NPPA drug Pricing: कैंसर के इलाज का खर्च क्यों नहीं हो रहा कम? दवाओं के मार्जिन में 700% तक बढ़ोतरी ने बढ़ाई चिंता
NPPA drug Pricing, कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज पहले से ही मरीजों और उनके परिवारों के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती होता है। अस्पताल का खर्च, जांच, कीमोथेरेपी और महंगी दवाओं का बिल कई परिवारों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है।
NPPA drug Pricing : महंगी कैंसर दवाओं पर फिर सरकार का एक्शन, 700% तक मार्जिन के बाद 137 दवाओं पर नई व्यवस्था
NPPA drug Pricing, कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज पहले से ही मरीजों और उनके परिवारों के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती होता है। अस्पताल का खर्च, जांच, कीमोथेरेपी और महंगी दवाओं का बिल कई परिवारों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है। ऐसे में कैंसर की दवाओं की कीमतों को लेकर सामने आए नए आंकड़ों ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। साल 2019 में सरकार ने 42 कैंसर दवाओं पर 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन की सीमा तय की थी, लेकिन अब सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, इनमें से कई दवाओं पर मार्कअप 100 प्रतिशत से लेकर 700 प्रतिशत से भी ज्यादा तक पहुंच गया। यानी जिस व्यवस्था का उद्देश्य दवाओं को मरीजों के लिए किफायती बनाना था, उसके बावजूद कुछ दवाओं की कीमतों में भारी अंतर देखने को मिला।

2019 में सरकार ने क्यों लगाया था 30 प्रतिशत का कैप?
दरअसल, फरवरी 2019 में नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी यानी NPPA ने कैंसर की 42 गैर-अनुसूचित दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को 30 प्रतिशत तक सीमित करने का फैसला किया था। इसका उद्देश्य दवा निर्माता से लेकर वितरक और रिटेलर तक के स्तर पर लगने वाले अतिरिक्त मार्जिन को नियंत्रित करना और मरीजों को कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराना था।इस फैसले के बाद 526 ब्रांड की कैंसर दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत यानी MRP में कमी आई थी। कुछ दवाओं की कीमतों में 90 प्रतिशत तक की कटौती दर्ज की गई थी। उस समय इस कदम को कैंसर के इलाज का खर्च कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना गया था। हालांकि, हाल में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि केवल एक बार कीमतों में कटौती करना लंबे समय तक दवाओं के मार्जिन को नियंत्रित रखने के लिए पर्याप्त नहीं रहा।
सात साल में कैसे 700 प्रतिशत तक पहुंचा मार्कअप?
साल 2026 में NPPA की ओर से जारी नई सूची के आंकड़ों की तुलना 2019 में शामिल की गई दवाओं से की गई। इस तुलना में सामने आया कि दोनों सूचियों में शामिल 34 दवाओं में से ज्यादातर पर मार्कअप निर्धारित स्तर से काफी अधिक था।आंकड़ों के मुताबिक, 2019 की सूची में शामिल कई दवाओं पर 2026 में नई कीमतों की गणना से पहले मार्कअप 100 प्रतिशत से लेकर 700 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच चुका था। केवल पांच ब्रांड ऐसे थे, जिनका मार्कअप 43 प्रतिशत के निर्धारित समकक्ष स्तर पर था। चार ब्रांड में यह 43 से 100 प्रतिशत के बीच था, जबकि बाकी 39 ब्रांड में यह 100 प्रतिशत से लेकर 700 प्रतिशत से अधिक तक दर्ज किया गया।यहां ट्रेड मार्जिन और मार्कअप के बीच अंतर समझना भी जरूरी है। ट्रेड मार्जिन की गणना अंतिम खुदरा कीमत के आधार पर होती है, जबकि मार्कअप की गणना वितरक या स्टॉकिस्ट की कीमत के मुकाबले की जाती है। इसलिए 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन का मतलब 30 प्रतिशत मार्कअप नहीं होता। 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन लगभग 42.86 प्रतिशत मार्कअप के बराबर होता है।इन आंकड़ों के सामने आने के बाद दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए लगातार निगरानी और स्थायी व्यवस्था की जरूरत पर चर्चा तेज हो गई है।
