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UP Election 2022- क्या इस बार भाजपा कृष्ण मंदिर के निर्माण को रखेगी मुख्य मुद्दा?

UP Election 2022- राममंदिर के  बाद क्या अब भाजपा कृष्णा मंदिर की तैयारी में है?


यूपी में चुनावी पारा दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। सभी राजनैतिक पार्टियां चुनाव प्रचार के लिए मैदान में उतर गई है। एक ओर जहां सपा भाजपा की असफलता को गिना रहा है। वहीं दूसरी ओर भाजपा ने एक बार फिर धार्मिक राजनीति शुरु कर दी है। इस बार फिर यूपी में मंदिर की मांग पर राजनीति हो रही है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सभी पार्टियों ने कमर कस ली है। इस बीच यह जानना जरुरी है कि हर पार्टी का क्या एजेंडा हैं। जहां एक ओर भाजपा अपने पांच साल के कार्यों को गिनाने की कोशिश कर रही है। यूपी को भयमुक्त और अपराध मुक्त बनाने की बात कर रही है।

 वहीं दूसरी ओर विपक्षी पार्टियां भाजपा की कमियां गिनाने के साथ-साथ चुनाव जीतने के बाद जनता को क्या सुविधा देंगी यह लगातार प्रचार कर रही हैं। कांग्रेस की टैगलाइन “लड़की हूं लड़ सकती हूं” से यह स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस ने महिलाओं को सेंटर में रखा है।

चुनाव का माहौल जैसे-जैसे तैयार हो रहा है वैसे ही मंदिर की राजनीति शुरु हो गई है। राममंदिर के बाद अब कृष्ण मंदिर को बनाने की आवाज को बुलंद किया जा रहा है। पिछले दिनों यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या ने विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि वह बताएं कि वह मथुरा में मंदिर बनाना चाहते हैं या नहीं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि मथुरा में श्रीकृष्ण की जन्मस्थली पर भव्य मंदिर बनाना हर कृष्ण भक्त की इच्छा है और हमने ट्वीट के जरिए भावना जाहिर की है।

मैं विपक्षी नेताओं से पूछना चाहता हूं कि क्या वे मथुरा में श्रीकृष्ण के भव्य मंदिर के निर्माण का विरोध करते हैं या उनका समर्थन करते हैं। पार्टियों को इसको लेकर उन्हें खुलासा करना चाहिए। वह यहीं नहीं रुके बल्कि  अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए कहते हैं कि वह कृष्ण भक्त हैं और राम के भी भक्त हैं तो वह ये बताएं कि कृष्ण भूमि पर मंदिर बनाना चाहते हैं या नहीं । उन्होंने आगे कहा कि मथुरा में श्रीकृष्ण की जन्मस्थली पर भव्य मंदिर बनाना हर कृष्ण भक्त की इच्छा है और हमने ट्वीट के जरिए भावना जाहिर की है।

इस तरह यह साफ हो जाता है कि इस बार का चुनाव भी भाजपा का मंदिर पर आधारित हो सकता है। आपको बता दें कि भाजपा का मंदिर वाले एंजेडे ने वोट को एक तरफ ही बदल दिया था। साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणापत्र में यह कहा था कि अगर उनकी सरकार बनती है तो राममंदिर को बनाएंगे। जिसका सीधा असर वोट में देखने को मिला। साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत से भी ज्यादा सीटें मिली।

इसका सबसे बड़ा कारण मोदी लहर और दूसरा लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र में राममंदिर बनाने का जिक्र था।  इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में राममंदिर निर्माण का जिक्र करना। साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 403 सीटों में 312 सीटों पर विजय प्राप्त की।

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इसके लिए जमीन भाजपा ने पहले ही तैयार कर ली थी। साल 2012 के विधानसभा चुनाव के घोषणापत्र में भी राममंदिर का जिक्र किया था। इस दौरान भाजपा यूपी में अपनी जमीन मजबूत कर रही थी। इस चुनाव में भाजपा की झोली में 47 सीटें आई थी।  जबकि इसके बाद लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बीच यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से 71 सीटें भाजपा की झोली में चली गई थी। जिसका असर बाद में यूपी के विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला।

ऐसे में अब सवाल उठता है कि हमेशा राममंदिर की राजनीति करने वाली भाजपा की सरकार ने जनता के साथ अपने वायदे को पूरा करते हुए साल 2020 में राममंदिर का शिलान्यास 5 अगस्त को कर दिया था। भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक एजेंडा का पिछले साल खत्म हो गया था। इसके बाद काशी के विश्वनाथ मंदिर के कोरिडोर निर्माण की भी चर्चा हुई लेकिन यह राजनीतिक मुद्दा नहीं बना।

जबकि वाराणसी में इसका भी काम चल रहा है और यह कहा जा रहा को 13 दिसंबर की पीएम मोदी इसका उद्घाटन करेंगे। अब साल 2022 का विधानसभा चुनाव आने वाला है। अब जब राममंदिर का मुद्दा खत्म हो चुका हैं तो क्या भाजपा आने वाले चुनाव में कृष्ण मंदिर को मुद्दा बनाकर चुनाव को एकतरफा कर पाएंगी? जैसा की पिछले चुनावों में देखने को मिला है कि मंदिर वाले मुद्दे पर भाजपा हमेशा बाकी पार्टियों पर भारी पड़ी है। अब देखना है कि भाजपा का कृष्ण मंदिर वाला एजेंडा कितना साथ दे पाता है

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