क्यों करते है दिवाली पर माँ लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा

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आखिर क्यों बिठाया जाता है माँ लक्ष्मी को श्री गणेश के बाई ओर


दिवाली के त्यौहार को ‘कौमुदी महोत्सव’ भी कहा जाता है, लेकिन क्या आपको पता है की दिवाली पर लक्ष्मी और गणेश की पूजा क्यों की जाती है, वैसे सभी अच्छे और शुभ कामो में गणेश के साथ गौरी की पूजा की जाती है, लेकिन दिवाली पर यहां गणेश के साथ मां लक्ष्मी का पूजन क्यों किया जाता है? कई पुराणिक कथाओ में इस कहानी का ज़िक्र किया गया है की आखिर क्यों दिवाली के दिन गौरी और गणेश की पूजा क्यों की जाती है। तो चलिए हम आपको इसके पीछे की वजह बतातें है।

पूजा की पीछे की वजह:

पौराणिक ग्रथों में एक कथा है कि लक्ष्मी जी की पूजा गणेश जी के साथ क्यों की जाती है। एक बार एक वैरागी साधु को राजसुख भोगने की लालच होती है तो वो लक्ष्मी जी की आराधना करता है। उसकी आराधना से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती है तथा उसको दर्शन देकर वरदान देती है कि उसे उच्च पद और प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। वरदान मिलने के बाद उस में  घमंड आ जाता है और राजा को धक्का मार देता जिससे राजा का मुकुट नीचे गिर जाता है, राजा व उसके दरबारी के लोग उसे मारने के लिए दौड़ते है परन्तु इसी बीच राजा के गिरे हुए मुकुट से एक काला नाग लेकर भागने लगाता है, यह देख कर सबको लगाता है की साधु चम्तकारी है और उसकी जयकार करने लगते है।

उस साधु से प्रसन्न हो कर उस से मंत्री बना देता है, क्युकी उसी की कारण राजा की जान बची थी। राजा साधु से इतना खुश हो जाता है की उस मंत्री को अलग महल ही दे देता है। फिर राजा को एक दिन वह साधु भरे दरबार में हाथ खींचकर बाहर ले गया। यह देख दरबारी जन भी उसके पीछे भागे। सभी के बाहर जाते ही भूकंप आया और भवन खण्डहर में बदल गया और उसी साधु ने फिर से सबकी जान बचाई। अब इससे साधु का मान- सामन बढ़ जाता है और उसका घमड़ भी बढ़ जाता है।

तो उसी महल में गणेश की मूर्ति थी, उस मूर्ति को साधु ने हटा दी क्योकि दिखने में वो मूर्ति अच्छी नहीं है। साधु के इस काम से गणेश जी काफी गुस्सा हो जाते है और उसी दिन से साधु की बुद्धि पलट जाती है। उसके सारे काम खराब होने लग जाते है। तभी राजा साधू से नाराज हो कर उसे कारागार में दाल देता है।

उस जेल में वो फिर से लक्ष्मी जी की आराधना करता है तब लक्ष्मी जी उससे बताती है की उसने गणेश का उपमान किया था अब उससे गणेश जी को प्रसन्न करना होगा। माता का आदेश मिलने के बाद वो गणेश की आराधना करने लग जाता है जिससे गणेश जी का गुस्सा शांत हो जाता है और वो राजा को सपने आकर आदेश देते है की साधु को फिर से मंत्री बनाया जाये। राजा ने गणेश जी के आदेश का पालन किया और साधु को मंत्री पद देकर सुशोभित किया।

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इस प्रकार लक्ष्मीजी और गणेश जी की पूजा साथ-साथ होने लगी। बुद्धि के देवता गणेश जी की भी पूजा लक्ष्मीजी के साथ ज़रूर करनी चाहिए क्योंकि यदि लक्ष्मीजी आ भी जाये तो बुद्धि के उपयोग के बिना उन्हें रोक पाना मुश्किल है। इस प्रकार दीपावली की रात्रि में लक्ष्मीजी के साथ गणेशजी की भी आराधना की जाती है।

दीपावली पर लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी की पूजा करने की एक और भावना ये भी कही गई है कि माता लक्ष्मी अपने प्रिय पुत्र की तरह हमारी भी सदैव रक्षा करें और हमें भी उनका स्नेह और आशीर्वाद मिलता रहे।

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