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Bihar government: बिना विधायक बने मंत्री! दीपक प्रकाश पर सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से मांगा जवाब

Bihar government, बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अहम टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार से सवाल पूछा कि "कोई व्यक्ति बिना विधायक (MLA) या विधान परिषद (MLC) का सदस्य बने छह महीने से अधिक समय तक मंत्री कैसे बना रह सकता है?"

Bihar government : अनुच्छेद 164(4) पर SC की नजर, दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर बिहार सरकार से पूछा बड़ा सवाल

Bihar government, बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अहम टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार से सवाल पूछा कि “कोई व्यक्ति बिना विधायक (MLA) या विधान परिषद (MLC) का सदस्य बने छह महीने से अधिक समय तक मंत्री कैसे बना रह सकता है?” अदालत ने इसे संविधान की व्याख्या से जुड़ा महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न बताते हुए बिहार सरकार से जवाब मांगा है। यह मामला केवल एक मंत्री की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 164(4) की व्याख्या और गैर-विधायक मंत्री के कार्यकाल की सीमा से जुड़ा अहम संवैधानिक विवाद बन गया है।

क्या है पूरा मामला?

दीपक प्रकाश, जो राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के नेता और उपेंद्र कुशवाहा के पुत्र हैं, नवंबर 2025 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में पंचायती राज मंत्री बनाए गए थे। उस समय वे न तो विधानसभा के सदस्य थे और न ही विधान परिषद के। बाद में अप्रैल 2026 में सरकार बदलने के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार बनी और 7 मई 2026 को दीपक प्रकाश को फिर से मंत्री पद की शपथ दिला दी गई। याचिकाकर्ता का दावा है कि दोनों कार्यकालों को जोड़ने पर दीपक प्रकाश छह महीने से अधिक समय तक बिना किसी सदन के सदस्य बने मंत्री पद पर बने हुए हैं, जो संविधान की भावना के विपरीत है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह “शुद्ध कानूनी प्रश्न” है और बिहार सरकार को स्पष्ट करना होगा कि कोई व्यक्ति छह महीने से अधिक समय तक बिना निर्वाचित हुए मंत्री कैसे बना रह सकता है।याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि छह महीने की अवधि पूरी हो चुकी है, फिर भी दीपक प्रकाश मंत्री पद पर बने हुए हैं। इस पर अदालत ने कहा कि राज्य सरकार को इसका संवैधानिक आधार बताना होगा। मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को तय की गई है।

अनुच्छेद 164(4) क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164(4) कहता है कि यदि कोई व्यक्ति विधायक या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, तब भी उसे मंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन ऐसी स्थिति में उसे छह महीने के भीतर किसी एक सदन का सदस्य बनना अनिवार्य होता है।यदि वह छह महीने के भीतर किसी भी सदन का सदस्य नहीं बनता, तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है। इसी प्रावधान की व्याख्या को लेकर वर्तमान विवाद सामने आया है।

याचिका में क्या दलील दी गई?

याचिका में कहा गया है कि संविधान में दी गई छह महीने की छूट केवल एक बार के लिए है। सरकार बदलने, मुख्यमंत्री बदलने या दोबारा शपथ दिलाने से यह अवधि फिर से शुरू नहीं हो सकती।याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि ऐसा माना गया तो कोई भी सरकार गैर-विधायक व्यक्ति को बार-बार मंत्री बनाकर संवैधानिक सीमा को निष्प्रभावी कर सकती है, जो संविधान की मंशा के खिलाफ होगा।

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बिहार सरकार का पक्ष

सुनवाई के दौरान बिहार सरकार की ओर से कहा गया कि मामला पहले से सूचीबद्ध है और अदालत के समक्ष विचाराधीन है। सरकार ने इस पर विस्तृत जवाब अगली सुनवाई में देने की बात कही। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से इस नियुक्ति का संवैधानिक आधार स्पष्ट करने को कहा है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का फैसला भविष्य में उन सभी मामलों के लिए मिसाल बन सकता है, जहां किसी गैर-विधायक को मंत्री बनाया जाता है। यदि सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट कर देता है कि छह महीने की अवधि लगातार मानी जाएगी और दोबारा शपथ से इसे रीसेट नहीं किया जा सकता, तो भविष्य में राज्यों की नियुक्ति प्रक्रिया पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

मामले ने बिहार की राजनीति में भी हलचल बढ़ा दी है। विपक्ष का कहना है कि संविधान की भावना का पालन होना चाहिए और मंत्री पद पर बने रहने के लिए निर्वाचित होना आवश्यक है। वहीं सत्तापक्ष का कहना है कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है और अंतिम फैसला आने तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

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आगे क्या होगा?

अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर है। अदालत बिहार सरकार से यह जानना चाहती है कि दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर बने रहने का संवैधानिक आधार क्या है और क्या सरकार का यह कदम अनुच्छेद 164(4) के अनुरूप है।यदि अदालत याचिकाकर्ता की दलीलों से सहमत होती है, तो यह फैसला न केवल बिहार बल्कि पूरे देश में गैर-विधायक मंत्रियों की नियुक्ति से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक नजीर बन सकता है। वहीं यदि सरकार अपने पक्ष को सफलतापूर्वक स्पष्ट करती है, तो अनुच्छेद 164(4) की नई व्याख्या सामने आ सकती है। फिलहाल यह मामला भारतीय संविधान की व्याख्या और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों में से एक बन गया है।

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