Climate change Himalayas: हिमालय में बार-बार क्यों मच रही तबाही? निगरानी तंत्र मजबूत करने की बढ़ी जरूरत
Climate change Himalayas, हिमालयी क्षेत्र में हाल के दिनों में बाढ़, बादल फटने, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाओं ने एक बार फिर भारत की आपदा प्रबंधन व्यवस्था और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नेपाल में हालिया प्राकृतिक आपदा ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है।
Climate change Himalayas : हिमालयी क्षेत्र में आपदा का बढ़ता जोखिम, भारत के निगरानी तंत्र के सामने नई चुनौती
Climate change Himalayas, हिमालयी क्षेत्र में हाल के दिनों में बाढ़, बादल फटने, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाओं ने एक बार फिर भारत की आपदा प्रबंधन व्यवस्था और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नेपाल में हालिया प्राकृतिक आपदा ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। हिमालय एक युवा और बेहद संवेदनशील पर्वत श्रृंखला है, जहां बदलते मौसम, भारी बारिश, ग्लेशियरों के पिघलने और तेजी से बढ़ते निर्माण का असर पहले से दिखाई दे रहा है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आपदा आने के बाद राहत कितनी तेजी से पहुंचाई जाए, बल्कि यह भी है कि क्या भारत के पास संभावित खतरे की समय रहते पहचान करने और स्थानीय स्तर तक चेतावनी पहुंचाने का पर्याप्त तंत्र है?
हिमालयी क्षेत्र क्यों है बेहद संवेदनशील?
हिमालय दुनिया की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसकी भौगोलिक बनावट इसे भूस्खलन, भूकंप और अचानक आने वाली बाढ़ के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। पहाड़ों में ढलान अस्थिर होने के कारण लगातार बारिश के दौरान मिट्टी और चट्टानों के खिसकने का खतरा बढ़ जाता है।इसके अलावा, हिमालय में कई बड़ी नदियों का उद्गम होता है। भारी बारिश या ग्लेशियल झीलों में अचानक पानी बढ़ने पर नदियों का जलस्तर बहुत तेजी से ऊपर जा सकता है। निचले इलाकों में रहने वाली आबादी को कई बार प्रतिक्रिया के लिए बेहद कम समय मिलता है।
नेपाल की घटनाओं से भारत के लिए क्या सबक?
नेपाल में हालिया बाढ़ और फ्लैश फ्लड ने यह दिखाया है कि पहाड़ी इलाकों में एक घटना का प्रभाव सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। हिमालयी नदियां भारत और नेपाल दोनों से होकर गुजरती हैं। इसलिए ऊपरी कैचमेंट में होने वाली भारी बारिश, भूस्खलन या झील टूटने की घटना का असर नीचे की ओर भारत के इलाकों में भी महसूस हो सकता है।भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के लिए हिमालयी नदियों का व्यवहार बेहद महत्वपूर्ण है। किसी नदी के ऊपरी हिस्से में अचानक पानी बढ़ने पर निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।इसलिए भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि आपदा निगरानी को सिर्फ राज्य या जिले की सीमा में नहीं देखा जा सकता। सीमापार डेटा शेयरिंग, रियल-टाइम नदी निगरानी और मौसम संबंधी जानकारी का तेज आदान-प्रदान बेहद जरूरी है।
निगरानी तंत्र में रियल-टाइम डेटा की जरूरत
हिमालयी आपदाओं से निपटने के लिए सबसे महत्वपूर्ण हथियार समय पर मिलने वाली जानकारी है। मौसम रडार, स्वचालित वर्षामापी, नदी जलस्तर सेंसर, सैटेलाइट इमेजरी और ग्लेशियल झीलों की निगरानी से संभावित खतरे का पहले अनुमान लगाया जा सकता है।भारत में मौसम और जल संसाधनों से जुड़ी कई सरकारी एजेंसियां लगातार निगरानी करती हैं। लेकिन चुनौती यह है कि हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में सेंसर और संचार नेटवर्क की पर्याप्त पहुंच हर जगह नहीं है।किसी दूरदराज घाटी में बादल फटने या अचानक भारी बारिश होने पर स्थानीय प्रशासन तक सूचना पहुंचने में देरी हो जाए तो कुछ मिनटों का अंतर भी बड़े नुकसान में बदल सकता है।