NPPA ने 137 कैंसर दवाओं पर फिर लगाया 30 प्रतिशत का कैप
बढ़ते मार्कअप के बीच सरकार ने अक्टूबर 2026 में कैंसर की दवाओं की कीमतों को लेकर नया कदम उठाया। NPPA ने 137 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को अधिकतम 30 प्रतिशत तक सीमित करने का फैसला किया। यह आदेश 17 अक्टूबर 2026 को जारी किया गया।नई सूची में 20 से अधिक प्रकार के कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं शामिल हैं। इनमें इम्यूनोथेरेपी की कुछ दवाओं के साथ डेनोसुमैब, पेगफिलग्रास्टिम और बेवाकिजुमैब जैसी दवाएं भी शामिल हैं। इसके अलावा पेम्ब्रोलिजुमैब, डुरवालुमैब और ओसिमर्टिनिब जैसी दवाओं को भी इस व्यवस्था के दायरे में रखा गया है।सरकार के मुताबिक, इस कदम से संबंधित दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमतों में मौजूदा कीमतों के आधार पर 70 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। नई कीमतें 9 नवंबर 2026 से लागू होंगी। कंपनियों को अपनी संशोधित कीमतों की जानकारी NPPA को देने और नई कीमतों को अस्पतालों तथा दवा विक्रेताओं तक पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं।
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484 कैंसर दवाओं की कीमतों में कटौती की जानकारी
नई व्यवस्था के बाद दवा कंपनियों की ओर से कीमतों में कटौती की जानकारी भी सामने आई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 137 दवाओं से संबंधित 643 उत्पाद प्रविष्टियों में से 484 उत्पादों की कीमतों में कमी दर्ज की गई है। इनमें 275 उत्पाद ऐसे हैं, जिनकी कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक की कटौती हुई है, जबकि 89 उत्पादों की कीमतें 75 प्रतिशत से ज्यादा कम हुई हैं। कुछ दवाओं की कीमतों में 90 प्रतिशत तक की कमी बताई गई है।हालांकि, सभी कैंसर दवाओं की कीमतों में एक जैसी कटौती नहीं हुई है। कुछ महंगी पेटेंट वाली दवाओं की कीमतों में खास बदलाव नहीं हुआ है। इससे स्पष्ट है कि ट्रेड मार्जिन पर नियंत्रण से मरीजों को राहत मिल सकती है, लेकिन कैंसर के पूरे इलाज का खर्च कम करने के लिए अन्य कदमों की भी जरूरत होगी।
क्या मरीजों को वास्तव में मिलेगी राहत?
कैंसर के इलाज में दवाओं की कीमत एक बड़ा हिस्सा होती है। कई मरीजों को लंबे समय तक दवाएं लेनी पड़ती हैं, जबकि कुछ को महंगी टारगेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी की जरूरत होती है। ऐसे में दवाओं के वितरण और बिक्री पर लगने वाले अतिरिक्त मार्जिन को नियंत्रित करना जरूरी है।हालांकि, विशेषज्ञों और दवा क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या केवल समय-समय पर MRP में कटौती करने से समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है? 2019 और 2026 के आंकड़ों के बीच दिखा अंतर बताता है कि कीमतों में एक बार कमी करने के बाद भी बाजार में दोबारा बड़े मार्कअप सामने आ सकते हैं।इसलिए नियमित निगरानी, नियमों का पालन और अस्पतालों तथा मेडिकल स्टोर पर संशोधित कीमतों को लागू कराना महत्वपूर्ण होगा। मरीजों को भी दवाएं खरीदते समय उनकी अधिकतम खुदरा कीमत जांचनी चाहिए। इसके लिए NPPA की वेबसाइट और Pharma Sahi Daam ऐप का इस्तेमाल किया जा सकता है।
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