Dadabhai Naoroji birth anniversary: दादाभाई नौरोजी की जयंती पर जानें उनके जीवन, शिक्षा और स्वतंत्रता आंदोलन में अहम योगदान
Dadabhai Naoroji birth anniversary, दादाभाई नौरोजी जयंती हर वर्ष 4 सितंबर को मनाई जाती है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी नेताओं में शामिल दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर 1825 को तत्कालीन बॉम्बे (अब मुंबई) में एक पारसी परिवार में हुआ था।
Dadabhai Naoroji birth anniversary : ‘ड्रेन थ्योरी’ से अंग्रेजों की नीतियों की पोल खोलने वाले महान नेता की कहानी
Dadabhai Naoroji birth anniversary, दादाभाई नौरोजी जयंती हर वर्ष 4 सितंबर को मनाई जाती है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी नेताओं में शामिल दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर 1825 को तत्कालीन बॉम्बे (अब मुंबई) में एक पारसी परिवार में हुआ था। वर्ष 2026 में उनकी 201वीं जयंती मनाई जाएगी। उन्हें “ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया” के नाम से भी जाना जाता है। वे एक महान समाज सुधारक, शिक्षाविद्, अर्थशास्त्री, लेखक और राजनेता थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों का तथ्यों के साथ विरोध किया और भारतीयों के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष किया।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
दादाभाई नौरोजी का बचपन आर्थिक रूप से साधारण परिस्थितियों में बीता। उनके पिता का निधन तब हो गया था, जब वे बहुत छोटे थे। उनकी माता मानेकबाई ने कठिन परिस्थितियों में उनका पालन-पोषण किया और शिक्षा के लिए प्रेरित किया।उन्होंने एलफिंस्टन इंस्टीट्यूशन (Elphinstone Institution) से अपनी पढ़ाई पूरी की। वे पढ़ाई में अत्यंत मेधावी थे और बाद में वहीं गणित और प्राकृतिक दर्शन (Natural Philosophy) के प्रोफेसर बने। उस समय किसी भारतीय का इस प्रकार के प्रतिष्ठित पद पर पहुंचना बड़ी उपलब्धि माना जाता था।
समाज सुधार के लिए किया काम
दादाभाई नौरोजी केवल राजनीतिक नेता ही नहीं थे, बल्कि एक समाज सुधारक भी थे। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, सामाजिक समानता और आधुनिक शिक्षा के प्रसार पर विशेष जोर दिया। उनका मानना था कि किसी भी देश की प्रगति शिक्षा और जागरूकता के बिना संभव नहीं है।उन्होंने कई सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना और संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में रहे शामिल
दादाभाई नौरोजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress) के संस्थापक नेताओं में से एक थे। कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई और उन्होंने पार्टी को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
वे तीन बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए—
- 1886 (कलकत्ता अधिवेशन)
- 1893 (लाहौर अधिवेशन)
- 1906 (कलकत्ता अधिवेशन)
1906 के अधिवेशन में उन्होंने पहली बार “स्वराज” को कांग्रेस का प्रमुख लक्ष्य घोषित करने का समर्थन किया। यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।
ब्रिटिश संसद के पहले भारतीय सदस्य
दादाभाई नौरोजी ने भारतीयों की आवाज को ब्रिटेन तक पहुंचाने का कार्य किया। वर्ष 1892 में वे ब्रिटिश संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) के लिए चुने जाने वाले पहले भारतीय बने। उन्होंने लिबरल पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता।संसद में रहते हुए उन्होंने भारत में हो रहे आर्थिक शोषण, प्रशासनिक भेदभाव और भारतीयों के अधिकारों के मुद्दे को मजबूती से उठाया।
‘ड्रेन थ्योरी’ से दुनिया का ध्यान खींचा
दादाभाई नौरोजी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान उनकी प्रसिद्ध “ड्रेन थ्योरी” (Drain Theory) मानी जाती है।इस सिद्धांत में उन्होंने बताया कि ब्रिटिश शासन भारत की संपत्ति और संसाधनों को लगातार इंग्लैंड भेज रहा है, जिससे भारत गरीब होता जा रहा है। उन्होंने आंकड़ों और तथ्यों के आधार पर यह साबित करने की कोशिश की कि भारत की गरीबी का प्रमुख कारण ब्रिटिश आर्थिक नीतियां थीं।उनकी यह सोच बाद में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण वैचारिक आधार बनी।
प्रमुख पुस्तक
दादाभाई नौरोजी की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक “Poverty and Un-British Rule in India” है।इस पुस्तक में उन्होंने भारत की आर्थिक स्थिति का विस्तार से विश्लेषण किया और बताया कि किस प्रकार ब्रिटिश शासन की नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया।आज भी यह पुस्तक भारतीय आर्थिक इतिहास के अध्ययन में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
महात्मा गांधी समेत कई नेताओं को किया प्रेरित
दादाभाई नौरोजी के विचारों का प्रभाव कई महान नेताओं पर पड़ा।
- महात्मा गांधी
- गोपाल कृष्ण गोखले
- बाल गंगाधर तिलक
- जवाहरलाल नेहरू
इन सभी नेताओं ने उनके विचारों और राष्ट्रभक्ति से प्रेरणा ली। महात्मा गांधी उन्हें अपना मार्गदर्शक मानते थे।
मिले कई सम्मान
दादाभाई नौरोजी को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रदूतों में गिना जाता है। उन्हें सम्मानपूर्वक “भारत का ग्रैंड ओल्ड मैन” कहा गया। भारतीय इतिहास में उनका स्थान उन नेताओं में है, जिन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई की वैचारिक नींव मजबूत की।
निधन
दादाभाई नौरोजी का निधन 30 जून 1917 को मुंबई में हुआ। हालांकि वे स्वतंत्र भारत नहीं देख सके, लेकिन उनके विचारों और संघर्ष ने आजादी की राह को मजबूत बनाया।
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जयंती का महत्व
दादाभाई नौरोजी जयंती केवल एक महान नेता को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह युवाओं को राष्ट्रसेवा, ईमानदारी और शिक्षा के महत्व को समझने की प्रेरणा भी देती है।
इस अवसर पर देशभर में—
- श्रद्धांजलि सभाएं
- व्याख्यान
- निबंध प्रतियोगिताएं
- इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन पर संगोष्ठियां
आयोजित की जाती हैं।
दादाभाई नौरोजी से मिलने वाली सीख
- शिक्षा समाज परिवर्तन की सबसे बड़ी ताकत है।
- तथ्यों और तर्कों के आधार पर अन्याय का विरोध करना चाहिए।
- राष्ट्रहित को हमेशा व्यक्तिगत हित से ऊपर रखना चाहिए।
- लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से भी बड़े परिवर्तन संभव हैं।
दादाभाई नौरोजी जयंती 2026 हमें उस महान स्वतंत्रता सेनानी, अर्थशास्त्री और समाज सुधारक को याद करने का अवसर देती है, जिन्होंने भारत की आर्थिक और राजनीतिक चेतना को नई दिशा दी। “ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया” के रूप में प्रसिद्ध दादाभाई नौरोजी ने अपने विचारों, लेखन और संघर्ष से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की मजबूत नींव रखी। उनका जीवन आज भी देशभक्ति, शिक्षा, ईमानदारी और जनसेवा का प्रेरणादायक उदाहरण है।
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