Dev Diwali 2026: काशी के घाटों पर होगा भव्य दीपदान, जानें कब है देवताओं की दीपावली
Dev Diwali 2026, भारत के सबसे भव्य और आध्यात्मिक त्योहारों में शामिल देव दीपावली हर साल कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है।
Dev Diwali 2026 : त्रिपुरासुर के वध से जुड़ी है देव दीपावली, जानें भगवान शिव से जुड़ी पौराणिक कथा
Dev Diwali 2026, भारत के सबसे भव्य और आध्यात्मिक त्योहारों में शामिल देव दीपावली हर साल कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। खासतौर पर उत्तर प्रदेश के वाराणसी यानी काशी में इस पर्व का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। गंगा के घाटों पर हजारों-लाखों दीप जलाए जाते हैं और पूरा शहर रोशनी से जगमगा उठता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन देवी-देवता स्वयं काशी पहुंचकर मां गंगा में स्नान करते हैं। इसी वजह से इसे ‘देवताओं की दीपावली’ कहा जाता है।

Dev Diwali 2026 कब मनाई जाएगी?
साल 2026 में देव दीपावली मंगलवार, 24 नवंबर को मनाई जाएगी। यह दिन कार्तिक पूर्णिमा का है। पंचांग के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा तिथि 23 नवंबर की रात 11:42 बजे शुरू होकर 24 नवंबर की रात 8:23 बजे समाप्त होगी। देव दीपावली के लिए प्रदोष काल का समय करीब शाम 5:08 बजे से 7:47 बजे तक बताया गया है। देव दीपावली को सामान्य दीपावली से अलग समझना जरूरी है। दीपावली कार्तिक अमावस्या को मनाई जाती है, जबकि देव दीपावली कार्तिक पूर्णिमा के दिन होती है। यानी दोनों पर्वों के बीच लगभग 15 दिनों का अंतर होता है।
काशी में क्यों खास है देव दीपावली?
देव दीपावली का सबसे भव्य आयोजन वाराणसी के गंगा घाटों पर होता है। काशी को भगवान शिव की नगरी माना जाता है और इसी वजह से यहां मनाई जाने वाली देव दीपावली का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। कार्तिक पूर्णिमा की शाम जैसे-जैसे अंधेरा बढ़ता है, वैसे-वैसे गंगा के किनारे स्थित घाटों पर दीप जलने लगते हैं। दीयों की रोशनी जब गंगा के पानी में प्रतिबिंबित होती है तो पूरा नदी किनारा किसी दिव्य लोक जैसा नजर आता है। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार, देव दीपावली के दौरान वाराणसी के घाट लाखों मिट्टी के दीपों से सज जाते हैं और गंगा आरती के साथ आध्यात्मिक वातावरण और भी खास हो जाता है।
भगवान शिव से जुड़ी है मान्यता
देव दीपावली के पीछे भगवान शिव और त्रिपुरासुर से जुड़ी धार्मिक कथा बताई जाती है। मान्यता के अनुसार, त्रिपुरासुर नामक असुर ने अपनी शक्तियों से देवताओं और पृथ्वीवासियों को परेशान कर दिया था। उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान शिव ने उसका वध किया। भगवान शिव की इस विजय को त्रिपुरोत्सव या त्रिपुरारी पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है। इसी विजय की खुशी में देवताओं ने दीप जलाकर उत्सव मनाया था, ऐसी धार्मिक मान्यता है। इसी वजह से देव दीपावली को बुराई पर अच्छाई और अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक भी माना जाता है।
इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व
कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। देव दीपावली पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु सुबह गंगा में आस्था की डुबकी लगाते हैं और इसके बाद मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदी में स्नान और दीपदान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। श्रद्धालु अपने परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं। हालांकि धार्मिक मान्यताएं आस्था पर आधारित हैं और इनके आध्यात्मिक महत्व को उसी संदर्भ में समझना चाहिए।
दीपदान की परंपरा
