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हर रिश्ते के लिए हमे क्यों चाहिए एक खास दिन

हमे ख़ास दिन चाहिए या थोड़ा सा समय?


भारतीय सभ्यता और संस्कृति हमे हमेशा से सभी की इज़्ज़त करना सिखाता है। यहाँ हर रिश्ता बहुत ही पवित्र और बहुत ही अहम होता है। चाहे हम जहाँ हो, जैसे हो और जितने भी व्यस्त हो, हमारा परिवार और हमारे रिश्ते हमारे लिए सबसे ज़रूरी होते है और सबसे अधिक मूल्य के भी होते है। हमारे लिए हमारे रिश्ते इतने ज़्यादा अहम होते है कि उनके लिए कोई एक दिन ख़ास बनाने का कभी सोचा ही नहीं। अब हमारे लिए हर रिश्ता हर रोज़ अहम होता है। उनको उनकी अहमियत हर रोज़ बताने से उनकी कदर नहीं रहती और ये हमारी आदत भी नहीं की हम अपने परिवार या रिश्तों को ये रोज़ याद दिलाए की वो हमारे लिए कितने ज़रूरी है।

परिवार सब जानता है

माना जाता है कि ये एक ख़ास दिन की शुरुआत विदेशी सभ्यता से हुई है। क्योंकि वहाँ पर रह रहे लोग अपने काम में इतने व्यस्त होते है कि उनके पास अपने परिवार और अपने रिश्तों के लिए समय ही नहीं होता। अब बात तो ये भी है कि वहाँ पर बच्चे अपने माँ पिता से अलग रहते है। शुरुआत से ही बच्चे अपनी दुनिया में रहते है। वो अपने काम और उलझनों में इतना उलझ जाते है कि कुछ भी सुलझाना और समेटना उन्हें आता ही नहीं। और इन्ही उलझनों के कारण वो हर रिश्ते से कट कर रह जाते है। इसिलए उन्हें ऐसी परंपराओं की ज़रूरत है जहाँ वो अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ समय बिता कर उन्हें इस बात का एहसास दिला सके की वो उनके के लिए कितनी अहमियत रखते है। पर भारत में ना तो लोग कभी काम में इतना व्यस्त थे और ना ही बच्चे कभी अपने परिवार से दूर रहे। तो फिर क्यों हमे भी ज़रूरत पड़ गई ऐसी सभ्यताओं की?

अपनी उलझने से निकले

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वो इसलिए क्योंकि अब भारत में भी विदेशी सभ्यता का असर सिर्फ लोगो की सोच और जीवन शैली पर ही नहीं पर उनके काम पर भी हो रहा है। वो ऐसे की जब से विदेशी कंपनियां भारत में आई है तब से यहाँ की जनता वहाँ ज़्यादा काम करने लगी है। और भी अब काम में इतना व्यस्त रहने लगे है कि उनके पास भी उनके परिवारों के लिए अब समय नहीं रहा। फिर काम के सिलसिले में ही सब इतना बहार रहने लगे की वो भी अपने परिवार से अलग हो गए। इतना अलग की भाई दूज और राखी जैसे पर्व सिर्फ चिट्टियो में बंध के रह गए। हमें एहसास भी नहीं हुआ और हमारी सुलझी हुई ज़िन्दगी इतनी उलझ गई की अपने रिश्तों की अहमियत समझने के लिए हमे भी इन्ही दिनों का सहारा लेना पड़ा।

मदर्स डे, फादर्स डे, सिबलिंग डे, फ्रेंडशिप डे आदि बस दिन बन कर ही रह गए। इतनी उलझनों से बाहर आकर हर चीज़ सुलझाना और समेटना इतना आसान नहीं होता। पर शायद इतना मुश्किल भी नहीं होता। अगर चाहो तो इन उलझनों को सुलझा कर हर एक दिन आप किसी के नाम कर सकते है और अपनी खुशी उनके साथ बाँट सकते है। इसलिए नहीं क्योंकि ये हमारी भारतीय संस्कृति है पर इसलिए क्योंकि वो हमारे परिवार का हिस्सा है और परिवार को उनकी अहमियत बताने के लिए हमे एक ख़ास दिन की ज़रूरत नहीं। आखिर परिवार सब जानता जो है।

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