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क्या है हरियाली तीज? आइए जानते हैं इस पर्व की मुख्य बातें….

क्या है हरियाली तीज?


हरियाली तीज का त्योहार प्रत्येक वर्ष श्रावण मास में शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाया जाता है। वैसे तो इस त्यौहार को पूरे भारत में ही बहुत उत्सव के साथ मनाया जाता है परंतु पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस त्यौहार को लेकर बहुत मान्यताएं हैं। यह उत्सव महिलाओं द्वारा मनाया जाता है जब सावन की छटा छा जाती है उस समय चारों ओर हरियाली छा जाती है। तब महिलाएं मोर की तरह नाचती और डालो पर झूला डाल कर झूलती हैं। कुछ महिलाओं के लिए इस उत्सव पर व्रत की बहुत अत्यधिक मानता है। ऐसा कहा जाता है कि यह उत्सव शिव पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक है। शिव और पार्वती में आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम को दर्शाने वाला यह उत्सव बड़े प्रेम भाव से महिलाओं द्वारा मनाया जाता है।

परंपरा

वैसे इसे कई नामों से जाना जाता है जैसे उत्तर प्रदेश में इसे कजली तीज के नाम से मनाते हैं और चारों तरफ हरियाली फैलाने की वजह से इसे हरियाली तीज भी कहते हैं। महिलाएं इस दिन सुंदर श्रृंगार करती हैं और मेहंदी लगाती हैं। हरे रंग की चूड़ियां धारण कर बुजुर्ग महिलाओं से आशीर्वाद भी लेते हैं। भारतीय संस्कृति में इस दिन औरतें हरे रंग की साड़ी या फिर लहरिया साड़ी भी धारण करती हैं। सदियों से इस त्यौहार को लेकर परंपरा चली आई है स्त्रियां सजती है, तैयार होती हैं घर में अलग-अलग प्रकार के पकवान बनाती हैं, और साथ ही झूले का भी आनंद लेती है।

उत्सव में सहभागिता

यह उत्सव महिलाओं द्वारा बड़े ही प्रेम भाव से मनाया जाता है। इस उत्सव को मनाने के लिए कुछ रस्मो का पालन भी किया जाता है। परंपराओं के अनुसार सांस अपनी बहू को तीज का सिंजारा देती है। सिंजारा में बहू के लिए साड़ी श्रृंगार का सामान खाने-पीने की वस्तुएं आदि भिजवाई जाती हैं। लड़की के मायके की तरफ से भी उसकी मां उसके लिए बहुत सारा सामान तीज के सितारे के रूप में भिजवाती हैं। यह त्योहार सुहागन स्त्रियों के लिए बहुत ही मुख्य त्योहार है परंतु यदि किसी लड़की का विवाह तय हो गया हो और उससे पहले यह त्यौहार आए तो उसमें भी होने वाली सास अपनी होने वाली बहू को सिंगारे के रूप में कपड़े गहने श्रृंगार फल और मिठाई भिजवाती है।

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हरियाली तीज के इस उत्सव में सभी सुहागन महिलाएं अपने सुहाग के लिए पूजा पाठ करती हैं और व्रत भी करती हैं। ऐसा माना जाता है कि जिस तरह से शिव पार्वती का पुनर्मिलन उनके बीच प्रेम का भाव लेकर आया था ठीक उसी तरह से सभी विवाहित जोड़ों के बीच यह त्योहार प्रेम का भाव लेकर आता है। स्त्रियां हरी साड़ी पहनती है हरा श्रृंगार करती हैं और हरी चूड़ियां भी पहनती हैं जो प्रेम का और शांति का प्रतीक माना जाता है।

पौराणिक महत्व

इस प्रेम भरे उत्सव के पीछे एक पौराणिक कहानी भी है। ऐसा माना जाता है कि सैकड़ों वर्ल्डस की साधना के बाद भी माता पार्वती भगवान शिव को प्राप्त नहीं कर पा रही थी। ऐसा भी कहा जाता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को प्राप्त करने हेतु लगभग 107 बार जन्म लिया था फिर भी माता पार्वती उन्हें पति रूप में प्राप्त नहीं कर पाई थी। जब उन्होंने पार्वती रूप में जन्म लिया तब सावन मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को बड़े ही भक्ति भाव से व्रत पूजन वंदन किया जिसके बाद माता पार्वती को भगवान शिव पति रूप में प्राप्त हुए। इसलिए इस दिन को माता शिव और पार्वती जी का प्रेम भाव के साथ पूजन वंदन करने वाली सुहागन स्त्रियों के वैवाहिक जीवन में आने वाली सभी विप अदाएं दूर हो जाती हैं और वे सुख की प्राप्ति करती हैं। साथ ही कुंवारी कन्या है अपना मन वांछित वर पाने के लिए इस दिन व्रत करके भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं।

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