Loksabha: परिसीमन बिल पर सरकार ने बढ़ाया सहमति का हाथ, विपक्ष से सहयोग की अपील
Loksabha, केंद्र सरकार ने प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation) विधेयक को लेकर विपक्षी दलों से सहयोग की अपील की है। सरकार का कहना है कि यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे और समान प्रतिनिधित्व से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।
Loksabha : लोकसभा परिसीमन पर सरकार की पहल, विपक्षी दलों से मांगा साथ
Loksabha, केंद्र सरकार ने प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation) विधेयक को लेकर विपक्षी दलों से सहयोग की अपील की है। सरकार का कहना है कि यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे और समान प्रतिनिधित्व से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। सरकार ने सभी राजनीतिक दलों से इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा में भाग लेने और सकारात्मक सुझाव देने का आग्रह किया है। दूसरी ओर, कई विपक्षी दलों ने परिसीमन की प्रक्रिया, उसके समय और संभावित प्रभावों को लेकर अपनी चिंताएं दोहराई हैं। ऐसे में इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
क्या है परिसीमन?
परिसीमन का अर्थ है लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण। इसका उद्देश्य बदलती जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का संतुलित पुनर्गठन करना है, ताकि प्रत्येक क्षेत्र को अपेक्षाकृत समान प्रतिनिधित्व मिल सके।भारत में परिसीमन का कार्य परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है। यह आयोग स्वतंत्र रूप से काम करता है और इसकी सिफारिशें लागू होने के बाद न्यायिक समीक्षा के सीमित दायरे में आती हैं।
सरकार ने क्या कहा?
संसदीय कार्य मंत्री और सरकार के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि परिसीमन लोकतंत्र को मजबूत करने की प्रक्रिया का हिस्सा है। सरकार का कहना है कि सभी दलों को इस विषय पर राजनीति से ऊपर उठकर विचार करना चाहिए।सरकार के अनुसार, देश की जनसंख्या में पिछले कई दशकों में बड़े बदलाव आए हैं। ऐसे में कई संसदीय क्षेत्रों की आबादी में भारी अंतर देखने को मिलता है। इसका असर मतदाताओं के प्रतिनिधित्व पर पड़ता है। सरकार चाहती है कि सभी दल इस विषय पर खुलकर चर्चा करें और संसद में सहयोग दें।
विपक्ष की क्या है चिंता?
कई विपक्षी दलों, खासकर दक्षिण भारत के राज्यों की पार्टियों ने परिसीमन को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि भविष्य का परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों की लोकसभा सीटों की हिस्सेदारी कम हो सकती है, जबकि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक सीटें मिल सकती हैं।विपक्षी नेताओं का कहना है कि इस विषय पर सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए व्यापक सहमति बनाना आवश्यक है।
दक्षिणी राज्यों की प्रमुख मांग
तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश सहित कई राज्यों ने पहले भी कहा है कि जिन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण की नीति को सफलतापूर्वक लागू किया है, उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान नहीं होना चाहिए।इन राज्यों का तर्क है कि केवल जनसंख्या को आधार बनाने से संघीय ढांचे का संतुलन प्रभावित हो सकता है।
परिसीमन क्यों है अहम?
विशेषज्ञों के अनुसार, परिसीमन लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। समय के साथ आबादी बदलती रहती है। कुछ क्षेत्रों की जनसंख्या तेजी से बढ़ती है, जबकि कुछ जगह अपेक्षाकृत स्थिर रहती है।यदि निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन समय-समय पर नहीं किया जाए, तो कुछ सांसद बहुत अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करेंगे, जबकि कुछ अपेक्षाकृत कम आबादी वाले क्षेत्रों का। इससे प्रतिनिधित्व में असमानता आ सकती है।
वर्तमान व्यवस्था क्या है?
भारत में आखिरी बार व्यापक परिसीमन 2002 में गठित परिसीमन आयोग की सिफारिशों के आधार पर किया गया था, जो 2008 से लागू हुआ। हालांकि, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों की कुल संख्या पर 2026 तक रोक संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से लागू रही है।अब 2026 के बाद संभावित परिसीमन को लेकर देशभर में चर्चा तेज हो गई है।
क्या बढ़ सकती हैं लोकसभा सीटें?
राजनीतिक और संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में नए संसद भवन की क्षमता को देखते हुए लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने पर भी विचार किया जा सकता है।हालांकि, इस संबंध में अभी तक सरकार की ओर से कोई अंतिम निर्णय या आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। परिसीमन आयोग के गठन और संसद में आवश्यक विधायी प्रक्रिया के बाद ही इस पर आगे की कार्रवाई संभव होगी।
सर्वदलीय सहमति की कोशिश
सरकार चाहती है कि परिसीमन जैसे संवेदनशील विषय पर व्यापक राजनीतिक सहमति बने। इसके लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ चर्चा और विचार-विमर्श का दौर जारी है।सरकार का कहना है कि लोकतंत्र में संवाद सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है और विपक्ष के सुझावों का भी स्वागत किया जाएगा।
राजनीतिक असर
परिसीमन का असर भविष्य की राजनीति पर भी पड़ सकता है। यदि निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या या सीमाओं में बदलाव होता है, तो कई राज्यों की राजनीतिक स्थिति बदल सकती है। यही वजह है कि यह मुद्दा केवल संवैधानिक नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और सभी पक्षों की भागीदारी बेहद जरूरी होगी, ताकि किसी भी राज्य या क्षेत्र को पक्षपात का एहसास न हो।
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आगे क्या होगा?
फिलहाल सरकार विपक्षी दलों से सहयोग और सुझाव मांग रही है। आने वाले समय में यदि परिसीमन से संबंधित विधेयक या आयोग के गठन को लेकर कोई औपचारिक कदम उठाया जाता है, तो इस पर संसद में विस्तृत चर्चा होने की संभावना है।इसके बाद आयोग जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति, प्रशासनिक सीमाओं और अन्य संवैधानिक मानकों के आधार पर अपनी सिफारिशें तैयार करेगा।परिसीमन का मुद्दा भारत के लोकतांत्रिक ढांचे से सीधे जुड़ा हुआ है। केंद्र सरकार इसे समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रही है, जबकि विपक्ष राज्यों के बीच संतुलन और संघीय व्यवस्था को लेकर अपनी चिंताएं जता रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस विषय पर व्यापक राजनीतिक चर्चा और सहमति बनाने की कोशिशें तेज होने की उम्मीद है। संसद और सभी राजनीतिक दलों की भूमिका इस प्रक्रिया को सफल और सर्वसम्मत बनाने में महत्वपूर्ण होगी।
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