Sarojini Naidu death anniversary 2026: सरोजिनी नायडू पुण्यतिथि, कवयित्री, स्वतंत्रता सेनानी और नारी शक्ति की मिसाल
Sarojini Naidu death anniversary 2026, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक महान विभूतियों ने अपना योगदान दिया, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिन्होंने राजनीति, साहित्य और समाज तीनों क्षेत्रों में अमिट छाप छोड़ी।
Sarojini Naidu death anniversary 2026 : भारत कोकिला सरोजिनी नायडू की पुण्यतिथि 2026, जानें उनका संघर्ष और साहित्यिक विरासत
Sarojini Naidu death anniversary 2026, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक महान विभूतियों ने अपना योगदान दिया, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिन्होंने राजनीति, साहित्य और समाज तीनों क्षेत्रों में अमिट छाप छोड़ी। ऐसी ही महान हस्ती थीं सरोजिनी नायडू, जिन्हें प्रेम और सम्मान से “भारत कोकिला” कहा जाता है। उनकी पुण्यतिथि हर वर्ष 2 मार्च को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में भी देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि दी जाएगी और उनके योगदान को याद किया जाएगा।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में एक विद्वान परिवार में हुआ था। उनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय वैज्ञानिक और शिक्षाविद थे, जबकि माता वरदसुंदरी देवी एक कवयित्री थीं। घर का वातावरण साहित्यिक और बौद्धिक था, जिसने सरोजिनी के व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया।कम उम्र में ही उनकी प्रतिभा प्रकट हो गई थी। उन्होंने मात्र 12 वर्ष की आयु में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और किशोरावस्था में ही कविताएं लिखना शुरू कर दिया। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा गया, जहां उन्होंने किंग्स कॉलेज लंदन और गर्टन कॉलेज कैम्ब्रिज में अध्ययन किया।
साहित्यिक पहचान: “भारत कोकिला”
सरोजिनी नायडू मूलतः एक प्रतिभाशाली कवयित्री थीं। उनकी कविताओं में भारतीय प्रकृति, संस्कृति, प्रेम और राष्ट्रभावना का सुंदर चित्रण मिलता है। उनकी काव्य रचनाएं अंग्रेज़ी भाषा में थीं, लेकिन उनमें भारतीय आत्मा की झलक स्पष्ट दिखती है।उनके प्रमुख काव्य संग्रहों में The Golden Threshold, The Bird of Time और The Broken Wing शामिल हैं। उनकी मधुर और संगीतमय काव्य शैली के कारण उन्हें “नाइटिंगेल ऑफ इंडिया” यानी भारत कोकिला कहा गया।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
कविता के साथ-साथ सरोजिनी नायडू ने राष्ट्र सेवा का मार्ग चुना। वे महात्मा गांधी से अत्यंत प्रभावित थीं और उनके नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुईं। उन्होंने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया।सरोजिनी नायडू देशभर में यात्रा कर लोगों को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित करती थीं। वे एक प्रभावशाली वक्ता थीं और उनके भाषण लोगों में उत्साह भर देते थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष
सरोजिनी नायडू का राजनीतिक जीवन भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। वर्ष 1925 में कानपुर अधिवेशन में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं (एनी बेसेंट के बाद दूसरी महिला अध्यक्ष)। यह उस समय महिलाओं के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी और नारी सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम था।उन्होंने राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा दिया और भारतीय समाज में स्त्री की भूमिका को नई पहचान दिलाई।
स्वतंत्र भारत की पहली महिला राज्यपाल
भारत की स्वतंत्रता के बाद भी सरोजिनी नायडू ने सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल बनीं, जो किसी भी भारतीय राज्य की पहली महिला राज्यपाल थीं।राज्यपाल के रूप में उन्होंने प्रशासनिक जिम्मेदारियों को कुशलता से निभाया और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत किया।
नारी सशक्तिकरण की प्रेरणा
सरोजिनी नायडू महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा की प्रबल समर्थक थीं। वे मानती थीं कि राष्ट्र की प्रगति महिलाओं की उन्नति के बिना संभव नहीं है। उन्होंने महिलाओं को राजनीति, शिक्षा और समाज सेवा में आगे आने के लिए प्रेरित किया।उनका जीवन यह संदेश देता है कि प्रतिभा, साहस और समर्पण के बल पर महिलाएं किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती हैं।
निधन और पुण्यतिथि
2 मार्च 1949 को लखनऊ में सरोजिनी नायडू का निधन हो गया। उस समय वे उत्तर प्रदेश की राज्यपाल थीं। उनके निधन से देश ने एक महान स्वतंत्रता सेनानी, कवयित्री और प्रेरणादायी नेता को खो दिया। उनकी पुण्यतिथि पर विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहां उनके जीवन और योगदान को याद किया जाता है।
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विरासत और महत्व
सरोजिनी नायडू का जीवन बहुआयामी था वे कवयित्री थीं, स्वतंत्रता सेनानी थीं, वक्ता थीं, राजनेता थीं और महिला अधिकारों की अग्रदूत थीं। उन्होंने भारतीय साहित्य को वैश्विक पहचान दिलाई और स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका को सशक्त बनाया। आज भी उनकी कविताएं और विचार प्रेरणा देते हैं। वे भारतीय इतिहास में उस सेतु के समान हैं, जिसने साहित्य और राजनीति को जोड़ा और राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक अभिव्यक्ति दी। सरोजिनी नायडू की पुण्यतिथि केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि प्रेरणा का अवसर है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि देशभक्ति केवल संघर्ष नहीं, बल्कि सृजन भी है; केवल राजनीति नहीं, बल्कि संस्कृति भी है।
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