महिलाओं का वोट लोकतंत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण-संघर्षो के बाद मिला अवसर

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जब कई वर्षो तक महिलाओं के पास नहीं था अपनी सरकार चुनने का हक़


चाहे भारत हो या दुनिया का कोई अन्य देश हर जगह महिलाओं और पुरुषो में भेदभाव चला आ रहा है .एक समय ऐसा भी था जब महिलाओं पर घर से बहार काम करने की ज़िम्मेदारियाँ हुई करती थी और पुरुषो पर घर सँभालने की जिम्मेदारी थी ,परन्तु राजा महाराजाओं के शासन पर विपरीत स्थतियाँ पैदा हो गयी जहाँ पुरुष बाहर का और महिलाएं घर का काम सँभालने लगी,इन बातों को बीते कई दशक हो चुके हैं लेकिन आज भी महिलाओं को उनका वास्तविक दर्जा नहीं दिया गया है महिलाओं को दशकों पहले ही कई कार्यो के लिए बाध्य कर दिया गया ,अमेरिका में महिलाओं को वोटिंग राइट  लेने के लिए कई वर्षो तक संघर्ष करना पड़ा,लगातार 64 वर्षो की मशक्कत के बाद महिलाओं ने अपना पहला वोट दिया.

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आज़ाद भारत के साथ ही मिला महिलाओं को मताधिकार

आज़ाद भारत में वोटरों की संख्या पांच गुना तक बढ़कर करीब 17 करोड़ 30 लाख तक पहुंच गई थी. इसमें से करीब 8 करोड़ यानी आधी आबादी महिलाओं की थी. इनमें से करीब 85 फीसदी महिलाओं ने कभी वोट ही नहीं दिया था. दुर्भाग्य से करीब 28 लाख महिलाओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा देने पड़े क्योंकि उन्होंने अपने नाम ही नहीं बताए.बड़ी निराशा की बात है की इतने सालो बाद भी महिलाये अपने मताधिकार का पूर्ण रूप से उपयोग नहीं कर पा रहीं हैं

सरकार ही लाएगी बदलाव

देश में औरतों के जितने  भी बदलाव हुए वो समाज और मर्दों के द्वारा नहीं बल्कि कानून से बदले गए , राजनीतिक हस्तक्षेप से बदले गए . हमारे दिए हर वोट से  बदले गए  हालांकि जितना महिलाओं को  चाहिए, उसका दस फीसदी बदलाव भी अभी देखने को नहीं मिला है ये तभी मुमकिन है जब  महिलाओं द्वारा राजनीति को समझा जाये , उसमें दिलचस्पी ली जाये .

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