सिर्फ चेतावनी जारी करना काफी नहीं
आपदा प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अलर्ट जारी करना और लोगों तक प्रभावी चेतावनी पहुंचाना दो अलग-अलग चीजें हैं।मान लीजिए किसी क्षेत्र में अचानक बाढ़ का खतरा है और प्रशासन ने अलर्ट जारी कर दिया। लेकिन यदि पहाड़ों में मोबाइल नेटवर्क काम नहीं कर रहा, बिजली बंद है या स्थानीय लोगों को अलर्ट समझ में नहीं आया, तो चेतावनी का उद्देश्य पूरा नहीं होगा।इसलिए हिमालयी राज्यों में स्थानीय भाषाओं में SMS अलर्ट, सायरन सिस्टम, सामुदायिक रेडियो, ग्राम स्तर के स्वयंसेवक और सुरक्षित निकासी मार्गों की व्यवस्था मजबूत करना जरूरी है।
बढ़ता निर्माण भी चिंता का विषय
हिमालय में आपदाओं के बढ़ते जोखिम को केवल जलवायु परिवर्तन से जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा। सड़क निर्माण, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएं, होटल और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाएं भी पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव डालती हैं।विकास की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन सवाल यह है कि निर्माण कहां, कितना और किस तरीके से किया जाए। कमजोर ढलानों पर अनियोजित निर्माण प्राकृतिक आपदा के प्रभाव को कई गुना बढ़ा सकता है।विशेषज्ञ लंबे समय से हिमालयी क्षेत्रों में carrying capacity यानी किसी इलाके की पर्यावरणीय वहन क्षमता को ध्यान में रखते हुए विकास की जरूरत पर जोर देते रहे हैं।
ग्लेशियल झीलों पर भी नजर जरूरी
जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी झीलों में बदलाव को लेकर वैज्ञानिक लगातार अध्ययन कर रहे हैं। ग्लेशियल झीलों में पानी का दबाव बढ़ने या प्राकृतिक बांध टूटने से अचानक बाढ़ आ सकती है।ऐसी घटनाओं की निगरानी के लिए सैटेलाइट तकनीक और जमीनी सेंसर दोनों की जरूरत है। सिर्फ साल में एक-दो बार सर्वे करने के बजाय संवेदनशील झीलों की नियमित और स्वचालित निगरानी अधिक प्रभावी हो सकती है।
भारत के लिए बड़ी चेतावनी
हिमालयी आपदाएं भारत के लिए केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन और जल सुरक्षा का सवाल भी हैं। हिमालय से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों की आजीविका और पेयजल जरूरतों से जुड़ी हैं।ऐसे में भारत को एक ऐसा integrated Himalayan disaster monitoring system विकसित करने की जरूरत है, जिसमें मौसम, नदी, ग्लेशियर, भूस्खलन और मानव बस्तियों से जुड़ा डेटा एक साथ देखा जा सके।इसके साथ नेपाल, भूटान और चीन के साथ जहां संभव हो, वैज्ञानिक एवं जल-मौसम संबंधी डेटा साझा करने की व्यवस्था को भी मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा।
अब तैयारी को और मजबूत करने का समय
हालिया घटनाएं यह याद दिलाती हैं कि हिमालय में आपदा को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन उसके नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए पूर्व चेतावनी, मजबूत निगरानी, बेहतर संचार, वैज्ञानिक निर्माण नीति और तेज राहत व्यवस्था को एक साथ काम करना होगा।भारत के लिए सबसे बड़ी चेतावनी यही है कि आपदा आने के बाद प्रतिक्रिया देने की बजाय पहले से जोखिम की पहचान और तैयारी पर जोर दिया जाए। हिमालय बदल रहा है और इसके साथ आपदा का स्वरूप भी बदल रहा है। ऐसे में निगरानी तंत्र को भी पारंपरिक व्यवस्था से आगे बढ़ाकर आधुनिक तकनीक, स्थानीय जानकारी और रियल-टाइम डेटा पर आधारित बनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
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