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Kuno National Park: कूनो में चीता प्रोजेक्ट का कमाल, विदेश से आए चीते अब देसी जंगल में रमे

Kuno National Park, भारत में चीतों की वापसी का सपना अब धीरे-धीरे मजबूत हकीकत में बदलता दिख रहा है। मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से एक और उत्साहजनक खबर सामने आई है।

Kuno National Park : नामीबिया से MP तक, कूनो में चीतों के पुनर्वास की प्रेरक कहानी

Kuno National Park, भारत में चीतों की वापसी का सपना अब धीरे-धीरे मजबूत हकीकत में बदलता दिख रहा है। मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से एक और उत्साहजनक खबर सामने आई है। दक्षिण अफ्रीका से लाई गई मादा चीता गामिनी ने तीन शावकों को जन्म दिया है। इस नए जन्म के साथ देश में चीतों की कुल संख्या बढ़कर 38 हो गई है।तीन साल पहले शुरू हुए महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट चीता के तहत यह अब तक का नौवां सफल प्रजनन मामला है। विशेषज्ञों के अनुसार, अब तक भारत में जन्मे 27 चीता शावक जीवित हैं, जो इस परियोजना की सफलता का स्पष्ट संकेत है।

एमपी के माहौल में ढलते अफ्रीकी चीते

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि गामिनी का दोबारा तीन शावकों को जन्म देना इस बात का प्रमाण है कि विदेशी चीते अब भारतीय वातावरण में सहजता से ढल रहे हैं। यह दूसरी बार है जब गामिनी ने तीन शावकों को जन्म दिया है, जो अनुकूलन और प्रजनन की सफलता को दर्शाता है।जब किसी बड़े मांसाहारी जीव को दूसरे महाद्वीप से लाकर नए पर्यावरण में बसाया जाता है, तो कई चुनौतियां सामने आती हैं जैसे जलवायु, शिकार की उपलब्धता, बीमारियों का जोखिम और व्यवहारिक अनुकूलन। लेकिन कूनो में लगातार हो रहे जन्म इस बात का संकेत हैं कि चीते अब यहां अपने नए घर को स्वीकार कर चुके हैं।

तीन साल पूरे, उपलब्धियों का नया मुकाम

यह उपलब्धि ऐसे समय आई है जब प्रोजेक्ट चीता के तीन साल पूरे हो रहे हैं। वर्ष 2022–23 में भारत ने नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से 20 चीतों को लाकर दुनिया का पहला अंतर-महाद्वीपीय बड़े मांसाहारी जीव का स्थानांतरण पूरा किया था।17 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन के अवसर पर कूनो में पहले 8 चीतों को जंगल में छोड़ा था। यह क्षण भारत के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर माना जाता है।इसके बाद चरणबद्ध तरीके से अन्य चीते भी लाए गए और उन्हें कूनो के खुले जंगल में बसाया गया।

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हर जन्म के साथ बढ़ता भरोसा

कूनो में जन्म लेने वाले हर नए शावक के साथ प्रोजेक्ट चीता पर विश्वास और मजबूत होता जा रहा है। चीतों जैसे शीर्ष शिकारी को दूसरे महाद्वीप से लाकर बसाना दुनिया के सबसे जटिल वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में से एक माना जाता है।

इस प्रक्रिया में कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर एक साथ काम करना पड़ता है:

  • उपयुक्त जलवायु और आवास
  • पर्याप्त शिकार प्रजातियों की उपलब्धता
  • स्वास्थ्य निगरानी और उपचार
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष से बचाव
  • वैज्ञानिक ट्रैकिंग और अध्ययन

वन विभाग, वन्यजीव विशेषज्ञों और पशु चिकित्सकों की टीम लगातार चीतों की गतिविधियों पर नजर रख रही है, ताकि उनके अनुकूलन और सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सके।

केंद्रीय मंत्री ने जताया गर्व

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस उपलब्धि को भारत के लिए गर्व का क्षण बताया। उन्होंने कहा कि गामिनी और उसके शावकों का स्वस्थ रहना इस बात का प्रमाण है कि भारत में चीतों की पुनर्स्थापना का प्रयास सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले वर्षों में कूनो में चीतों की संख्या और बढ़ेगी और भारत फिर से एशियाई परिदृश्य में चीतों की मजबूत आबादी वाला देश बन सकेगा।

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0 से 38 तक का चुनौतीपूर्ण सफर

भारत में चीते 1950 के दशक में विलुप्त घोषित हो गए थे। इसके बाद दशकों तक उन्हें वापस लाने की योजना बनती रही। आखिरकार 2022 में यह ऐतिहासिक पुनर्वास अभियान शुरू हुआ।शुरुआती चरण में कई चुनौतियां सामने आईं—कुछ चीतों की मृत्यु, अनुकूलन संबंधी समस्याएं और आवास प्रबंधन की जटिलताएं। लेकिन निरंतर वैज्ञानिक प्रबंधन और निगरानी के कारण स्थिति धीरे-धीरे सुधरती गई।आज तीन साल में संख्या 0 से बढ़कर 38 तक पहुंचना इस परियोजना की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

भविष्य की दिशा: भारत में चीता संरक्षण

विशेषज्ञों के अनुसार, कूनो की सफलता भविष्य में भारत के अन्य उपयुक्त आवासों में भी चीतों के पुनर्वास का मार्ग खोल सकती है। दीर्घकालिक लक्ष्य एक स्थिर और आत्मनिर्भर चीता आबादी विकसित करना है, जो प्राकृतिक रूप से प्रजनन कर सके।

इसके लिए आवश्यक होगा:

  • बड़े और जुड़े हुए घासभूमि आवास
  • पर्याप्त शिकार आधार
  • स्थानीय समुदाय की भागीदारी
  • दीर्घकालिक संरक्षण नीति

कूनो नेशनल पार्क में गामिनी द्वारा तीन शावकों का जन्म केवल एक वन्यजीव घटना नहीं, बल्कि भारत के संरक्षण इतिहास की बड़ी सफलता का प्रतीक है। यह दिखाता है कि सही वैज्ञानिक योजना, राजनीतिक इच्छाशक्ति और सतत निगरानी के साथ विलुप्त प्रजातियों को भी वापस बसाया जा सकता है।

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