देव दीपावली की सबसे खास परंपराओं में दीपदान शामिल है। श्रद्धालु मिट्टी के दीपक में तेल या घी डालकर उन्हें जलाते हैं और गंगा किनारे अर्पित करते हैं। घाटों की सीढ़ियों पर एक साथ हजारों दीप जलने का दृश्य इस पर्व को बेहद खास बनाता है। कई स्थानों पर मंदिरों और धार्मिक स्थलों को भी दीपों से सजाया जाता है। दीपदान को श्रद्धा, शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। कई लोग अपने पूर्वजों की स्मृति में भी दीपदान करते हैं।
गंगा आरती बनेगी आकर्षण का केंद्र
देव दीपावली की शाम गंगा आरती देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक घाटों पर पहुंचते हैं। मंत्रोच्चार, घंटियों की आवाज, शंखनाद और दीपों की रोशनी मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं, जो काशी की आध्यात्मिक पहचान को दर्शाता है। वाराणसी में देव दीपावली के दौरान धार्मिक आयोजनों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। संगीत, पारंपरिक प्रस्तुतियां और अन्य कार्यक्रम इस उत्सव को धार्मिक होने के साथ-साथ सांस्कृतिक रूप भी देते हैं।
नाव की सवारी से दिखता है अद्भुत नजारा
देव दीपावली के दौरान गंगा में नाव से घाटों का नजारा देखना भी पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है। नदी के बीच से जब दोनों तरफ जगमगाते घाट दिखाई देते हैं तो दृश्य बेहद आकर्षक नजर आता है। हालांकि इस दिन वाराणसी में भारी भीड़ जुटती है, इसलिए नाव की सवारी या घाटों पर जाने की योजना पहले से बनाना बेहतर रहेगा। स्थानीय प्रशासन भीड़ और यातायात को नियंत्रित करने के लिए विशेष व्यवस्थाएं करता है।
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2026 में क्या रहेगा खास?
2026 की देव दीपावली को लेकर वाराणसी में तैयारियां पहले से शुरू हो चुकी हैं। स्थानीय प्रशासन ने गंगा महोत्सव और देव दीपावली जैसे बड़े आयोजनों को लेकर व्यवस्थाओं की समीक्षा शुरू कर दी है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों के काशी पहुंचने की उम्मीद है। ऐसे में घाटों की सफाई, सुरक्षा, यातायात, नाव संचालन और भीड़ प्रबंधन जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
Dev Diwali और Diwali में क्या अंतर है?
अक्सर लोग देव दीपावली और दीपावली को एक ही पर्व समझ लेते हैं, लेकिन दोनों अलग हैं। दीपावली कार्तिक अमावस्या को मनाई जाती है और इसे भगवान राम के अयोध्या लौटने, मां लक्ष्मी की पूजा तथा प्रकाश पर्व से जोड़ा जाता है। वहीं देव दीपावली कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाती है और इसका प्रमुख संबंध भगवान शिव की त्रिपुरासुर पर विजय तथा देवताओं के काशी आने की मान्यता से है। यानी दोनों त्योहारों में दीप जलाने की परंपरा समान है, लेकिन उनकी तिथि, धार्मिक कथा और आयोजन का स्वरूप अलग है।
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कैसे मनाएं देव दीपावली?
अगर आप घर पर देव दीपावली मनाना चाहते हैं तो शाम के समय स्नान करके भगवान शिव और मां गंगा का ध्यान कर सकते हैं। घर के मंदिर में दीप जलाएं और अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा करें। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या अन्य उपयोगी सामग्री का दान करना भी इस अवसर को सेवा से जोड़ने का अच्छा तरीका हो सकता है। Dev Diwali 2026 का मुख्य पर्व 24 नवंबर को है। काशी में उस दिन गंगा के घाटों पर दीपों की रोशनी, आरती, मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। यह सिर्फ रोशनी का उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, आध्यात्मिकता, संस्कृति और काशी की सदियों पुरानी परंपरा का भव्य उत्सव है।
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