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Abul kalam azad death anniversary: मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की पुण्यतिथि, शिक्षा, एकता और राष्ट्र निर्माण के प्रतीक

Abul kalam azad death anniversary, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जिन महान विभूतियों ने अपने विचार, लेखनी और नेतृत्व से देश को दिशा दी, उनमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।

Abul kalam azad death anniversary : क्यों खास है मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की पुण्यतिथि? जानें उनका ऐतिहासिक योगदान

Abul kalam azad death anniversary, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जिन महान विभूतियों ने अपने विचार, लेखनी और नेतृत्व से देश को दिशा दी, उनमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे न सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि एक महान विद्वान, पत्रकार, लेखक और स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री भी थे। हर वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता है और उनके विचारों को स्मरण करता है।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का जन्म 11 नवंबर 1888 को मक्का में हुआ था। उनका वास्तविक नाम अबुल कलाम गुलाम मुहिउद्दीन था। उनके पिता मौलाना खैरुद्दीन एक इस्लामी विद्वान थे। बचपन में ही अबुल कलाम आज़ाद को धार्मिक और पारंपरिक शिक्षा दी गई। उन्होंने अरबी, फारसी, उर्दू के साथ-साथ दर्शन, गणित और इतिहास का गहन अध्ययन किया।कम उम्र में ही वे लेखन और पत्रकारिता की ओर आकर्षित हुए। उनकी सोच अपने समय से कहीं आगे थी, जिसने उन्हें एक प्रखर बुद्धिजीवी के रूप में पहचान दिलाई।

पत्रकारिता और लेखनी के जरिए क्रांति

मौलाना आज़ाद ने पत्रकारिता को स्वतंत्रता संग्राम का हथियार बनाया। उन्होंने ‘अल-हिलाल’ और ‘अल-बलाग’ जैसे पत्रों के माध्यम से ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनजागरण किया। उनकी लेखनी इतनी प्रभावशाली थी कि अंग्रेज सरकार ने इन पत्रों पर प्रतिबंध लगा दिया।उनके लेखों में राष्ट्रीय एकता, धार्मिक सौहार्द और स्वतंत्रता की भावना स्पष्ट झलकती थी। इसी कारण वे बार-बार ब्रिटिश सरकार की नजरों में आए और जेल भी गए।

स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे महात्मा गांधी के विचारों से अत्यंत प्रभावित थे और असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन सहित कई आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई।वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष बने। उन्होंने हमेशा हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया और देश के विभाजन का खुलकर विरोध किया। उनका मानना था कि भारत की ताकत उसकी विविधता और एकता में है।

स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री

स्वतंत्रता के बाद मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को स्वतंत्र भारत का पहला शिक्षा मंत्री बनाया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने भारतीय शिक्षा प्रणाली की नींव रखी। उन्होंने वैज्ञानिक सोच, तकनीकी शिक्षा और उच्च शिक्षा संस्थानों को बढ़ावा दिया।उनके प्रयासों से ही आईआईटी, यूजीसी, साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी जैसी संस्थाओं की स्थापना हुई। वे मानते थे कि शिक्षा ही किसी भी देश की प्रगति का सबसे मजबूत आधार होती है।

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शिक्षा पर उनके विचार

मौलाना आज़ाद का मानना था कि शिक्षा सिर्फ नौकरी पाने का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और सामाजिक जिम्मेदारी का आधार है। वे महिलाओं की शिक्षा के भी प्रबल समर्थक थे और सभी वर्गों के लिए समान शिक्षा की वकालत करते थे।

निधन और विरासत

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का निधन 22 फरवरी 1958 को हुआ। उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद करता है, जिन्होंने राजनीति को नैतिकता और ज्ञान से जोड़ा।उनके जन्मदिन 11 नवंबर को भारत में राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो उनकी शिक्षा के प्रति अद्वितीय योगदान को दर्शाता है।

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आज के समय में प्रासंगिकता

आज जब समाज में शिक्षा, सहिष्णुता और राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है, तब मौलाना आज़ाद के विचार हमें सही दिशा दिखाते हैं। उनकी सोच आज भी युवाओं को प्रेरणा देती है कि ज्ञान, संवाद और एकता से ही राष्ट्र मजबूत बनता है।मौलाना अबुल कलाम आज़ाद न केवल स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि आधुनिक भारत की शिक्षा व्यवस्था के वास्तविक शिल्पकार भी थे।मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की पुण्यतिथि हमें यह याद दिलाती है कि स्वतंत्रता केवल संघर्ष से नहीं, बल्कि विचारों और शिक्षा से भी आती है। उनका जीवन राष्ट्र सेवा, ज्ञान और मानवता का प्रतीक है। भारत सदैव उनके अमूल्य योगदान का ऋणी रहेगा।

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