Calcutta High Court: ‘वंदे मातरम्’ पर हाई कोर्ट का बड़ा बयान, मदरसों को लेकर कही अहम बात
Calcutta High Court, पश्चिम बंगाल के मदरसों में 'वंदे मातरम्' के सभी छह छंद गाना अनिवार्य किए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की। अदालत ने मौखिक रूप से कहा, "अगर मदरसों में वंदे मातरम् गाया जाएगा तो आसमान नहीं टूट पड़ेगा।"
Calcutta High Court : कलकत्ता हाई कोर्ट ने पूछा- मदरसों में वंदे मातरम् गाने में दिक्कत क्या है?
Calcutta High Court, पश्चिम बंगाल के मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह छंद गाना अनिवार्य किए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की। अदालत ने मौखिक रूप से कहा, “अगर मदरसों में वंदे मातरम् गाया जाएगा तो आसमान नहीं टूट पड़ेगा।” कोर्ट ने यह भी पूछा कि जब अन्य धार्मिक पृष्ठभूमि वाले स्कूलों में भी प्रार्थनाएं होती हैं, तब उस पर इस तरह का विवाद क्यों नहीं उठता।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला पश्चिम बंगाल सरकार के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें राज्य के मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह छंद गाने को लेकर निर्देश जारी किए गए थे। इस आदेश को चुनौती देते हुए एक जनहित याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह का निर्देश धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है तथा इसे छात्रों पर नहीं थोपा जाना चाहिए।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि केवल ‘वंदे मातरम्’ गाने से किसी की धार्मिक पहचान समाप्त नहीं हो जाती।कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि “अगर सभी छह छंद गाए जाएंगे तो कोई आसमान नहीं टूट पड़ेगा।” अदालत ने यह भी पूछा कि देशभर में हजारों ईसाई शिक्षण संस्थानों में छात्र सामूहिक प्रार्थना करते हैं, तो क्या वहां अलग-अलग धर्मों के छात्र इस आधार पर विरोध करते हैं कि वह प्रार्थना उनके धर्म से संबंधित नहीं है?
कोर्ट ने याचिका पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या सरकार के आदेश के कारण अब तक किसी छात्र या मदरसे के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई हुई है? अदालत ने संकेत दिया कि यदि अभी तक आदेश को लेकर कोई प्रतिकूल कार्रवाई नहीं हुई है, तो केवल आशंका के आधार पर हस्तक्षेप की आवश्यकता पर विचार करना होगा। हालांकि, कोर्ट ने मामले को पूरी तरह खारिज नहीं किया और केंद्र सरकार से भी जवाब मांगा है।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि संविधान निर्माण के समय व्यापक चर्चा के बाद ‘वंदे मातरम्’ के केवल शुरुआती दो छंदों को आधिकारिक मान्यता देने का निर्णय लिया गया था। उनका कहना था कि सभी छह छंदों को अनिवार्य बनाना उचित नहीं है और इससे धार्मिक भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
सरकार का पक्ष
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से कहा गया कि आदेश का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देना है। सरकार का यह भी कहना है कि इस निर्देश को लेकर किसी के खिलाफ अभी तक कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई है और इस विषय पर विस्तृत जवाब अदालत में दाखिल किया जाएगा।
वंदे मातरम् पर क्यों होता है विवाद?
‘वंदे मातरम्’ भारत का राष्ट्रीय गीत है, जिसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था। आजादी के आंदोलन में इस गीत की महत्वपूर्ण भूमिका रही। हालांकि, समय-समय पर इसके कुछ छंदों को लेकर अलग-अलग धार्मिक संगठनों और समूहों ने आपत्ति जताई है। उनका तर्क रहा है कि गीत के कुछ हिस्सों की धार्मिक व्याख्या उनके विश्वासों से मेल नहीं खाती।दूसरी ओर, समर्थकों का कहना है कि यह गीत भारत माता के सम्मान और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है तथा इसका उद्देश्य किसी धर्म विशेष का प्रचार करना नहीं है।
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कोर्ट की टिप्पणी का महत्व
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत की यह टिप्पणी अंतिम फैसला नहीं है, बल्कि सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणी (Oral Observation) है। अंतिम निर्णय सभी पक्षों की दलीलें सुनने और दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद दिया जाएगा। हालांकि, अदालत की टिप्पणी से यह संकेत जरूर मिलता है कि वह मामले को केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि व्यापक संवैधानिक और सामाजिक संदर्भ में भी देख रही है।
आगे क्या होगा?
हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों से विस्तृत जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई में सरकार अपने आदेश का आधार स्पष्ट करेगी, जबकि याचिकाकर्ता अपने संवैधानिक तर्कों को विस्तार से अदालत के सामने रखेंगे। इसके बाद अदालत तय करेगी कि मदरसों में ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह छंद अनिवार्य करने वाला आदेश वैध है या नहीं। कलकत्ता हाई कोर्ट की टिप्पणी ने इस संवेदनशील मुद्दे पर नई बहस छेड़ दी है। एक ओर अदालत ने कहा कि “मदरसों में वंदे मातरम् गाया जाएगा तो आसमान नहीं टूट पड़ेगा,” वहीं दूसरी ओर उसने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम फैसला अभी आना बाकी है। अब सभी की नजर अगली सुनवाई पर है, जहां इस मामले के संवैधानिक, कानूनी और सामाजिक पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जाएगा।
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