनों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। रोजाना वॉक, योग, स्ट्रेचिंग या डॉक्टर की सलाह के अनुसार एक्सरसाइज को दिनचर्या में शामिल किया जा सकता है।कैफीन और शराब का अधिक सेवन कुछ महिलाओं में हॉट फ्लैशेज या नींद की समस्या को बढ़ा सकता है, इसलिए इनके सेवन पर नजर रखना उपयोगी हो सकता है। सोने और जागने का समय नियमित रखने की कोशिश करें। तनाव कम करने के लिए डीप ब्रीदिंग, मेडिटेशन या अपनी पसंद की किसी गतिविधि के लिए समय निकालना भी मदद कर सकता है।

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अपनी भावनाओं को दबाएं नहीं

मेनोपॉज के दौरान मूड में बदलाव को लेकर महिलाएं कई बार खुद को ही दोष देने लगती हैं। उन्हें लगता है कि वे पहले जैसी शांत या खुश क्यों नहीं रह पा रही हैं। लेकिन इस दौर में शरीर में होने वाले बदलावों को समझना जरूरी है।परिवार के लोगों और करीबी दोस्तों से खुलकर बात करना मददगार हो सकता है। अगर लगातार उदासी, निराशा, अत्यधिक चिंता, किसी काम में रुचि खत्म होना, सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाना या रोजमर्रा के काम प्रभावित होने जैसी समस्या हो रही है, तो इसे केवल मेनोपॉज का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

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डॉक्टर से कब संपर्क करें?

अगर मूड में बदलाव बहुत ज्यादा है, लंबे समय तक बना रहता है या आपकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित कर रहा है, तो डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना बेहतर है। डॉक्टर आपके लक्षणों और स्वास्थ्य इतिहास को देखते हुए उचित सलाह दे सकते हैं। कुछ महिलाओं में मेनोपॉज के लक्षणों के लिए हार्मोन थेरेपी या अन्य उपचार पर विचार किया जा सकता है, लेकिन इसका फैसला डॉक्टर की सलाह के बाद ही होना चाहिए।मेनोपॉज कोई बीमारी नहीं बल्कि जीवन का प्राकृतिक चरण है। इस दौरान हार्मोनल बदलाव मूड, नींद और भावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन हर महिला का अनुभव अलग होता है। इसलिए खुद को दोष देने के बजाय शरीर में हो रहे बदलावों को समझना और जरूरत पड़ने पर मदद लेना ज्यादा जरूरी है। सही जानकारी, बेहतर नींद, नियमित गतिविधि, संतुलित खान-पान और भावनात्मक सहयोग के साथ इस बदलाव को अधिक सहज तरीके से संभाला जा सकता है।

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