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जाने कौन है sindhutai sapkal, जो अनाथ बच्चों के लिए बनी मसीहा

sindhutai sapkal अनाथ बच्चों को पालने के लिए मांगती थी भीख


मां कोई भी हो, वो हमेशा अपने बच्चों के लिए भगवान के सामान होती है। एक मां अपने बच्चे का जन्म से लेकर पालन और उसकी हर खुशी का ध्यान रखती है। लेकिन क्या आपने कभी एक ऐसी मां के बारे में सुना है जो बिना मां बाप के बच्चों के लिए न केवल एक मां बनी, बल्कि उनके लिए सड़कों, रेलवे स्टेशनों पर भीख भी मांगती है। आपको बता दें कि ये महिला किसी एक या दो की नहीं बल्कि ये 1400 से भी ज्यादा बच्चों की मां बन चुकी है। अनाथ बच्चों को पालने और उनकी मदद के लिए अपना पूरा जीवन लगाने वाली इस महिला का नाम sindhutai sapkal है।

सिंधु ताई को महाराष्ट्र की मदर टेरेसा भी कहा जाता है क्योंकि सिंधु ताई ने अपनी पूरी जिंदगी अनाथ बच्चों की सेवा में गुजार दी। आज के समय पर भला सिंधु ताई 1400 से ज्यादा बच्चों की मां बन चुकी है लेकिन शुरू में सिंधु ताई के लिए ये करना बिल्कुल भी आसान नहीं था। इसके लिए सिंधु ताई को अपने जीवन में कई बड़े संघर्ष का सामना करना पड़ा। तो चलिए आज हम आपको बताते है महाराष्ट्र की मदर टेरेसा सिंधु ताई के बारे में। तो चलिए जानते है कौन है sindhutai sapkal और कैसे मिला उनको ये नाम।

जाने कौन है sindhutai sapkal और कैसे मिला उनको ये नाम

ये बात तो हम आपको बता ही चुके है कि सिंधु ताई को महाराष्ट्र की ‘मदर टेरेसा’ भी कहा जाता है। सिंधु ताई का जन्म 14 नवम्बर, 1948 को महाराष्ट्र के वर्धा ज़िले के पिंपरी मेघे गांव में हुआ था। उनका जन्म एक अवांछित बेटी की तरह हुआ था अवांछित इसलिए क्योंकि उनके पिता को बेटी नहीं चाहिए थी। जन्म के बाद उस अवांछित बच्ची को चिंदी नाम दिया गया। जिसका मतलब होता है किसी कपड़े का कुतरा हुआ टुकड़ा, जिसका कोई मोल नहीं होता है। चिंदी का जन्म एक गरीब परिवार में होने के कारण वह न तो अच्छी शिक्षा लें पाई और न ही उनको अच्छी परवरिश मिली। बता दें कि चिंदी जब महज 10 साल की थी तो उनकी शादी एक 30 साल के आदमी से करा दी गई थी। उसके बाद जब चिंदी 20 साल की उम्र में 3 बच्चों की मां बन चुकी थी। उसके बाद जब चिंदी के पेट में उनका 4 बच्चा था तो उस दौरान उन्होंने झूठ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई जिसके कारण उनके पति ने उनको अपने घर से बेघर कर दिया। उस समय पर चिंदी का नौवां महीना था, और बच्चा किसी भी समय पर हो सकता था। लेकिन चिंदी ने हार नहीं मानी और किसी तरह घसीटते हुए पास में गाय के लिए बनाए गए फूस के घर में पहुंची और वहां उन्होंने अपने बच्चे को जन्म दिया।

sindhutai sapkal

जाने कैसे की चिंदी ने अपने नए जीवन की शुरुआत

जब चिंदी के पास कोई सहारा नहीं बचा तो वो अपनी बेटी को लेकर रेलवे स्टेशन चली गई। वहीं स्टेशन पर भीख मांग कर चिंदी अपना और अपनी बेटी का पेट पलती। काफी समय तक ऐसा चला लेकिन एक समय ऐसा आया जब चिंदी का धैर्य जवाब दे बैठा और उन्होंने फैसला कर लिया की अब वो अपनी सांसों से नाता तोड़ देगी। यही सोच कर एक दिन चिंदी ने बहुत सारा खाना इकट्ठा किया और उसे खाने लगी। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वो भूखे पेट मरना नहीं चाहती थी। चिंदी ने उस दिन जब तक खाना खाया जब तक उनका पेट और मन दोनों न भर गया। उसके बाद चिंदी अपनी बेटी का हाथ पकड़ कर रेल की पटरियों की तरफ़ निकल पड़ी। निकली तो चिंदी अपनी ज़िन्दगी को खत्म करने के लिए लेकिन रास्ते में उनको बहुत तेज बुखार में तड़पता एक बूढ़ा व्यक्ति मिला, जिसे चिंदी ने अपना बचा हुआ खाना दे दिया, जिसके बाद बूढ़े व्यक्ति ने पेट भरते ही चिंदी को धन्यवाद कहा। ये सब देख कर चिंदी के मन में ख्याल आया कि उन्होंने अपने जीवन में बहुत कुछ साहा है अब क्यों न वो अपने जैसे बेसहारा लोगों को जीने की कला सिखाएं। उसके बाद से ही चिंदी सिंधु ताई बन गई और उन्होंने सभी बेसहाय और अनाथ बच्चों की मदद करनी शुरू कर दी।

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सिंधु ताई को उनके इस नेक काम के लिए मिला सम्मान

आपको बता दें कि सिंधु ताई को उनके इस नेक काम के लिए अब तक 700 से ज्यादा सम्मान मिला चुके है। इतना ही नहीं इसके साथ ही बता दें कि उन्होंने सम्मान से प्राप्त हुई रकम को भी अपने बच्चों के लालन पोषण में खर्च कर दिया। क्या आपको पता है sindhutai sapkal को डी वाई इंस्टिटूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी एंड रिसर्च पुणे की तरफ से डाॅक्टरेट की उपाधि भी मिल चुकी है और उनके जीवन पर आधारित एक मराठी फिल्म मी सिंधुताई सपकल भी बनी है जो की साल 2010 में रिलीज हुई थी।

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